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Monday, October 18, 2010

शिवराम ने लुप्त होती जननाट्य शैली पुनरार्वेष्टित किया


उदयपुर। प्रसिद्ध जननाट्यकार शिवराम के निधन पर एक स्मरणांजलि सभा में विभिन्न विद्वानों ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि शिवराम सचमुच क्रांतिधर्मी नाटककार थे। उनके नाटक लोकप्रियता की कसौटी पर भी खरे उतरे और श्रेष्ठता के सभी मापदण्ड भी पूरे करते हैं।

वरिष्ठ कवि, चिन्तक नन्द चतुर्वेदी ने शिवराम के साथ विभिन्न अवसरों पर अपनी मुलाकातों को याद करते हुए कहा कि शिवराम ने नाटकों के नये स्वरूप को विकसित किया। उनका सदैव यह प्रयास रहा कि नाटक दर्शकों के साथ-साथ आम प्रेक्षक वर्ग तक भी पहुँचे। इस दृष्टि से उनके नाटक पूर्ण सफल रहे हैं। शिवराम ने लुप्त होती जननाट्य शैली को पुनः विकसित किया था। उनका मुख्य उद्देश्य नाटकों को जनप्रिय बनाये रखने का था। इसीलिए उनके नाटक विभिन्न आस्वादों से युक्त रहते थे। नन्द चतुर्वेदी ने उनके नाटक ‘जनता पागल हो गई है‘, ‘पुनर्नव‘, ‘गटक चूरमा’ आदि नाटकों का जिक्र करते हुए कहा कि ये नाटक बहुत लोकप्रिय रहे। उन्होंने शिवराम के कवि कर्म को रेखांकित करते हुए कहा कि उनकी कवितायेँ एक विनम्र और शालीन कवि का आभास देने के साथ व्ययस्था में बदलाव की बेचौनी भी दर्शाती है.

प्रसिद्ध आलोचक प्रो. नवलकिशोर ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिवराम सच्चे मायने में एक सफल नाटककार होने के साथ-साथ अच्छे रंगकर्मी थे। रंगकर्म के साथ-साथ उनका नाट्य सृजन अनवरत चलता रहा। इनके नाटक उत्तरोत्तर नवप्रयोग को सार्थक करते रहे। प्रो. नवलकिशोर ने आगे कहा कि शिवराम ने इस प्रदर्शनकारी विधा का जनता के पक्ष में सदुपयोग किया। उन्होंने नाट्य साहित्य को जनसामान्य तक पहुँचाने का श्रेयस्कर कार्य किया। श्रमजीवी महाविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. मलय पानेरी ने शिवराम के विभिन्न नाटकों की चर्चा करते हुए कहा कि शिवराम के नाटक नाट्य रूढ़ियों को तोड़ने वाले थे। उनके नाटकों का मूल उद्देश्य जन-पहुँच था। इस दृष्टि से उन्होंने नाटकों के साथ कोई समझौता नहीं किया चाहे तात्विक दृष्टि से कोई कमजोरी ही क्यों न रह गई हो। शिवराम के नाटक आम प्रेक्षक के नाटक सिर्फ इसलिए बन सके कि उनमें सार्थक रंगकर्म हमेशा उपस्थित रहा है।हिन्दू कालेज,नई दिल्ली के हिंदी सहायक आचार्य डॉ. पल्लव ने शिवराम के कृतित्व को वर्तमान सन्दर्भों में जोखिम भरा बताया. उन्होंने कहा कि शिवराम ने लेखकीय ग्लेमर की परवाह किये बिना साहित्य और विचारधारा के संबंधों को फिर बहस के केंद्र में ला दिया.
जन संस्कृति मंच के राज्य संयोजक हिमांशु पंड्या ने शिवराम की संगठन क्षमता को प्रेरणादायक बताते हुए कहा कि ''विकल्प'' के मार्फत वे नयी सांस्कृतिक हलचल में सफल रहे. लोक कलाविद डॉ. महेंद्र भानावत ने कहा कि नाटकों को लोक से जोड़े रखना वाकई मुश्किल है और शिवराम ने अपने नाटकों के साथ हमेशा लोक-चिन्ता को सर्वोपरि रखा। उनकी यही खासियत उन्हें अन्य रचनाकारों से पृथक पहचान देती है। श्रमजीवी महाविद्यालय में हिन्दी प्राध्यापक डॉ. ममता पानेरी ने कहा कि शिवराम नाटककार के साथ-साथ अच्छे रंगकर्मी भी थे। रंगकर्म की उनकी समझ आज के संदर्भ में ज्यादा संगत लगती है। कार्यक्रम के अन्त में राजेश शर्मा ने कहा कि शिवराम जननाटकों के भविष्य थे। सार्थक रंगकर्मी के साथ ही अच्छा नाटककार होना शिवराम ने ही प्रमाणित किया है।

