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Wednesday, October 6, 2010

लंदन की एक शाम तीन डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के नाम


बाएँ से मीरा कौशिक, तेजेन्द्र शर्मा, दिव्या माथुर, डॉ. निखिल कौशिक, कैलाश बुधवार एवं काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी

कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स ने नेहरू सेंटर, लंदन में एक अनूठी शाम का आयोजन किया जिसमें वेल्स-निवासी नेत्र विशेषज्ञ, कवि, एवं फ़िल्मकार डा. निखिल कौशिक ने कथाकार-कवयित्री दिव्या माथुर, वरिष्ठ मीडिया हस्ती कैलाश बुधवार के साथ साथ कथाकार, फ़िल्म टीवी तथा मंच कलाकार, कवि व ग़ज़लकार तेजेन्द्र शर्मा पर निर्मित तीन डॉक्यूमेंटरी फ़िल्में दिखा कर नेहरू सेंटर में उपस्थित श्रोताओं को सम्मोहित कर दिया।

कार्यक्रम की शुरूआत में कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने हाल ही में दिवंगत हुए कवि-पत्रकार एवं मीडिया हस्ती डा. कन्हैया लाल नंदन को श्रद्धांजलि देते हुए उनके साथ अपने नज़दीकी संबंधों की चर्चा करते हुए उनके साथ अपनी बहामास, क्यूबा और त्रिनिदाद यात्राओं की चर्चा की। तेजेन्द्र शर्मा ने नंदन जी को नये रचनाकारों और ख़ासतौर पर प्रवासी लेखकों का मार्गदर्शक बताया। अपनी धीर गंभीर आवाज़ में तेजेन्द्र ने उनकी एक कविता का पाठ किया जो कि नंदन जी ने 3 अक्टूबर 2005 (यानी कि ठीक पांच वर्ष पूर्व) हस्पताल के बिस्तर पर डायलिसिस करवाने के बाद लिखी थी।

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए, / मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।
मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं / उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

प्रत्येक डाक्यूमेंटरी क़रीब क़रीब बीस से बाईस मिनट लम्बी थी। सबसे पहले दिव्या माथुर पर बनाई फ़िल्म दिखाई गई। दिव्या को निखिल ने एक ऐसे व्यक्तित्व की तरह पेश किया जो कि अपने काम के प्रति समर्पित, व्यवहार में विनम्र एवं परिवार के प्रति निष्ठा रखती हैं। दिव्या माथुर ने अपने लेखन के विषय में भी विस्तार से बात की और बताया कि जब एक विषय उनके दिमाग़ में पक्की तरह से बैठ जाता है तो वे लगातार उसी विषय पर लिखती चली जाती हैं। उनके क्ई एक कविता संकलन एक ही विषय पर आधारित हैं। डॉक्यूमेंटरी में डॉ. केसरी नाथ त्रिपाठी, डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, डॉ. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, मोनिका मोहता, रवि शर्मा और दिव्या के परिवार के सदस्यों सहित बहुत से लोगों ने दिव्या माथुर के प्रति अपने विचार व्यक्त किये।

कैलाश बुधवार पर बनाई डाक्युमेंटरी एक ऐसे व्यक्तित्व के बारे में है जिसे अपने बारे में कोई ग़लतफ़हमी नहीं; जो कभी भी किसी के बारे में कुछ ग़लत नहीं कहता; और जो अपने से अधिक अपने से वरिष्ठ लोगों के बारे में बात करके ख़ुश हो लेता है। शायद इसीलिये कैलाश जी ने अपनी डॉक्यूमेंटरी में पापाजी पृथ्वीराज कपूर और पृथ्वी थियेटर के बारे में अधिक बातें की और अपने व्यक्तित्व को ठीक उसी तरह छिपाए रखा जैसा कि वे पिछले चार दशकों से करते आ रहे हैं। उन्होंने अपने वरिष्ठ रेडियो की हस्तियों के बारे में बातें कीं जिनमें आले हसन, ज्ञान कौशिक, महेन्द्र कौल जैसे बहुत से लोग शामिल थे। श्रोताओं में बैठे नरेश कौशिक ने स्वीकार किया कि कैलाश जी ही उन्हें बीबीसी लंदन में लाए थे। कैलाश जी ने माइक पर आकर कहा कि वे अपने आपको इस तरह की किसी भी डॉक्यूमेंटरी के क़ाबिल नहीं समझते। वे हैरान भी थे कि मेट्रो स्ट्राइक, बारिश और कॉमनवेल्थ खेलों के सीधे प्रसारण के बावजूद लोग उनके बारे में निर्मित डाक्युमेंटरी देखने पहुंच गये।

