Saturday, October 10, 2009

'हिंद स्वराज' के 100 वर्ष और विचार-गोष्ठियों पुस्तक-विमोचनों का गर्मागर्म-सिलसिला (वीडियो)

रिपोर्ट- प्रेमचंद सहजवाला


कोलॉज (दक्षिणावर्त)- 1॰ कार्यक्रम-सूचक-पट, 2॰ प्रभास जोशी के साथ प्रेमचंद सहजवाला, 3॰ गाँधी जी का पोस्टर, 4॰ वर्षा दास, 5॰ कन्हैयालाल नंदन और अन्य प्रबुद्ध दर्शक, 6॰ विमल प्रसाद, प्रभास जोशी, 7॰ वर्षा दास, विमल प्रसाद

महात्मा गाँधी पूरी मानव-सभ्यता के लिए अहिंसा-दूत बन कर अवतरित हुए थे। विश्व के महापुरुष महात्मा गाँधी की तुलना ईसा मसीह और गौतम बुद्ध से करते हैं। इस सन्दर्भ में विश्व-प्रसिद्व नोबेल-पुरस्कार विजेता लेखक रोमेन रोलैंड व गाँधी की प्रसिद्व शिष्य मीरा बहन, जिसे वे अपनी बेटी मानते थे, के बीच हुए वार्तालाप का सन्दर्भ देना अप्रासंगिक न होगा। मीरा बहन का मूल नाम मैडलीन स्लेड था तथा उस के पिता भारतीय सेना में तैनात, ब्रिटिश के सेनाधिकारी थे। मैडलीन स्लेड अपनी युवावस्था में किसी आध्यात्मिक गुरु की तलाश में बेचैन सी थी। इसी सिलसिले में वह फ्रांस गई, जहाँ उस की भेंट रोमेन रोलैंड से हुई और उस ने उन्हें अपनी समस्या बताई। रोमेन रोलैंड ने मैडलीन स्लेड से पूछा- 'क्या तुम ने महात्मा गाँधी का नाम सुना है?' मैडलीन ने कहा- 'नहीं तो!' रोमेन रोलैंड ने फ़ौरन कहा- 'वह इस पृथ्वी पर एक और यीशु हैं।' मीरा बहन एक वर्ष की तैयारी के बाद भारत आई तो गाँधी जी की बेटी बन कर उन के साथ आश्रम में रहने लगी। वह सन् 55 तक भारत में रही थी।