प्रस्तुति- डॉ. मलय पानेरी, उदयपुर

Friday, May 21, 2010

देश के सिस्टम पर प्रहार करता नाटक ‘फुटबाल के बराबर अंडा’ ......

वीडिओ संपादन एवं प्रस्तुति श्रीकन्त मिश्र 'कान्त'



चंडीगढ़। ‘बेशक देश में लोकतांत्रिक प्रणाली है, लेकिन आम जनता क्या आजादी से अपने बारे में सोच सोचती है। क्या लोग आजादी से काम कर सकते हैं। इंसाफ पाने के इंतजार में आम आदमी मौत के द्वार तक पहुंच जाता है,लेकिन इंसाफ नहीं मिल पाता। इस सबके बावजूद आम जनता इसी सिस्टम का पालन करने को मजबूर है और मिलकर इस सिस्टम के खिलाफ आवाज नहीं उठाती।’ देश के सिस्टम पर प्रहार करता नाटक ‘फुटबाल के बराबर अंडा’ सेक्टर-17 स्थित आईटीएफटी की बेसमेंट के मंच पर पेश किया आईटीएफटी के कलाकारों ने। नाटक की कहानी में पुलिस तंत्र में फैले भ्रष्टाचार पर कटाक्ष किया गया

एसएचओ बेनीवाल अपने नए स्टेशन में आकर उस समय परेशान हो जाता है जब उसे पता चलता है कि उस थाना क्षेत्र में कोई चोरी या अन्य अपराध नहीं होता। वह अपने हवलदारों के माध्यम से डकैतों तक यह संदेश पहुंचाता है कि वे बेफिक्र होकर उसके क्षेत्र में अपनी गतिविधियां चला सकते हैं। इतना ही नहीं, वह हवलदार से किसी भी व्यक्ति को पकड़ लाने का आदेश देता है तो हवलदार एक तमाशा दिखाने वाले को पकड़ लाता है। एसएचओ तमाशे वाले की बुरी तरह पिटाई करवाता है जिस पर तमाशे वाले उसके खिलाफ कोर्ट में केस कर देता है। लेकिन 30 साल तक इंतजार के बाद भी उसे इंसाफ नहीं मिल पाता और अंत में इंसाफ मिलने की उम्मीद लिए ही उसकी मौत हो जाती है। तमाशे वाले का किरदार निभाने वाले अंश ने दर्शकों के दिल पर अमिट छाप छोड़ तो अन्य पात्रों एसएचओ बने जगमीत, पत्रकार बनी अपराजिता, हवलदार बने नम्रता और अमन ने भी अपने-अपने पात्रों के साथ बखूबी न्याय किया। नाटक का लेखन और निर्देश चक्रेश कुमार का था ।

‘फुटबाल के बराबर अंडा’

Sunday, November 8, 2009

अंतरराष्ट्रीय महिला नाट्य लेखक (WPI- Women Playwright International) कॉंफ्रेंस में विभा रानी का नाट्य पाठ

विभा रानी के बेहद चर्चित नाटक "दूसरा आदमी दूसरी औरत" का नाट्य पाठ 6 नवम्बर, 2009 को दोपहर 12 बजे मुंबई में स्त्री मुक्ति संघटना एवं एकेडेमी ऑफ थिएटर आर्ट, मुंबई विश्वविद्यालय के सौजन्य से 1-7 नवम्बर, 2009 तक आयोजित WPI (WOmen Playwright International) यानी अंतर्राष्ट्रीय महिला नाट्य लेखक कॉंफ्रेंस में हुआ. प्रेम और सम्बन्ध के एक नए रूप पर आधारित इस नाटक का पाठ विभा रानी एवं अजय रोहिल्ला ने किया. विवाहेतर सम्बन्ध न तो आज के समय की देन है, न शरीर की ज़रूरत और मन की फिसलन का परिणाम. यह मन की अतृप्ति की एक अभिव्यक्ति है. प्रश्न यह नहीं है कि यह सम्बन्ध हुआ कैसे और क्यों हुआ? सवाल यह है कि इस सम्बन्ध का परिणाम क्या हो जो घर, परिवार को भी बनाए रखे और सम्बन्ध को भी. इसी की पडताल और विवेचना करता है यह नाटक.