ड़ा. निखिल कौशिक ने तेजेन्द्र शर्मा को ब्रिटेन के हिन्दी साहित्य का राजकपूर घोषित किया। उनका कहना था जिस प्रकार दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के मुग़ल गार्डन में किसी फ़िल्म की शूटिंग करने वाले राजकपूर पहले फ़िल्मकार थे, ठीक उसी तरह ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स एवं हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में कथा यू.के. सम्मान आयोजित करके तेजेन्द्र शर्मा ने हिन्दी का परचम अंग्रेज़ी के गढ़ में लहराया है। निखिल कौशिक ने अपनी डॉक्युमेंटरी के ज़रिये तेजेन्द्र शर्मा को एक कहानीकार, ग़ज़लकार, मंच एवं सिने कलाकार, नाटक निर्देशक, रेडियो पत्रकार एवं एक हिन्दी सेवी के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। तेजेन्द्र ने अपने अंग्रेज़ी एवं हिन्दी लेखन व टीवी सीरियल लेखन के बारे में बातचीत भी की है। तेजेन्द्र शर्मा की लिखी एक ग़ज़ल ‘जो तुम न मानो मुझे अपना, हक़ तुम्हारा है / यहां जो आ गया इक बार, वो हमारा है’ भी इस फ़िल्म में शामिल की गई। इस ग़ज़ल का संगीत बनाया अर्पण पटेल ने और स्वर दिया मीतल ने। तेजेन्द्र के व्यक्तित्व पर प्रो. अमीन मुग़ल, कैलाश बुधवार, डा. अचला शर्मा, मोनिका मोहता, रवि शर्मा, राकेश दुबे, आदि ने अपने अपने विचार रखे। अचला शर्मा के अनुसार तेजेन्द्र ने हिन्दी को मंदिरों से बाहर निकाल कर ब्रिटिश संसद में पहुंचा दिया है।


निखिल के साथ कैलाश जी

धन्यवाद ज्ञापन देते हुए काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा कि किसी भी देश या समुदाय की प्रगति उसकी सांसकृतिक गतिविधियों पर आधारित होती है। डा. निखिल कौशिक लेखक, पत्रकार एवं संस्कृति कर्मियों के कार्यों को उजागर करने के लिये एक नई विधा से हमारा परिचय करवाया है। मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही हमें निखिल कौशिक पर निर्मित डाक्युमेंटरी भी देखने को मिलेगी। कार्यक्रम में निखिल कौशिक ने दर्शकों के प्रश्नों के उत्तर भी दिये।

अन्य लोगों के अतिरिक्त काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, मीरा कौशिक, उषा राजे सक्सेना, बीबीसी के नरेश कौशिक और शिवकांत, श्री इस्माइल चुनारा, श्रीमती अरुणा अजितसरिया, निखिल गौर, अरुण बेदी आदि भी शाम को सफल बनाने के लिये मौजूद थे।

-दीप्ति शर्मा

Wednesday, September 29, 2010

कन्हैयालाल नंदन को श्रद्धाँजलि– परिचय साहित्य परिषद की शोक सभा

दिनांक 25 सितम्बर 2010 को प्रसिद्ध साहित्यकार पत्रकार कन्हैयालाल नंदन के निधन के बाद देश में कई जगह उन्हें श्रद्धांजलियाँ अर्पित की गई व शोक सभाओं के आयोजन हुए। ‘परिचय साहित्य परिषद’ ने भी 27 सितम्बर 2010 को ने दिल्ली के फीरोज़शाह रोड स्थित ‘रशियन कल्चरल सेण्टर’ में एक शोक सभा आयोजित की। इस शोकसभा में पूर्व सांसद व विख्यात साहित्यकार उदय प्रताप सिंह, प्रसिद्ध कविगण डॉ. शेरजंग गर्ग, लक्ष्मी शंकर बाजपेयी व परिचय साहित्य परिषद अध्यक्ष उर्मिल सत्यभूषण मंच पर थे। लेखक प्रेमचंद सहजवाला ने कन्हैयालाल नंदन के साथ अपने संक्षिप्त संस्मरण बतौर श्रद्धांजलि प्रस्तुत किये। कवयित्री अर्चना त्रिपाठी ने कन्हैयालाल नंदन की एक कविता प्रस्तुत की। श्री लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने कहा कि कन्हैयालाल नंदन ने असंख्य लेखकों कवियों को प्रोत्साहन दिया। उन्होंने नंदन जी द्वारा सन 2007 में न्यूयार्क में हुए ‘विश्व हिंदी सम्मलेन’ में प्रस्तुत एक गज़ल के कुछ शेर कहे:

नदी की कहानी कभी फिर सुनाना
मैं प्यासा हूँ दो घूँट पानी पिलाना
मुझे वो मिलेगा ये मुझ को यकीं है
बहुत जानलेवा है ये दरम्याना
मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था
भंवर देखना कूदना डूब जाना

डॉ. शेरजंग गर्ग ने कहा कि नंदन जी पिछले लगभग आठ वर्ष से मौत से जूझ रहे थे पर फिर भी उन्होंने अपनी कर्मठता व जीवंतता बरकरार रखी। उर्मिल सत्यभूषण को इस बात का अतीव दुःख था कि उन्होंने आज 27 सितम्बर को ही नंदन जी को ‘परिचय साहित्य परिषद’ के ‘सत्यसृजन शिखर सम्मान’ से सम्मानित करने का कार्यक्रम निश्चित किया था और इस सिलसिले में उन्होंने 23 सितम्बर को ही नंदन जी से फोन पर बात भी की थी। पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। श्री उदय प्रताप सिंह ने कहा कि नंदन जी बहुमुखी प्रतिभा थे। वे साहित्यकार, पत्रकार तो थे ही, उन्हें संगीत का भी बहुत ज्ञान था व बहुत अच्छी चित्रकारी भी करते थे। सभा में उपस्थित अन्य लेखकगण ने भी अपनी अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की व दो मिनट का मौन रख कर ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थना की।

