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Monday, October 25, 2010

हिंदी के वरिष्ठ कथाकार सोहन शर्मा का निधन

हिंदी के वरिष्ठ कथाकार, उपन्यासकार और गंभीर मार्क्सवादी विचारक-चिन्तक डॉ. सोहन शर्मा का 21 अक्टूबर को रात के लगभग 11 बजे निधन हो गया। वे पिछले एक वर्ष से फेफड़ों के कैंसर से जूझ रहे थे। डॉ. सोहन शर्मा की बीसेक किताबें हैं। उनके कहानी संग्रह- बर्फ का चाकू, जूनी लकड़ियों का गट्ठर, आमने-सामने, आधे उखड़े नख की पीड़ा, अपनी जगह पर, स्याह होती धूप आदि तथा कविता संग्रह- थमना मत गोदावरी के साथ उनके बहुचर्चित उपन्यास थे-- ''मीणा घाटी'' और ''समरवंशी''। उनकी वैचारिक पुस्तकों में- ''विकल्प के पक्ष में'' चर्चित रही। उन्होंने ''सही समझ'' नाम से एक पत्रिका भी कई वर्षों तक सम्पादित की जिसमें उन्होंने युवा स्वर को प्रमुखता दी। वे बैंक ऑफ बडौदा में हिंदी अधिकारी में उप महाप्रबंधक के पद पर रिटायर हुए। भारत सरकार की बैंकों के कार्यान्वयन की राजभाषा नीति को लागू करवाने में उनकी महती भूमिका रही।
डॉ. सोहन शर्मा रामानंद सागर के ''रामायण'', ''पृथ्वीराज चौहान'' तथा ''मीरा'' धारावाहिक में शोध तथा पटकथा लेखन में सहायक रहे।

डॉ. सोहन शर्मा क्रांतिकारी वाम के समर्थक थे. वर्ल्ड सोशल फोरम के समानांतर उन्होंने एक क्रांतिकारी वाम पंथी फोरम का स्वरुप रखा। इधर वे अपने एक उपन्यास ''अहो , मुंबई'' के लेखन में व्यस्त थे तथा नक्सलवाद के सम्पूर्ण इतिहास का पुनर्लेखन कर रहे थे।

रविवार 24 अक्टूबर को संन्यास आश्रम , विले पार्ले पश्चिम में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, शोभनाथ यादव , आर.के पालीवाल, सुधा अरोड़ा, नंदकिशोर नौटियाल, विश्वनाथ सचदेव, अक्षय जैन,देवमणि पाण्डेय,पूर्ण मनराल, दयाकृष्ण जोशी, उमाकांत वाजपेयी आदि रचनाकारों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

सोहनजी की पत्नी शशि शर्मा का संपर्क नं. -- 022 2682 0216 / 98191 40555

Wednesday, October 6, 2010

लंदन की एक शाम तीन डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के नाम


बाएँ से मीरा कौशिक, तेजेन्द्र शर्मा, दिव्या माथुर, डॉ. निखिल कौशिक, कैलाश बुधवार एवं काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी

कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स ने नेहरू सेंटर, लंदन में एक अनूठी शाम का आयोजन किया जिसमें वेल्स-निवासी नेत्र विशेषज्ञ, कवि, एवं फ़िल्मकार डा. निखिल कौशिक ने कथाकार-कवयित्री दिव्या माथुर, वरिष्ठ मीडिया हस्ती कैलाश बुधवार के साथ साथ कथाकार, फ़िल्म टीवी तथा मंच कलाकार, कवि व ग़ज़लकार तेजेन्द्र शर्मा पर निर्मित तीन डॉक्यूमेंटरी फ़िल्में दिखा कर नेहरू सेंटर में उपस्थित श्रोताओं को सम्मोहित कर दिया।

कार्यक्रम की शुरूआत में कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने हाल ही में दिवंगत हुए कवि-पत्रकार एवं मीडिया हस्ती डा. कन्हैया लाल नंदन को श्रद्धांजलि देते हुए उनके साथ अपने नज़दीकी संबंधों की चर्चा करते हुए उनके साथ अपनी बहामास, क्यूबा और त्रिनिदाद यात्राओं की चर्चा की। तेजेन्द्र शर्मा ने नंदन जी को नये रचनाकारों और ख़ासतौर पर प्रवासी लेखकों का मार्गदर्शक बताया। अपनी धीर गंभीर आवाज़ में तेजेन्द्र ने उनकी एक कविता का पाठ किया जो कि नंदन जी ने 3 अक्टूबर 2005 (यानी कि ठीक पांच वर्ष पूर्व) हस्पताल के बिस्तर पर डायलिसिस करवाने के बाद लिखी थी।

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए, / मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।
मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं / उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

प्रत्येक डाक्यूमेंटरी क़रीब क़रीब बीस से बाईस मिनट लम्बी थी। सबसे पहले दिव्या माथुर पर बनाई फ़िल्म दिखाई गई। दिव्या को निखिल ने एक ऐसे व्यक्तित्व की तरह पेश किया जो कि अपने काम के प्रति समर्पित, व्यवहार में विनम्र एवं परिवार के प्रति निष्ठा रखती हैं। दिव्या माथुर ने अपने लेखन के विषय में भी विस्तार से बात की और बताया कि जब एक विषय उनके दिमाग़ में पक्की तरह से बैठ जाता है तो वे लगातार उसी विषय पर लिखती चली जाती हैं। उनके क्ई एक कविता संकलन एक ही विषय पर आधारित हैं। डॉक्यूमेंटरी में डॉ. केसरी नाथ त्रिपाठी, डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, डॉ. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, मोनिका मोहता, रवि शर्मा और दिव्या के परिवार के सदस्यों सहित बहुत से लोगों ने दिव्या माथुर के प्रति अपने विचार व्यक्त किये।