विभा रानी हिन्दी और मैथिली की लेखक, नाट्य लेखक, नाट्य समीक्षक, रंगमंच अभिनेत्री व सामाजिक कर्मी हैं. अबतक उन्होंने 10 से अधिक नाटक लिखे हैं, जिनमें से दो नाटको "आओ तनिक प्रेम करें" तथा "अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो" को "मोहन राकेश सम्मान" से सम्मानित किया जा चुका है. विभा रानी लिखित व अभिनीत दो एक पात्रीय नाटक "लाइफ इज नॉट ए ड्रीम" का मंचन फिनलैंड, मुबई तथा राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव, रायपुर में तथा "बालचन्दा" का मंचन काला घोडा फेस्टिवल, मुंबई में किया जा चुका है. उनके अन्य एक पात्रीय नाटक "ऐ प्रिये, तेरे लिए" का मंचन मुंबई में हो चुका है. विभा रानी अभिनीत ताज़ातरीन नाटकों में से है डॉ. नरेन्द्र मोहन लिखित नाटक "मि. जिन्ना", जिसमें वे जिन्ना की बहन फातिमा की भूमिका में हैं. "दूसरा आदमी दूसरी औरत" का मंचन 2002 में भारतीय रंग महोत्सव, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में राजेन्द्र गुप्ता व सीमा बिश्वास द्वारा तथा मुंबई में इसका रंगपाठ राजेन्द्र गुप्ता व नीना गुप्ता द्वारा किया जा चुका है. विभा रानी ने अबतक 12 से अधिक किताबें लिखी हैं तथा "कथा" अवार्ड सहित कई पुरस्कार पा चुकी हैं.

अजय रोहिल्ला थिएटर के एक जाने माने अभिनेता, निर्देशक हैं. "दुलारीबाई", "सावधान पुरुरवा", "विदूषक", "चिट्ठी", खालिद की खाला", "मौली" जैसे नाटकों में अभिनय किया है. सभी प्रमुख संस्थानों, जैसे साहित्य कला परिषद, उर्दू अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, शाकुंतलम थिएटर आदि द्वारा आयोजित थिएटर फेस्टिवलों में एक निर्देशक के रूप में भाग ले चुके हैं. वे दिल्ली विश्वविद्यालय, गोवा कला अकादमी के विजिटिंग फैकल्टी रह चुके हैं. देश भर में ये थिएटर वर्कशॉप लेते हैं. अजय द्वारा अभिनीत कुछ महत्वपूर्ण फिल्में हैं- "बैंडिट क्वीन", "डॉ. अम्बेदकर", "गंगाजल", "मंगल पाडेय", "वारियर" आदि. अबतक 11 लघु फिल्में बन चुके अजय की एक फिल्म पिछले साल 2008 के सिंगापुर फिल्म फेस्टिवल में नामित हुई थी.

इस नाट्य पाठ में बडी संख्या में लोगों ने भाग लिया. आज के जीवन के एक बेहद निजी यथार्थ की बेहद प्रवाहमई और काव्यमई भाषा में प्रस्तुति को श्रोताओं ने बहुत सराहा.