गाँधी जब बैरिस्टर बनने के उद्देश्य से पहली बार घर से बाहर निकले और लंदन गए तो वहां की शाकाहारी संस्था के सदस्य भी बने, पर उनकी प्रारंभिक शख्सियत पर ईसाई धर्म का प्रभाव स्पष्ट था और समय के साथ ईसा की तरह वे भी अहिंसा के पुजारी बन गए। ईसा ने ही कहा था कि यदि कोई आप को एक गाल पर तमाचा मारे तो फ़ौरन अपना दूसरा गाल भी आगे कर दो। गाँधी जी ने ईसा की इस शिक्षा को अक्षरशः आत्मसात् कर लिया और अपने अनुयायियों को भी यही शिक्षा दी। समाज में इस शिक्षा की खिल्ली उड़ाने वाले भी कम नहीं, तो सावरकर की तरह उल्टी शिक्षा देने वाले भी कमी नहीं कि अहिंसा किसी भी देश की अवनति का कारण होती है। इस के प्रमाण स्वरुप सावरकर मौर्य वंश के महानतम सम्राट अशोक का उदहारण देते हैं कि जब तक वे बुद्ध धर्म की शरण में नहीं गए थे, तब तक उन्होंने दिग्विजय हासिल कर ली। कलिंग युद्ध भी जीत लिया, पर बुद्ध की शरण में जा कर अहिंसा का पुजारी बनते ही अशोक महान के साम्राज्य का पतन हो गया और सन् 184 ई. पू में उन के ही एक वंशज राजा वृहदरथ को उस के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने मार कर मौर्य वंश को समाप्त कर के अपना शुंग वंश स्थापित किया! बहरहाल, आज के इस विध्वंसकारी आतंकी युग में भी गाँधी की अहिंसा किस सीमा तक ज़रूरी है, इस का प्रमाण यही है कि सन् 2007 में संयुक्त राष्ट्र ने गाँधी जन्म-दिवस (2 अक्टूबर) को 'अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस' घोषित कर दिया। पर सन् 2009 की एक विशिष्टता यह भी है कि इस वर्ष से पूरे 100 वर्ष पहले, यानी 1909 में गाँधी ने एक बेहद विवादस्पद पुस्तक 'हिंद स्वराज' भी लिखी थी, जिस के विषय में मैं अपनी पिछली रिपोर्ट 'गाँधी की पुस्तकों पर हिंदी अकादमी द्वारा यादगार कार्यक्रम' ('हिन्दयुग्म' 24 अगस्त 2009 ) में भी लिख चुका हूँ। इस पुस्तक के लेखन की शताब्दी पर देश भर में गोष्ठियों और पुस्तक-विमोचनों का एक सिलसिला सा चल पड़ा है, जो जाने माने पत्रकार प्रभास जोशी के अनुसार 22 नवम्बर तक चलता रहेगा। गाँधी जी ने यह पुस्तक 1909 में लन्दन से दक्षिण अफ्रीका (जहाँ उन्होंने 1893 से 1914 तक भारतवासियों के साथ हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष किया), लौटते समय 'किल्दोनन' नामक जहाज़ में केवल दस दिन में (13 नवम्बर से 22 नवम्बर) लिख डाली थी। पुस्तक की तुलना विश्व के कई महापुरुष 'श्रीमद भगवद गीता' और 'बाइबल' तक से करते हैं, हालांकि कई विद्वान इस प्रकार की भावना से इत्तेफाक नहीं रखते। उन का मानना है कि पुस्तक बेहद अव्यवहारिक है, और आज के युग की इस तेज़ रफ्तार ज़िन्दगी में इस पुस्तक की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई। परन्तु पत्रकार प्रभास जोशी व देश के अनेक बुद्धिजीवी ऐसा नहीं मानते। गाँधी जन्म दिवस 2 अक्टूबर 2009 की पूर्व संध्या यानी 1 अक्टूबर 2009 को 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' में गाँधी सम्बंधित फोटो-प्रदर्शनी का उद्‍घाटन करने के बाद प्रभास जोशी ने अपने भाषण में 'हिंद स्वराज' को आज भी पूर्णतः प्रासंगिक माना। इस अवसर पर 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' द्वारा संकलित व प्रकाशित, अंग्रेज़ी पुस्तक 'Gandhiji on Hind Swaraj and Select Views of Others' का विमोचन भी प्रभास जोशी के कर कमलों से हुआ। मंच पर प्रभास जोशी के साथ उपस्थित थे 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' के चेयरमैन प्रो. बिमल प्रसाद व कार्यक्रम का संचालन कर रही थी संग्रहालय की निदेशिका डॉ. वर्षा दास। सभागार में कन्हैयालाल नंदन व अन्य कई विद्वान भी उपस्थित थे। गाँधी के सत्य व अहिंसा से तो आज भी विश्व के विचारकों का एक बहुत बड़ा वर्ग सहमत है, लेकिन गाँधी ने 'हिंद स्वराज' में विज्ञान तक का विरोध किया है, इस लिए कतिपय लोग उन के विचारों को या तो पुरातनपंथी मानते हैं, या फिर दकियानूसी। परन्तु प्रभास जोशी ने स्पष्ट किया कि गाँधी यह मानते थे की मशीन और विज्ञान इंसान को गुलामी के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकते। वैसे मशीन के विरुद्ध रह कर भी एक सत्य यह है कि गाँधी स्वयं मानते थे कि मशीन का हम कितना भी विरोध करें, मशीन रहेगी. यह बात एक विरोधाभास जैसी भी लग सकती है। इस अवसर पर लोकार्पित पुस्तक के एक लेख में भी गाँधी के सचिव महादेवन देसाई, दो विदेशी विचारकों, मिडलटाऊन मुर्रे व प्रो. डेलिसले बर्न्स के उदहारण दे कर उनके और गाँधी के बीच मशीन पर हुए वार्तालाप को संदर्भित करते हैं। मिडलटाऊन कहते हैं कि गाँधी यह भूल जाते हैं कि जिस चरखे को वे बहुत प्यार करते हैं, वह चरखा भी तो आखिर एक मशीन है, जबकि डेलिसले कहते हैं कि नाक पर सवार चश्मा भी तो आखिर नज़र के लिए एक मशीनीकृत उपकरण ही है न! किसान का हल भी एक मशीन है और कुँए से पानी खींचने की चरखी भी हज़ारों साल से इंसान की ज़िन्दगी की बेहतरी के लिए किये गए मशीननुमा प्रयासों में से एक रही है। गाँधी मशीन द्वारा दुरुपयोग की बात करते हैं, पर यदि दुरुपयोग बुराई है तो दुरुपयोग को ही बुराई कहा जाए, मशीन को क्यों! गाँधी कहते हैं कि यूं तो इंसान का शरीर भी एक मशीन ही है न! मैं जिस बात पर आपत्ति करता हूँ, वह मशीन नहीं है, वरन मशीन के प्रति एक जूनून सा है। इन्हें मेहनत बचाने का जूनून है, और मेहनत बचाने का उपकरण ये मशीन को मानते हैं। लोग मेहनत बचाते जाते हैं, जब तक कि हज़ारों लोग बेरोज़गार नहीं हो जाते और भुखमरी में जीने के लिए गलियों में झोंक नहीं दिए जाते। मैं चाहता हूँ कि मेहनत की बचत हो, परन्तु सारी मानव जाति के लिए, न कि मुट्ठी भर लोगों (पूंजीपतियों) के लिए। गाँधी आगे स्पष्ट करते हैं कि अपनी बात में मैं चंद प्रबुद्ध अपवाद (Intelliegent exceptions) ज़रूर लूँगा, जैसे कि 'सिंगर सिलाई मशीन' ही लीजिये। यह कुछ चुनिन्दा उपयोगी वतुओं में से है और इस मशीन में कितना तो रोमांस है!