रिपोर्ट – ‘परिचय’ रिपोर्ट अनुभाग

Sunday, September 26, 2010

कन्हैया लाल नंदन की अश्रुपूरित विदाई - कुछ चित्र, कुछ वीडियो

हिन्दी के मूर्धन्य कवि व पत्रकार कन्हैया लाल नंदन का शनिवार, 25 सितम्बर 2010 की सुबह नई दिल्ली में निधन हो गया। 26 सितम्बर 2010 की दोपहर करीब 12 बजे लोदी रोड शवदाहगृह में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस अवसर पर ढेरों साहित्यप्रेमी, पत्रकार और राजनीतिज्ञ उपस्थित थे, सभी ने उनको नम आँखों से विदा किया। प्रस्तुत हैं कुछ चित्र और वीडियो-












(वीडियो-1)


(वीडियो-2)


(वीडियो-3)

प्रस्तुति- प्रेमचंद सहजवाला

Tuesday, October 13, 2009

कौमी एकता का संदेश देता सर्वोत्कृष्ट कवि सम्मेलन



02 अक्तूबर 2009 की पूर्व संध्या पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के महान पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के जन्म दिवस और विगत माह आयोजित किए गए हिंदी पखवाड़े के संपन्न किए जाने वाले समारोह को कुछ इस प्रकार से आयोजित किया कि आमंत्रित श्रोतागणों ने उदात्ता की परम अवस्था में न केवल कविता के विभिन्न रसों का आस्वादन लिया बल्कि बड़ी बेबाकी के साथ वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर की गई प्रतीकात्मक बिम्बों के माध्यम से उन अनुभूति के क्षणों को जिया भी.

भारतीय सांकृतिक संबंध परिषद के महानिदेशक श्री वीरेंद्र गुप्ता के प्रशासन का यह पहला कार्यक्रम था. उन्होंने दीप प्रज्ज्वलित करके कार्यक्रम का शुभारंभ किया.

इस कवि सम्मेलन में आमंत्रित किए गए कविगण मंचीय कविता जगत के सितारे थे. इन जगमगाते सितारों में बेकल उत्साही,डॉ.कन्हैयालाल नंदन,उदय प्रताप सिंह,अशोक चक्रधर, बुद्धिनाथ मिश्र,दीक्षित धनकौरी,गजेंद्र सोलंकी,आलोक श्रीवास्तव और कवयित्री रश्मि सानन थीं.

कवि सम्मेलन के संचालक कवि अशोक चक्रधर ने उपस्थित कवियों और अतिथियों का परिचय कराया. रश्मि सानन ने मां सरस्वती की वंदना मधुर कंठ से प्रस्तुत कर इंद्रलोक का सा समां बांध दिया.गजेंद्र सोलंकी ने मातृभूमि कीवंदना प्रस्तुत करते हुए आजादी के शहीदों व क्रांतिकारियों की भूमिका को याद कराया.उन्होंने छोटे-छोटे दोहों से जो समां बांधा उसे श्रोता सुनकर झूम उठे. चूंकि इस कवि सम्मेलन का आयोज 02 अक्तूबर की पूर्व संध्या पर किया गया था और हिन्दी पख्वाड़े का समापन समारोह भी था इसलिए गांधी जी और लाल बहादुर शास्त्री को याद किया जाना लाजिमी बात थी और सोलंकी की ये पंक्तियां स्मरणीय बन गईं---

जिसके आगे स्वर्गपुरी भी लगती जैसे बांदी है,
कि जिसका जर्रा-जर्रा हीरा-मोती, सोना-चांदी है.
अपनी इस भारत माता पर कैसे न मुझको गर्व न हो,
कि जिसका बेटा लाल बहादुर,जिसका बेटा गांधी हो.


इसके बाद उन्होंने जो कविताएं सुनाईं,वे एक से बढ़कर एक थीं. इनमें कुछ ऐसी थीं जिसे श्रोता कवि के साथ एकात्म होकर उन पंक्तियों को दोहराने के लिए सम्मोहित था, यथा—

धड़कता प्यारा हिंदुस्तान,नयन का तारा हिंदुस्तान,जहां से न्यारा हिंदुस्तान,
कि गंगा की कलकल सीने में,चंदन सी महक पसीने में,
मन में मुरली की मधुर तान ........


इसके पूर्व रश्मि सानन की ये पंक्तियां भी श्रोताओं की ओर से खूब सराही गईं....

नाम लेकर चलते रहे तन्हा-तन्हा.
ठोकर खाकर संभलते रहे तन्हा-तन्हा.
अजनबी बनकर सीख लिया,
हम अपनी पहचान बदलते रहे तन्हा-तन्हा.