Friday, October 30, 2009

मुंबई में 8वां महिला नाट्यलेखक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 1 नवम्बर से



मुंबई में 8वां महिला नाट्यलेखक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन यानी Women Playwright International (WPI) 1 से 7 नवम्बर, 2009 तक मुंबई विश्वविद्यालय के अकेडमी ऑफ थिएटर आर्ट तथा स्त्री मुक्ति संघटना, मुंबई के सौजन्य से आयोजित किया जा रहा है. WPI के गठन का उद्देश्य थिएटर के क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढाना है. इस बार के सम्मेलन की थीम है, उदारता व सहिष्णुता (Liberty and Tolerance). इसके सब थीम में हैं, अपनी पहचान, संस्कृति और उसकी विभिन्नता, अहिंसा के रास्ते जीवन जीना, पितृसत्तात्मकता की चुनौतियां, सामाजिक-राजनीतिक विश्व में थिएटर की भूमिका, थिएटर में हास्य आदि हैं. इस सम्मेलन का उद्देश्य यह भी है कि एक प्लेटफॉर्म पर महिला थिएटरकर्मियों के परस्पर मिलने, सोशल नेटवर्किंग और कलात्मक आदान प्रदान का मंच दिलाना, महिला नाट्य लेखकों के काम को स्टेज करने के और भी अवसर प्रदान करना, महिला नाट्यलेखकों के लेखन व उनके क्राफ्ट को प्रेरित करना, सृजित करना, उन्हें शिक्षित और विकसित करना, महिला नाट्यलेखकों को लिंगगत आलोचनाओं से अलग रखना, महिला नाट्यलेखन की समीक्षा और उसके अध्ययन को बढावा देना, अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए उन्हें सेंसरशिप व राजनीतिक दवाब से बचाना है।



1988 से अबतक ये सम्मेलन न्यूयॉर्क, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, आयरलैंड, ग्रीस, फिलीपिंस, व इंडोनेशिया में हो चुके हैं. इस साल यह मुंबई में आयोजित है. स्त्री मुक्ति संघटना एक गैर राजनीतिक, स्वयंसेवी संस्था है, जिसकी स्थापना 1975 में ज्योति म्हापसेकर ने महिलाओं के सामाजिक, मानसिक, आत्मिक उत्थान, जागरुकता बढाने और महिलाओं से सम्बंधित मामलों के साथ साथ बराबरी, शांति और विकास के उद्देश्य से की. इसका अपना एक थिएटर ग्रुप भी है. इनका वेबसाइट है http://www.streemuktisanghatana.org/ अकेडमी ऑफ थिएटर आर्ट की स्थापना मुंबई विश्वविद्यालय के तहत 2003 में थिएटर प्रशिक्षण के उद्देश्य से शुरु हुई. अकादमी का थिएटर आर्ट्स में दो साल का फुल टाइम मास्टर डिग्री कोर्स है. इनका वेबसाइट है http://www.mu.ac.in/ यह सम्मेलन मुंबई विश्वविद्यालय के कलीना स्थित कैम्पस में आयोजित है. यदि आप इसमें भाग लेना चहते हैं तो आप wpi09mum@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं। कार्यक्रम का विवरण www.wpi09.in में लॉगिन करके देखा जा सकता है।

मुम्बई से विभा रानी

Monday, September 21, 2009

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जन्म शताब्दी समारोह का नये संकल्पों के साथ समापन


नई दिल्ली । 20 सितंबर 2009

राष्ट्रकवि दिनकर वर्ष जन्मशताब्दी के अवसर पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास द्वारा राष्ट्र कवि दिनकर की जन्म शताब्दी के समापन समारोह का आयोजन चिंतनपरक सत्रों, नाटक और कवि सम्मेलन के माध्यम से किया गया. उद्घाटन भाषण में भारतीय संस्कृति के महान चिंतकों में डॉ. मुरली मनोहर जोशी, डॉ.रत्नाकर पांडेय, श्री ललितेश्वर प्रसाद शाही (पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री, भारत सरकार ), श्री शांता कुमार (पूर्व मुख्य मंत्री, हिमाचल प्रदेश एवं सांसद राज्य सभा), डॉ. भीष्म नारायण सिंह, डॉ. रामजी सिंह, डॉ. अरूण कुमार, श्री वशिष्ठ नारायण सिंह, पद्मश्री संतोष यादव(माउंट एवेरेस्ट विजेता) आदि थे।