इस पर प्रश्नकर्ता चुटकी ले कर पूछते हैं कि फिर तो इस 'सिंगर सिलाई मशीन' को बनाने के लिए भी एक बड़ा कारखाना होगा। गाँधी का उत्तर था- 'हाँ, पर में प्रचुर मात्रा में समाजवादी हूँ और कहूँगा कि ऐसे कारखाने राष्ट्रीयकृत हों और राज्य द्वारा नियंत्रिंत हों'...(लोकार्पित पुस्तक पृष्ठ 235 -36 )।

प्रभास जोशी ने मशीन के प्रति मानव की गुलामी का ज़िक्र करते हुए कहा कि गाँधी जी के अर्थों में 'स्वराज' का अर्थ न तो 'आर्थिक स्वराज' था, न 'सामाजिक' और न 'राजनैतिक'. 'स्वराज' से उन का तात्पर्य शुद्ध 'आध्यात्मिक स्वराज' से था। पर गाँधी यह स्पष्ट करते थे कि 'आध्यात्मिक स्वराज' का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति हिमालय की गुफाओं में जा कर रहना शुरू कर दे, वरन यदि इसी समाज में रह कर वह हर ऐसा कार्य करे, जो उसे उक्त सब स्वराजों से स्वतंत्र कर के 'आध्यात्मिक स्वराज' की तरफ ले जाए तो वह सही अर्थों में 'स्वराज' है।

अपने विस्तृत भाषण में प्रभास जोशी ने यह भी कहा कि गाँधी का सब से अधिक ज़ोर व्यक्ति के आचरण पर रहता था। वे 'स्वराज' की तलाश में निकले हुए आदमी थे और यह मानते थे कि जो कुछ उन्होंने कहा है, लिखा है, बोला है, वही उन का सन्देश भी है (वैसे गाँधी का यह वाक्य भी विश्व-प्रसिद्ध है - My Life is My Message)। जहाँ एक तरफ 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' चेयरमैन प्रो. बिमल प्रसाद ने 'हिंद स्वराज' को भारत के लिए एक manifesto कहा, जिस का सन्देश गाँधी के अनुसार यही कि 'हिंसा और पश्चिमी सभ्यता साथ-साथ चलते हैं तथा सत्याग्रह व भारतीय सभ्यता साथ-साथ चलते हैं', वहीं प्रभास जोशी ने कहा कि 'हिंद स्वराज' विश्व की तीन शीर्षस्थ पुस्तकों में से एक है जिन में कार्ल मार्क्स का विश्व प्रसिद्ध manifesto (Das Capital) भी है।