कवि आलोक श्रीवास्तव की कविताएं काफी ऊंचाइयों का स्पर्श कराती रहीं.गीत से कहे गए उनके दोहे अंदर तक झकझोर गए.यथा---

भौंचक्की है आत्मा, सांसें भी हैरान,
हुक्म दिया है जिस्म ने खाली करो मकान.
आंखों में लग जाएं तो नाहक निकले खून,
बेहतर है छोटे रखें रिश्तों के नाखून,
तुझ में मेरा मन हुआ कुछ ऐसा तल्लीन,
जैसे गाएं सूर को आबिदा परवीन.
गुलमोहर सी जिंदगी,धड़कन जैसे फांस.
दो तोले का जिस्म है,सौ- सौ टन की सांस.
चंदा कल आया लेकर जब बारात,
हीरा खाकर सो गई एक दुखियारी रात.
गनीमत है नगरवालो लुटेरों से लुटे हो तुम,
हमें तो गांव में अक्सर दारोगा लूट जाता है.
चांद अगर पूरा चमके तो उसका दाग खटकता है,
एक बुराई तय है सभी इज्जतदारों में.
कल रात सुना है अंबर ने, सिर फोड़ लिया दीवारों से,
आखिर तुमने क्या कह डाला, सूरज चांद-सितारों से.
दो-एक दिन नाराज रहेंगे बाबूजी की फितरत है,
चांद कहीं टेढा रहता है सालों-साल सितारों से.
….. …. ….. …… …… ……
यह सोचना गलत है कि तुम पर नजर नहीं,
मशरूफ हम बहुत हैं , मगर बेखबर नहीं.
अबतो खुद अपने खून ने साफ कह दिया,
मैं आपका रहूंगा मगर उम्र भर नहीं.
आ ही गए हैं ख्वाब तो फिर जाएंगे कहां?
आंखों से आगे फिर इनकी कोई रहगुजर नहीं.




बुद्धिनाथ मिश्र श्रृंगार रस के कवि माने जाते हैं.जब वे मंच पर काव्यपाठ के लिए उपस्थित होते हैं तो श्रोताओं की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं.प्रेम रस से भिगी उनकी दो कविताएं मंच पर काफी लोकप्रिय रही हैं, यथा—

तुम मेरे समीप आओगे मैने कभी नहीं सोचा था.

और

एक बार जाल और फेंक रे मछेरे जाने किस मछली में बंधन की चाह हो.

काफी सराही गईं.

नंदन जी की कविताएं जीवन के अनुभवों से गुजरकर यथार्थ में ऐसी पगी होती हैं कि श्रोता उसमें स्वयं को देखने लगता है. आपकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं—

जब से लगने लगे हैं अस्पताल के चक्कर,
सारी दुनिया मुझे बीमार नजर आती है.
और जहां मैं अपना दर ढूढ्ने निकला था,
वहां मुझे दीवार ही दीवार नजर आती है.
मेरे जेहन में कोई ख्वाब था,
उसे देखना भी अजाब था.

वह बिखर गया मेरे सामने,यह इल्जाम मेरे ही सिर गया.

डॉ. उदय प्रताप सिंह राष्ट्रीय परिदृश्य में जब अपनी अनुभूतियों को श्रोताओं तक ले जाते हैं तब श्रोतागण भी देश के हालात और बेबसी पर केवल समझने के अलावा कुछ नहीं कर पाता है. यथा—

पछुआ की ऐसी बीमारी,नई फसल पर संकट भारी,
उजड़ गई जब बगिया सारी,
तब चेती पुरवाई क्या?
बात समझ में आई क्या?
मेहनतकश को मुश्किल राशन,
उनका सोने का सिंहासन,
हर सिंहासन पर एक रावण, देते राम दुहाई क्या? बात समझ में आई क्या?
अपमानित हो रहा पसीना,
मुश्किल है इज्जत से जीना.
बेईमानी ताने सीना,
करती ये नेताई क्या? बात समझ में आई क्या?


बेकल उत्साही वरिष्ठ कवि हैं, मंच पर उनकी उपस्थित कवियों में जीवन का संचार भर देती है. अमीर खुसरो, रहीम और रसखान की परंपरा में आधुनिक भारत में वे अनेकता में एकता के प्रतीक हैं. जिस अवसर पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ने इस कौमी एकता पर आधारित कवि सम्मेलन का आयोजन करवाया था . अपनी पहली पंक्तियों में उन्होंने यों बयां कर दिया----

बापू जी की हर सिक्के पर छ्पी हुई तस्वीर,
रिश्वत में हम खर्च करें यही मेरी तकदीर.
मेरे पुरखे जायसी, रहिमन और रसखान,
मैं सुगंध हूं देश की, देश है मेरी जान.
देश है मेरी जान,कि सब हैं मेरे शैदाई,
गीत,छंद, अतुकांत, गजल, दोहे, चौपाई.
मैं हिंदी हूं ,यार मेरी औकात न पूछो,
मैं भारत की ज्योति, मेरी जात न पूछो.


इस यादगार कवि सम्मेलन का कुशल संचालन हास्य सम्राट कविवर अशोक चक्रधर ने किया. कविता पाठ के उपरांत संचालन कर रहे हास्य कवि ने जो तीर फेंके उसे श्रोताओं ने सिर-आंखोम ले लिया. बानगी देखें—

जल नहीं जंगलों में मिलता है,
खून मिल जाए तो नहाते हैं.
वीरप्पन की गजल गाते हैं,
एक जंगल है तेरी मूंछों मे,
हम राह जहां भूल जाते हैं.