उद्घाटन सत्र में डॉ. रत्नाकर पांडेय ने अपने चिंतनपरक आख्यान में दिनकर की इन पंक्तियों का उल्लेख किया—समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध-कि अब समय आ गया है कि हम तट्स्थ न रहें, हमारा मौन रहना हमारी निष्क्रीयता का द्योतक है. और इतिहास हमें क्षमा नहीं करेगा। भारतीय संस्कृति के चार अध्याय में उन्होंने जो भाव व्यक्त किए हैं उसमें सांस्कृतिक उत्थान में हर जन की सहभागिता कालांतर से रही है। उन्होंने दिनकर के कवि रूप का जिक्र करते हुए ये पंक्तियां कहीं—मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं, उर्वशी अपने समय का सूर्य हूँ मैं। इसके अलावा उन्होंने अनेक प्रसंगों का भी जिक्र किया जो दिनकर का मूल चिंतन था।

इस वैचारिक व्याख्यान में डॉ. रामजी, डॉ. शांता कुमार, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, डॉ. भीष्म नारायण सिंह, डॉ. अरूण कुमार के द्वारा विचार ऐसे प्रस्तुत किए गये थे कि दिनकर के चिंतन की वैचारिक गरमाहट की अनुभूति को मावलंकर सभागार में उपस्थित श्रोताओं ने गहराई से महसूस किया।

उद्‍घाटन सत्र के बाद 'मैं नालंदा हूँ' नाटक का मंचन हुआ जो नालंदा के अतीत और विध्वंस तथा आज उसकी महत्ता पर कसे हुए निर्देशन में भली भांति अभिनीत किया गया।

द्वितीय सत्र की संगोष्ठी में शामिल वक्ताओं में डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल, डॉ.रामजी सिंह, डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय, डॉ. गोपाल राय, प्रो. गोपेश्वर सिंह, डॉ. केशुभाई देसाई, श्री नारायण कुमार, श्री अमरनाथ अमर आदि थे।

उद्‍घाटन सत्र में ही प्रो. गोपाल राय और सत्यकाम द्वारा संपादित पुस्तक 'दिनकर-व्यक्तित्व और रचना के आयाम तथा संस्कृति से संवाद– रामधारी सिंह दिनकर स्मारिका' का लोकार्पण भी हुआ।

अंतिम सत्र में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें –सर्वश्री गोपाल दास नीरज, भगवान प्रलय, मुमताज नसीम, सत्येन्द्र सत्यर्थी, विवेक गौतम, सुश्री आकृति शशांक, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, विनीत चौहान, अमर नाथ अमर, हरमिंद्र पाल, पंकज सुबीर और नमिता राकेश आदि प्रमुख थीं।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. सत्यकेतु सांकृत और समंवय नीरज कुमार ने किया।

न देखे विश्व पर मुझको घृणा से,
मनुज हूं, सृष्टि का शृंगार हूं मैं,
पुजारिन! धूलि से मुझको उठालो,
तुम्हारे देवता का हार हूं मैं ----


अन्य झलकियाँ-











रिपोर्ट‍- शमशेर अहमद खान
2-सी, प्रैस ब्लाक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस, दिल्ली-110054

Tuesday, September 8, 2009

"जिस लाहौर नहीं वेख्या…. राजनीतिक नाटक नहीं है” – असग़र वजाहत



लंदन।
"जिस लाहौर नहीं वेख्या…. नाटक…. राजनीतिक नाटक नहीं है। हां यह संभव है कि विभाजन की पृष्ठभूमि होने के कारण राजनीति की अण्डरटोन सुनाई दे जाती हों। किन्तु कहीं भी राजनीति इस नाटक का मुख्य स्वर नहीं है।" यह कहना था हिन्दी के प्रख्यात नाटक लेखक डा. असग़र वजाहत का जब वे कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स द्वारा आयोजित नाटक की बीसवीं वर्षगांठ पर लंदन के नेहरू केन्द्र में आयोजित एक समारोह में बोल रहे थे।

डा. वजाहत ने आगे कहा कि “यह नाटक दिखाता है कि आम आदमी, जिसका प्रतिनिधित्व नासिर काज़मी, मौलवी साहब या मिर्ज़ा साहब करते हैं, ठीक ठाक और अच्छा भला है। समस्या है राजनीतिज्ञों की या फिर उस तबके की जो कि साम्प्रदायिक्ता को अपना मज़हब मानती है। बुरे लोग कम हैं मगर शक्तिशाली हैं।“ इस नाटक का आयोजन अमरीका, आस्ट्रेलिया और भारत के बहुत से शहरों में किया जा रहा है।