जिस सादगी से गाँधी ने जीवन जिया, व अपने आदर्शों को प्रतिपादित किया, वह सर्वविदित है। अतः गाँधी पर इस सभा में व्यक्त विचार भी सादगी से उतने ही परिपूर्ण, परन्तु सारगर्भित रहे। सभा समापन के बाद भी, जलपान के दौरान प्रभास जोशी कई आंदोलित-हृदय जिज्ञासुओं से घिरे रहे व गाँधी तथा 'हिंद स्वराज' को ले कर सब के मन के संशयों का निवारण करते रहे। यह स्वाभाविक भी था। जिस पुस्तक ने लियो तोल्स्तोय, हर्मन कालेनबैच (जिन्होंने ने दक्षिण अफ्रीका में जान्स्बर्ग के निकट 'तोल्स्तोय फार्म' के लिए गाँधी को ज़मीन दी थी) जैसे, विश्व के असंख्य दार्शनिकों विचारकों की नींद हराम कर के रख दी, और ब्रिटिश जिस पश्चिमी सभ्यता का भोंपू यहाँ बजाने आई थी, उसी को कटघरे में खड़ा कर दिया, उस पुस्तक की शाश्वतता का ही प्रमाण है कि आज भी वह मस्तिष्क को उद्वेलित कर के रख देती है और विचारों में एक आंदोलनकारी टकराहट पैदा करती है। वैसे इस पुस्तक को ले कर एक रोचक बात यह भी कि जब इसे गाँधी के राजनैतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले ने पहली बार पढ़ा तो कहा था कि यह पुस्तक किसी मूर्ख की कृति थी (सन्दर्भ The Good Boatman - A Portrait of Gandhi by Rajmohan Gandhi p 162)। परन्तु जब 1938 में भी इस पुस्तक का नया संस्करण गाँधी ने छपवाया तब उन्होंने भूमिका में लिखा कि पहले संस्करण से मुझे आज भी कोई भी परिवर्तन करने की ज़रुरत महसूस नहीं हुई। इस पुस्तक में मैंने केवल एक शब्द बदला है, जो किसी महिला ने मुझे पत्र लिख कर कहा था कि कुछ असभ्य सा लगता है. उस एक शब्द के अतिरिक्त कहीं भी किसी भी प्रकार के परिवर्तन की ज़रुरत या द्वंद्व मैं अपने भीतर नहीं महसूस कर पाया हूँ! इस मात्र 30,000 शब्दों वाली अमर पुस्तक में आखिर ऐसा क्या है, कि वह हर दशक, हर सदी में चर्चा का एक संग्राम छेड़ देती है, यह जानने के लिए क्या बेहतर नहीं है किसी भी उचित स्रोत से इसे प्राप्त कर के तन्मयता से पढ़ा जाए!

देखिए- गाँधी की 140वीं जयंती की पूर्व संध्या पर गाँधी की पुस्तक 'हिन्द-स्वराज्य' पर अपने विचार व्यक्त करते वरिष्ठ पत्रकार प्रभास जोशी






पुनश्च- मेरे सीमित ज्ञान के अर्न्तगत इस पुस्तक को एक तो 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय', (दिल्ली) ने छपवाया है और एक 'हिंदी अकादमी' (दिल्ली) ने।

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2 पाठकों का कहना है :

Sumita का कहना है कि -

गाँधी यह मानते थे की मशीन और विज्ञान इंसान को गुलामी के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकते। सौ साल पूर्व कही गयी गांधी जी की यह बात आज सौ प्रतिशत सच साबित हो रही है। सांइस के दुरुपयोग से आज हम परमाणु के ढेर पर बैठे हैं और भौतिक संसाधनों का दोहन ही ग्लोबलवार्मिंग के रुप में मौजूद है। खबर के लिए प्रेम जी का आभार।

Shamikh Faraz का कहना है कि -

गाँधी जी के विचार आज सच साबित हो रहे हैं. पढ़कर अच्छा लगा.

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