कविता पाठ का यह कार्यक्रम अपने निर्धारित समय से काफी आगे तक चला लेकिन श्रोताओं की ्कविता सुनने की प्यास नहीं बुझी. नौ रत्नों की कविताएं ऐसी थीं जिसे श्रोतागण बार-बार सुनने का आग्रह करते जा रहे थे.
इस कवि सम्मेलन में विशेष अतिथिगणों में पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री रामकृपाल सिंहा,सांसद श्री टी. मेनीया, पूर्व सांसद श्री हरिकेश बहादुर, डॉ. कृष्णवीर चौधरी,श्रीमती कुसुमवीर,डॉ. परमानंद पांचाल, हरचरण सिंह जोश, श्री वीरेंद्र प्रभाकर, श्री फोतेदार, प्रो. सत्यकाम, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, नारायण कुमार, डॉ. कमल किशोर गोयंका, डॉ. हरिपाल सिंह, उमाशंकर मिश्र सहित अनेक कला एवं संस्कृति से जुड़े लोग उपस्थित थे.

उत्कृष्ठ कोटि के कार्यक्रम का धन्यवाद ज्गापन गगनांचल के संपादक अजय कुमार गुप्ता द्वारा किया गया. महानिदेशक श्री वीरेंद्र गुप्ता ने आमंत्रित कवियों पुष्पगुच्छ भेंट कर आभार प्रदर्शन किया.

शमशेर अहमद खान,
2-सी,प्रैस ब्लॉक,
पुराना सचिवालय,
सिविल लाइंस,
दिल्ली---110054

Saturday, October 10, 2009

'हिंद स्वराज' के 100 वर्ष और विचार-गोष्ठियों पुस्तक-विमोचनों का गर्मागर्म-सिलसिला (वीडियो)

रिपोर्ट- प्रेमचंद सहजवाला


कोलॉज (दक्षिणावर्त)- 1॰ कार्यक्रम-सूचक-पट, 2॰ प्रभास जोशी के साथ प्रेमचंद सहजवाला, 3॰ गाँधी जी का पोस्टर, 4॰ वर्षा दास, 5॰ कन्हैयालाल नंदन और अन्य प्रबुद्ध दर्शक, 6॰ विमल प्रसाद, प्रभास जोशी, 7॰ वर्षा दास, विमल प्रसाद

महात्मा गाँधी पूरी मानव-सभ्यता के लिए अहिंसा-दूत बन कर अवतरित हुए थे। विश्व के महापुरुष महात्मा गाँधी की तुलना ईसा मसीह और गौतम बुद्ध से करते हैं। इस सन्दर्भ में विश्व-प्रसिद्व नोबेल-पुरस्कार विजेता लेखक रोमेन रोलैंड व गाँधी की प्रसिद्व शिष्य मीरा बहन, जिसे वे अपनी बेटी मानते थे, के बीच हुए वार्तालाप का सन्दर्भ देना अप्रासंगिक न होगा। मीरा बहन का मूल नाम मैडलीन स्लेड था तथा उस के पिता भारतीय सेना में तैनात, ब्रिटिश के सेनाधिकारी थे। मैडलीन स्लेड अपनी युवावस्था में किसी आध्यात्मिक गुरु की तलाश में बेचैन सी थी। इसी सिलसिले में वह फ्रांस गई, जहाँ उस की भेंट रोमेन रोलैंड से हुई और उस ने उन्हें अपनी समस्या बताई। रोमेन रोलैंड ने मैडलीन स्लेड से पूछा- 'क्या तुम ने महात्मा गाँधी का नाम सुना है?' मैडलीन ने कहा- 'नहीं तो!' रोमेन रोलैंड ने फ़ौरन कहा- 'वह इस पृथ्वी पर एक और यीशु हैं।' मीरा बहन एक वर्ष की तैयारी के बाद भारत आई तो गाँधी जी की बेटी बन कर उन के साथ आश्रम में रहने लगी। वह सन् 55 तक भारत में रही थी।