मुख्य अतिथि श्री विरेन्द्र शर्मा (एम.पी.) ने कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स को धन्यवाद दिया कि उन जैसे राजनीतिज्ञ को इतने महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होने का मौक़ा दिया। उन्होंने असग़र वजाहत को बधाई देते हुए कहा कि यह नाटक भाईचारे, आपसी प्यार, धार्मिक सहनशीलता का संदेश देता है। आम आदमी सांप्रदायिक नहीं होता। छोटे क्षेत्रों में आज भी हिन्दू मुस्लिम मिलजुल कर रहते हैं। हिन्दू वो नहीं जो मस्जिद तोड़े और न ही वो मुसलमान है जो मंदिर तोड़े। विरेन्द्र शर्मा ने नाटक के वीडियो क्लिप एवं पाठ की बहुत सराहना की।

नाटक के इतिहास को समेटने वाली पुस्तक - २ डिकेड्स ऑफ़ ए प्ले (वाणी प्रकाशान) का लोकार्पण करते हुए काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा, "असग़र वजाहत ने जिस लाहौर नहीं वेख्या .... को सिर्फ़ मानवीय त्रासदी तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि दोनों समुदायों की सोच को समझने का प्रयास किया है। नाटक हमें यह बताता है की दोनों समुदायों के बीच ऐसा क्या हुआ जिस से सास्कृतिक एकता, मोहल्लेदारी, प्रेम, विश्वास, भाईचारा सब ख़तम हो गए थे। लेखक ने यह दिखाया है की समाज विरोधी तत्व किस तरह से मज़हब का फायदा उठाते हैं। पात्रों का चित्रण तार्किक है तथा नाटक में पंजाब और लखनऊ की संस्कृति की मानवीय स्तर पर तुलना बहुत संवेदनशील है।"


बाएं से (बैठे हुए) – अचला शर्मा, असग़र वजाहत, विरेन्द्र शर्मा, ज़कीया ज़ुबैरी, रवि शर्मा। खड़े हुएः अजित राय, के.सी. मोहन, शमील चौहान, बदी-उ-ज़मां, तेजेन्द्र शर्मा। चित्रः दीप्ति कुमार।

कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए इसे मंच के लिये त्रासदी बताया कि मूल हिन्दी नाटकों की हमेशा से कमी महसूस की गई है। ऐसे में किसी हिन्दी नाटक के बीस वर्षों में भिन्न भारतीय भाषाओं में बारह सौ से भी अधिक शो होना नाटक की महानता का जीता जागता सबूत है। असग़र वजाहत ने इस नाटक में केवल विभाजन की त्रासदी का चित्रण ही नहीं किया है। उन्होंने इस समस्या को आर्थिक, सामाजिक एवं साम्प्रदायिकता के स्तर पर प्रस्तुत किया है। एक लेखक के तौर पर जिस लाहौर नहीं वेख्या... असग़र वजाहत के साहित्यि की सर्वोच्च उपलब्धि है। भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति का अद्भुत नमूना।

नाटक पर गंभीर चर्चा करते हुए प्रोफ़ेसर मुग़ल अमीन ने कहा, “जिस लाहौर नहीं वेख्या.... की सादग़ी के पीछे यह सबक़ छिपा हुआ है कि सरवाइवल की जिस जंग में इन्सान पैदा होता है, उसका तकाज़ा है कि ख़ुद ज़िन्दा रहने के लिये ज़रूरी है कि दूसरों को ज़िन्दा रखा जाए। ये सबक़ मेरा भी और तेरा भी।"

अचला शर्मा ने नाटक के एक दृश्य को श्रोताओं के सामने प्रस्तुत किया। नाटक के इस ड्रामाई पाठ में रवि शर्मा (पहलवान), बदी-उ-ज़मां (अलीम) एवं तेजेन्द्र शर्मा (नासिर काज़मी) ने भाग लिया। अचला शर्मा का कहना था, "किसी रचना या किसी पुस्तक का सही मूल्यांकन शायद दस-बीस बरस बाद ही किया जा सकता है क्योंकि कालजयी रचना की पहचान समय, संदर्भ और परिस्थियाँ बदल जाने के बाद ही होती है। असग़र वजाहत का नाटक- जिस लाहौर नइ देख्या- की प्रासिंकगता मेरी नज़र में, मज़हब को लेकर फैली भ्रांतियों और आम आदमी के मन में व्याप्त विभ्रम पर वह बहस है जो आज भी उतनी ही अहम है जितनी विभाजन के समय या बीस वर्ष पहले रही। बहस आज भी जारी है, भले ही संदर्भ, परिदृश्य और पात्र बदल गए हैं।"