गाँधी जब बैरिस्टर बनने के उद्देश्य से पहली बार घर से बाहर निकले और लंदन गए तो वहां की शाकाहारी संस्था के सदस्य भी बने, पर उनकी प्रारंभिक शख्सियत पर ईसाई धर्म का प्रभाव स्पष्ट था और समय के साथ ईसा की तरह वे भी अहिंसा के पुजारी बन गए। ईसा ने ही कहा था कि यदि कोई आप को एक गाल पर तमाचा मारे तो फ़ौरन अपना दूसरा गाल भी आगे कर दो। गाँधी जी ने ईसा की इस शिक्षा को अक्षरशः आत्मसात् कर लिया और अपने अनुयायियों को भी यही शिक्षा दी। समाज में इस शिक्षा की खिल्ली उड़ाने वाले भी कम नहीं, तो सावरकर की तरह उल्टी शिक्षा देने वाले भी कमी नहीं कि अहिंसा किसी भी देश की अवनति का कारण होती है। इस के प्रमाण स्वरुप सावरकर मौर्य वंश के महानतम सम्राट अशोक का उदहारण देते हैं कि जब तक वे बुद्ध धर्म की शरण में नहीं गए थे, तब तक उन्होंने दिग्विजय हासिल कर ली। कलिंग युद्ध भी जीत लिया, पर बुद्ध की शरण में जा कर अहिंसा का पुजारी बनते ही अशोक महान के साम्राज्य का पतन हो गया और सन् 184 ई. पू में उन के ही एक वंशज राजा वृहदरथ को उस के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने मार कर मौर्य वंश को समाप्त कर के अपना शुंग वंश स्थापित किया! बहरहाल, आज के इस विध्वंसकारी आतंकी युग में भी गाँधी की अहिंसा किस सीमा तक ज़रूरी है, इस का प्रमाण यही है कि सन् 2007 में संयुक्त राष्ट्र ने गाँधी जन्म-दिवस (2 अक्टूबर) को 'अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस' घोषित कर दिया। पर सन् 2009 की एक विशिष्टता यह भी है कि इस वर्ष से पूरे 100 वर्ष पहले, यानी 1909 में गाँधी ने एक बेहद विवादस्पद पुस्तक 'हिंद स्वराज' भी लिखी थी, जिस के विषय में मैं अपनी पिछली रिपोर्ट 'गाँधी की पुस्तकों पर हिंदी अकादमी द्वारा यादगार कार्यक्रम' ('हिन्दयुग्म' 24 अगस्त 2009 ) में भी लिख चुका हूँ। इस पुस्तक के लेखन की शताब्दी पर देश भर में गोष्ठियों और पुस्तक-विमोचनों का एक सिलसिला सा चल पड़ा है, जो जाने माने पत्रकार प्रभास जोशी के अनुसार 22 नवम्बर तक चलता रहेगा। गाँधी जी ने यह पुस्तक 1909 में लन्दन से दक्षिण अफ्रीका (जहाँ उन्होंने 1893 से 1914 तक भारतवासियों के साथ हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष किया), लौटते समय 'किल्दोनन' नामक जहाज़ में केवल दस दिन में (13 नवम्बर से 22 नवम्बर) लिख डाली थी। पुस्तक की तुलना विश्व के कई महापुरुष 'श्रीमद भगवद गीता' और 'बाइबल' तक से करते हैं, हालांकि कई विद्वान इस प्रकार की भावना से इत्तेफाक नहीं रखते। उन का मानना है कि पुस्तक बेहद अव्यवहारिक है, और आज के युग की इस तेज़ रफ्तार ज़िन्दगी में इस पुस्तक की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई। परन्तु पत्रकार प्रभास जोशी व देश के अनेक बुद्धिजीवी ऐसा नहीं मानते। गाँधी जन्म दिवस 2 अक्टूबर 2009 की पूर्व संध्या यानी 1 अक्टूबर 2009 को 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' में गाँधी सम्बंधित फोटो-प्रदर्शनी का उद्‍घाटन करने के बाद प्रभास जोशी ने अपने भाषण में 'हिंद स्वराज' को आज भी पूर्णतः प्रासंगिक माना। इस अवसर पर 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' द्वारा संकलित व प्रकाशित, अंग्रेज़ी पुस्तक 'Gandhiji on Hind Swaraj and Select Views of Others' का विमोचन भी प्रभास जोशी के कर कमलों से हुआ। मंच पर प्रभास जोशी के साथ उपस्थित थे 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' के चेयरमैन प्रो. बिमल प्रसाद व कार्यक्रम का संचालन कर रही थी संग्रहालय की निदेशिका डॉ. वर्षा दास। सभागार में कन्हैयालाल नंदन व अन्य कई विद्वान भी उपस्थित थे। गाँधी के सत्य व अहिंसा से तो आज भी विश्व के विचारकों का एक बहुत बड़ा वर्ग सहमत है, लेकिन गाँधी ने 'हिंद स्वराज' में विज्ञान तक का विरोध किया है, इस लिए कतिपय लोग उन के विचारों को या तो पुरातनपंथी मानते हैं, या फिर दकियानूसी। परन्तु प्रभास जोशी ने स्पष्ट किया कि गाँधी यह मानते थे की मशीन और विज्ञान इंसान को गुलामी के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकते। वैसे मशीन के विरुद्ध रह कर भी एक सत्य यह है कि गाँधी स्वयं मानते थे कि मशीन का हम कितना भी विरोध करें, मशीन रहेगी. यह बात एक विरोधाभास जैसी भी लग सकती है। इस अवसर पर लोकार्पित पुस्तक के एक लेख में भी गाँधी के सचिव महादेवन देसाई, दो विदेशी विचारकों, मिडलटाऊन मुर्रे व प्रो. डेलिसले बर्न्स के उदहारण दे कर उनके और गाँधी के बीच मशीन पर हुए वार्तालाप को संदर्भित करते हैं। मिडलटाऊन कहते हैं कि गाँधी यह भूल जाते हैं कि जिस चरखे को वे बहुत प्यार करते हैं, वह चरखा भी तो आखिर एक मशीन है, जबकि डेलिसले कहते हैं कि नाक पर सवार चश्मा भी तो आखिर नज़र के लिए एक मशीनीकृत उपकरण ही है न! किसान का हल भी एक मशीन है और कुँए से पानी खींचने की चरखी भी हज़ारों साल से इंसान की ज़िन्दगी की बेहतरी के लिए किये गए मशीननुमा प्रयासों में से एक रही है। गाँधी मशीन द्वारा दुरुपयोग की बात करते हैं, पर यदि दुरुपयोग बुराई है तो दुरुपयोग को ही बुराई कहा जाए, मशीन को क्यों! गाँधी कहते हैं कि यूं तो इंसान का शरीर भी एक मशीन ही है न! मैं जिस बात पर आपत्ति करता हूँ, वह मशीन नहीं है, वरन मशीन के प्रति एक जूनून सा है। इन्हें मेहनत बचाने का जूनून है, और मेहनत बचाने का उपकरण ये मशीन को मानते हैं। लोग मेहनत बचाते जाते हैं, जब तक कि हज़ारों लोग बेरोज़गार नहीं हो जाते और भुखमरी में जीने के लिए गलियों में झोंक नहीं दिए जाते। मैं चाहता हूँ कि मेहनत की बचत हो, परन्तु सारी मानव जाति के लिए, न कि मुट्ठी भर लोगों (पूंजीपतियों) के लिए। गाँधी आगे स्पष्ट करते हैं कि अपनी बात में मैं चंद प्रबुद्ध अपवाद (Intelliegent exceptions) ज़रूर लूँगा, जैसे कि 'सिंगर सिलाई मशीन' ही लीजिये। यह कुछ चुनिन्दा उपयोगी वतुओं में से है और इस मशीन में कितना तो रोमांस है!