शमील चौहान ने अपनी गहरी आवाज़ में नाटक में इस्तेमाल की गई नासिर काज़मी की एक ग़ज़ल गा कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। पत्रकार अजित राय ने कार्यक्रम के दौरान असग़र वजाहत से बातचीत की।

कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त भारत से मनोज श्रीवास्तव (कवि - भोपाल), प्रीता वाजपेयी (कवियत्री - लखनऊ), आनन्द कुमार (हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी), आई.एस. चुनारा, ललित मोहन जोशी, विजय राणा, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, के.सी. मोहन (पंजाबी), के.बी.एल. सक्सेना, महेन्द्र दवेसर, कादम्बरी मेहरा, डा. हबीब ज़ुबैरी, मंजी पटेल वेखारिया, उर्मिला भारद्वाज, अनुज अग्रवाल (प्रकाशक) आदि मौजूद थे।

प्रस्तुति : दीप्ति कुमार

Sunday, July 19, 2009

शिमला के एतिहासिक गेयटी थियेटर में देवदास नाटक की सफल प्रस्तुतियां

प्रसिद्ध रंग कर्मी हबीब तनवीर और मनोहर सिंह को समर्पित

चुन्नी बाबू के रूप में गिरीश और पारो के रूप में प्रभा

शिमला।

पिछले दिनों शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थियेटर में अखिल भारतीय रंग एवं कला मंच ’डिजाइन इंडिया’ द्वारा भारत में पहली बार, बांग्ला उपन्यासकार शरत्‌चन्द्र की अमर कृति देवदास पर आधारित तथा प्रख्यात लेखक श्री जगदम्बा प्रसाद दीक्षित द्वारा मंच के लिए रूपान्तरित नाटक देवदास की दो सफल प्रस्तुतियां अभिमन्यु पांडेय के निर्देशन में की गई। अभिमन्यु पिछले कई वर्षों से मुम्बई में रंगमंच तथा छोटे पर्दे की गतिविधियों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। हाल ही में उनके द्वारा निर्देशित नाटक ’मैं एकाकी’ काफी चर्चा में रहा है जिसके अब तक 19 मंचन हो चुके हैं।

इस नाटक को करने का श्रेय शिमला के कलाकार गिरीश हरनोट को जाता है जो पिछले पांच सालों से मुम्बई में कई सीरियलों में अभिनय कर चुके है और बड़े कमर्शियल ब्रांडों के विज्ञापनों में मॉडल के रूप में अपनी व्यावसायिक पहचान बना चुके हैं। दीक्षित ने इस नाटक के मंचन का उत्तरदायित्व गिरीश को सौंपा जिन्होंने इसके मंचन के लिए अपनी गृहभूमि शिमला चुनी और गेयटी थियेटर के जिर्णोद्धार के ऐतिहासिक अवसर पर स्थानीय कलाकारों के साथ इसकी दो सफल प्रस्तुतियां 6 और 10 जुलाई, 2009 को बिना किसी सरकारी सहयोग से कीं। इन प्रस्तुतियों का सम्पूर्ण संयोजन ’डिजाइन इंडिया’ के मुख्य संरक्षक एवं समन्वयक एस.आर हरनोट किया। इन प्रस्तुतियों को प्रसिद्ध रंग कर्मी हबीब तनवीर और हिमाचल वासी मनोहर सिंह को समर्पित किया गया।