इस पर प्रश्नकर्ता चुटकी ले कर पूछते हैं कि फिर तो इस 'सिंगर सिलाई मशीन' को बनाने के लिए भी एक बड़ा कारखाना होगा। गाँधी का उत्तर था- 'हाँ, पर में प्रचुर मात्रा में समाजवादी हूँ और कहूँगा कि ऐसे कारखाने राष्ट्रीयकृत हों और राज्य द्वारा नियंत्रिंत हों'...(लोकार्पित पुस्तक पृष्ठ 235 -36 )।

प्रभास जोशी ने मशीन के प्रति मानव की गुलामी का ज़िक्र करते हुए कहा कि गाँधी जी के अर्थों में 'स्वराज' का अर्थ न तो 'आर्थिक स्वराज' था, न 'सामाजिक' और न 'राजनैतिक'. 'स्वराज' से उन का तात्पर्य शुद्ध 'आध्यात्मिक स्वराज' से था। पर गाँधी यह स्पष्ट करते थे कि 'आध्यात्मिक स्वराज' का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति हिमालय की गुफाओं में जा कर रहना शुरू कर दे, वरन यदि इसी समाज में रह कर वह हर ऐसा कार्य करे, जो उसे उक्त सब स्वराजों से स्वतंत्र कर के 'आध्यात्मिक स्वराज' की तरफ ले जाए तो वह सही अर्थों में 'स्वराज' है।

अपने विस्तृत भाषण में प्रभास जोशी ने यह भी कहा कि गाँधी का सब से अधिक ज़ोर व्यक्ति के आचरण पर रहता था। वे 'स्वराज' की तलाश में निकले हुए आदमी थे और यह मानते थे कि जो कुछ उन्होंने कहा है, लिखा है, बोला है, वही उन का सन्देश भी है (वैसे गाँधी का यह वाक्य भी विश्व-प्रसिद्ध है - My Life is My Message)। जहाँ एक तरफ 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' चेयरमैन प्रो. बिमल प्रसाद ने 'हिंद स्वराज' को भारत के लिए एक manifesto कहा, जिस का सन्देश गाँधी के अनुसार यही कि 'हिंसा और पश्चिमी सभ्यता साथ-साथ चलते हैं तथा सत्याग्रह व भारतीय सभ्यता साथ-साथ चलते हैं', वहीं प्रभास जोशी ने कहा कि 'हिंद स्वराज' विश्व की तीन शीर्षस्थ पुस्तकों में से एक है जिन में कार्ल मार्क्स का विश्व प्रसिद्ध manifesto (Das Capital) भी है।

जिस सादगी से गाँधी ने जीवन जिया, व अपने आदर्शों को प्रतिपादित किया, वह सर्वविदित है। अतः गाँधी पर इस सभा में व्यक्त विचार भी सादगी से उतने ही परिपूर्ण, परन्तु सारगर्भित रहे। सभा समापन के बाद भी, जलपान के दौरान प्रभास जोशी कई आंदोलित-हृदय जिज्ञासुओं से घिरे रहे व गाँधी तथा 'हिंद स्वराज' को ले कर सब के मन के संशयों का निवारण करते रहे। यह स्वाभाविक भी था। जिस पुस्तक ने लियो तोल्स्तोय, हर्मन कालेनबैच (जिन्होंने ने दक्षिण अफ्रीका में जान्स्बर्ग के निकट 'तोल्स्तोय फार्म' के लिए गाँधी को ज़मीन दी थी) जैसे, विश्व के असंख्य दार्शनिकों विचारकों की नींद हराम कर के रख दी, और ब्रिटिश जिस पश्चिमी सभ्यता का भोंपू यहाँ बजाने आई थी, उसी को कटघरे में खड़ा कर दिया, उस पुस्तक की शाश्वतता का ही प्रमाण है कि आज भी वह मस्तिष्क को उद्वेलित कर के रख देती है और विचारों में एक आंदोलनकारी टकराहट पैदा करती है। वैसे इस पुस्तक को ले कर एक रोचक बात यह भी कि जब इसे गाँधी के राजनैतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले ने पहली बार पढ़ा तो कहा था कि यह पुस्तक किसी मूर्ख की कृति थी (सन्दर्भ The Good Boatman - A Portrait of Gandhi by Rajmohan Gandhi p 162)। परन्तु जब 1938 में भी इस पुस्तक का नया संस्करण गाँधी ने छपवाया तब उन्होंने भूमिका में लिखा कि पहले संस्करण से मुझे आज भी कोई भी परिवर्तन करने की ज़रुरत महसूस नहीं हुई। इस पुस्तक में मैंने केवल एक शब्द बदला है, जो किसी महिला ने मुझे पत्र लिख कर कहा था कि कुछ असभ्य सा लगता है. उस एक शब्द के अतिरिक्त कहीं भी किसी भी प्रकार के परिवर्तन की ज़रुरत या द्वंद्व मैं अपने भीतर नहीं महसूस कर पाया हूँ! इस मात्र 30,000 शब्दों वाली अमर पुस्तक में आखिर ऐसा क्या है, कि वह हर दशक, हर सदी में चर्चा का एक संग्राम छेड़ देती है, यह जानने के लिए क्या बेहतर नहीं है किसी भी उचित स्रोत से इसे प्राप्त कर के तन्मयता से पढ़ा जाए!