कलाकारों के साथ मुख्य अतिथि कृष्ण किशोर

डिजाइन इंडिया द्वारा प्रस्तुत नाटक देवदास का प्रतिपादन रूपान्तरकार ने आज के देशकाल के सामाजिक सरोकारों के दृष्टिगत अलग ढंग से किया है जिसकी वजह से इस कथा को एक नया रूप मिला है। क्षरित हो रहे ठेठ रूढ़िग्रस्त बांगला समाज और सांस्कृतिक परिवेश की कथा होते हुए भी नाटक का यह संस्करण मूलतः एक अति यर्थाथवादी मंचीय निष्पादन है जो हमारे समय की नई पीढ़ियों के आंतरिक आक्रोश और भावोन्नयन को जाहिर करता है। यह नाटक बीती सदी के पहले दशक में लिखा गया था जिसका अब तक तीन बार फिल्मांकन हुआ है। हर बार एक नए देवदास की कल्पना लेकर। नाटक के इस रूप में इसका पहली बार मंचन हुआ है, एक बिल्कुल नए और समसामयिक भावबोध के साथ। प्रस्तुत नाटक की विशेषता यह है कि इसका स्थायी भाव प्रेम की असफलता के साथ-साथ उससे उत्पन्न मनुष्य के अस्तित्व की दुश्वारियां भी हैं जिन्हें नाटककार दीक्षित ने मूलतः जीवन और मरण के विचारबिन्दुओं के माध्यम से हल किया है। यह एक श्रेण्य नाटक है जिसे समझने और सही आस्वादन के लिए आम और सुधि दर्शक को इसके एब्सर्ड शैली-शिल्प और ठोस विचार-दर्शन की गहराईयों व जटिलताओं से भी गुजरना होगा तथा नाटक की विलक्षण विरूपता से साक्षात्कार करना होगा।

पारो के रूप में स्वाति और चौधरी के रूप में राकेश
नाटक में अभिमन्यु पांडेय-देवदास, गिरीश हरनोट-चुन्नी बाबू और चैधरी महाशय की भूमिका में राकेश शर्मा थे जबकि पहली प्रस्तुति में पार्वती का किरदार उषा और चन्द्रमुखी का रितिका ने निभाया और दूसरी प्रस्तुति में ये भूमिकाएं उषा और प्रभा ने निभाई। ये चारों लड़कियां कथक की छात्राएं हैं जिनके सुलझे हुए अभिनय से यह कदापि नहीं लगा कि इन्होंने पहली बार किसी नाटक में अभिनय किया हैं। अभिमन्यु पांडेय ने जहां देवदास का किरदार अत्यन्त गंभीर और कलात्मक मुद्रा में निभाया वहां चुन्नी बाबू के किरदार में गिरीश हरनोट ने दर्शकों को बेहतरीन अभिनय से खूब हंसाया। महाशय की भूमिका में राकेश शर्मा ने दर्शकों के मन में अच्छी छाप छोड़ी। राकेश शिमला दूरदर्शन में समाचार वाचक के रूप में कार्यरत हैं। नाटक के प्रचार संयोजक जगदीश हरनोट थे। इस नाटक के लिए गीत व संगीत मुम्बई में ही तैयार किया गया है। गीतकार वी.के.मेहता हैं जिन्हें पामेला जैन, परमानंद यादव और रमीन्द्र जैसे प्रसिद्ध गायकों ने अपनी मधुर आवाज़ से संवारा है।

पहली प्रस्तुति में मुख्य अतिथि श्री कृष्ण किशोर, आस्टिन यूएसए से प्रकाशित इण्डो-अमेरिकन पत्रिका ’अन्यथा’ एवं अंग्रेजी पत्रिका 'Otherwise' के संपादक थे जिन्होंने डिजाइन इंडिया को पच्चास हजार रूपए के सहयोग देने की घोषणा की। उनके साथ प्रसिद्ध दलित लेखक व चिंतक मोहनदास नैमिशराय भी मौजूद थे। दूसरी प्रस्तुति में मुख्य अतिथि-श्रीमती आशा स्वरूप, मुख्य सचिव, हि॰प्र॰ सरकार एवं विशेष अतिथि के रूप में श्री मंजूर एहतेशाम, प्रख्यात कहानीकार पधारे जिन्होंने नाटक और कलाकारों की भूमिकाओं को खूब सराहा।


चुन्नी बाबू के रूप में गिरीश

प्रस्तुति- एस.आर.हरनोट
ओम भवन, मोरले बैंक इस्टेट, निगम विहार, शिमला-171002 मोः 098165 66611