देखिए- गाँधी की 140वीं जयंती की पूर्व संध्या पर गाँधी की पुस्तक 'हिन्द-स्वराज्य' पर अपने विचार व्यक्त करते वरिष्ठ पत्रकार प्रभास जोशी






पुनश्च- मेरे सीमित ज्ञान के अर्न्तगत इस पुस्तक को एक तो 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय', (दिल्ली) ने छपवाया है और एक 'हिंदी अकादमी' (दिल्ली) ने।

Sunday, June 7, 2009

हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य संगोष्ठी संपन्न

शमशेर अहमद खान

दिनांक 6 जून 2009 को उत्तरप्रदेश भाषा संस्थान, लखनऊ और भारतीय साहित्य सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वाधान में राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी का आयोजन भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ,नई दिल्ली
स्थिति आजाद भवन के मल्टीपर्पज हॉल में संपन्न हुआ। एक पूर्ण दिवसीय संगोष्ठी का उद्‍घाटन वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार डॉ. कन्हैया लाल नंदन ने किया। इस अवसर के मुख्य अतिथि वीरेंद्र गुप्त थे, किंतु किंही कारणवश वे उपलब्ध नहीं हो सके। इसलिए उनका प्रतिनिधित्व डॉ.अजय गुप्ता (सम्पादक, गगनांचल) ने किया। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. राजेंद्र अवस्थी जी ने की।

बाल साहित्य की वर्तमान दशा और दिशा पर चिंतनपरक आलेख पढ़ने वाले विद्वानों में डॉ. हरिकृष्ण देवसरे,डॉ. राजेंद्र अवस्थी, डॉ. अलका पाठक, डॉ. शेरजंग गर्ग, डॉ. द्रोणवीर कोहली, डॉ. सूर्यकुमार पाण्डेय आदि प्रमुख थे।

बालसाहित्य से संबंधित पढ़े गए आलेखों में डॉ. अलका पाठक का लेख काफी संतुलित रहा। उन्होंने हास्य-हास्य में वह सब कुछ कह दिया जिसे चिंतनपरक संगोष्ठी में विचार किया जाता है। वे अपने आलेख का अंत करते हुए कहती हैं----“ वही पीछे छूटा बचपन जब पच्चीसबरस, पचास बरस बाद अपने बच्चे या बच्चे के बच्चे के रूप में खडा हो जाता है तो यह जरूरी एवरेस्ट यह आवश्यक सागर सिकुड़ते हैं और छोटे होते जाते हैं,इतने –इतने छोटे कि नन्हीं- नन्हीं हथेलियों में राजा जी की गैया खो जाती है, मिलती है गुदगुदी में, खिलखिलाहट में—आटे बाटे चने चटाके,चैंऊ-मैऊ, झू झू के पाऊं कर के और वही सवाल कि चल चल चमेली बाग में क्या- क्या खिलाएंगे; सूरज एक पूरा चक्कर लगाकर सुबह- दोपहर शाम को रूप बदलने के बाद फिर वहीं से शुरू हो गई कहानी…. कुछ बदला तो था पर बदला हुआ गया कहां ! वही बच्चा, वही कहानी, वही नानी और एक था राजा , एक थी रानी. दोनों मर गए खत्म कहानी.”

इस संगोष्टी में बालसाहित्य संबंधी उठाए गए मुद्दे बच्चों के भविष्य की ओर इंगत करते थे। एक तरफ जहां सूचना एवं प्रौद्योगिकि की क्रांति से उपजी सूचनापरकता माध्यमों के साहित्य में प्रयोग की बात थी वहीं भारत के उन नौनिहालों कि चिंता थी जिन्हें स्कूल का मुंह भी देखने को नसीब नहीं होता ऐसे में बालसाहित्य की दशा और दिशा निर्धारित करना बेमानी लगता है। चूँकि इस दिशा में समग्र रूप से कोई समेकित कार्य नहीं हुआ है इसलिए हर कोई अपनी ढ्पली अपना राग गाए चला जा रहा है। फिर भी अंधेरी रात में जुगनू की चमक ही भरपूर लगती है। लेकिन फिर भी अगर-मगर करते हुए चला जाय तो मंजिल मिलेगी ही मिलेगी।


प्रस्तुति- शमशेर अहमद खान, 2-सी, प्रैस ब्लाक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस दिल्ली---110054। Shamsher_53@rediffmail.com, ahmedkhan.shamsher@gmail.com