कैलाश बुधवार पर बनाई डाक्युमेंटरी एक ऐसे व्यक्तित्व के बारे में है जिसे अपने बारे में कोई ग़लतफ़हमी नहीं; जो कभी भी किसी के बारे में कुछ ग़लत नहीं कहता; और जो अपने से अधिक अपने से वरिष्ठ लोगों के बारे में बात करके ख़ुश हो लेता है। शायद इसीलिये कैलाश जी ने अपनी डॉक्यूमेंटरी में पापाजी पृथ्वीराज कपूर और पृथ्वी थियेटर के बारे में अधिक बातें की और अपने व्यक्तित्व को ठीक उसी तरह छिपाए रखा जैसा कि वे पिछले चार दशकों से करते आ रहे हैं। उन्होंने अपने वरिष्ठ रेडियो की हस्तियों के बारे में बातें कीं जिनमें आले हसन, ज्ञान कौशिक, महेन्द्र कौल जैसे बहुत से लोग शामिल थे। श्रोताओं में बैठे नरेश कौशिक ने स्वीकार किया कि कैलाश जी ही उन्हें बीबीसी लंदन में लाए थे। कैलाश जी ने माइक पर आकर कहा कि वे अपने आपको इस तरह की किसी भी डॉक्यूमेंटरी के क़ाबिल नहीं समझते। वे हैरान भी थे कि मेट्रो स्ट्राइक, बारिश और कॉमनवेल्थ खेलों के सीधे प्रसारण के बावजूद लोग उनके बारे में निर्मित डाक्युमेंटरी देखने पहुंच गये।

ड़ा. निखिल कौशिक ने तेजेन्द्र शर्मा को ब्रिटेन के हिन्दी साहित्य का राजकपूर घोषित किया। उनका कहना था जिस प्रकार दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के मुग़ल गार्डन में किसी फ़िल्म की शूटिंग करने वाले राजकपूर पहले फ़िल्मकार थे, ठीक उसी तरह ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स एवं हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में कथा यू.के. सम्मान आयोजित करके तेजेन्द्र शर्मा ने हिन्दी का परचम अंग्रेज़ी के गढ़ में लहराया है। निखिल कौशिक ने अपनी डॉक्युमेंटरी के ज़रिये तेजेन्द्र शर्मा को एक कहानीकार, ग़ज़लकार, मंच एवं सिने कलाकार, नाटक निर्देशक, रेडियो पत्रकार एवं एक हिन्दी सेवी के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। तेजेन्द्र ने अपने अंग्रेज़ी एवं हिन्दी लेखन व टीवी सीरियल लेखन के बारे में बातचीत भी की है। तेजेन्द्र शर्मा की लिखी एक ग़ज़ल ‘जो तुम न मानो मुझे अपना, हक़ तुम्हारा है / यहां जो आ गया इक बार, वो हमारा है’ भी इस फ़िल्म में शामिल की गई। इस ग़ज़ल का संगीत बनाया अर्पण पटेल ने और स्वर दिया मीतल ने। तेजेन्द्र के व्यक्तित्व पर प्रो. अमीन मुग़ल, कैलाश बुधवार, डा. अचला शर्मा, मोनिका मोहता, रवि शर्मा, राकेश दुबे, आदि ने अपने अपने विचार रखे। अचला शर्मा के अनुसार तेजेन्द्र ने हिन्दी को मंदिरों से बाहर निकाल कर ब्रिटिश संसद में पहुंचा दिया है।


निखिल के साथ कैलाश जी

धन्यवाद ज्ञापन देते हुए काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा कि किसी भी देश या समुदाय की प्रगति उसकी सांसकृतिक गतिविधियों पर आधारित होती है। डा. निखिल कौशिक लेखक, पत्रकार एवं संस्कृति कर्मियों के कार्यों को उजागर करने के लिये एक नई विधा से हमारा परिचय करवाया है। मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही हमें निखिल कौशिक पर निर्मित डाक्युमेंटरी भी देखने को मिलेगी। कार्यक्रम में निखिल कौशिक ने दर्शकों के प्रश्नों के उत्तर भी दिये।

अन्य लोगों के अतिरिक्त काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, मीरा कौशिक, उषा राजे सक्सेना, बीबीसी के नरेश कौशिक और शिवकांत, श्री इस्माइल चुनारा, श्रीमती अरुणा अजितसरिया, निखिल गौर, अरुण बेदी आदि भी शाम को सफल बनाने के लिये मौजूद थे।

-दीप्ति शर्मा

Thursday, May 13, 2010

रविन्द्र नाथ टैगोर की 150वीं जयंति पर उदयपुर में मुशायरा आयोजित



उदयपुर । ”दरिया है अपने जोश में, कच्‍चा घड़ा हूॅ मैं, अपने वजूद के वास्‍ते फिर भी लड़ा हूॅ मैं“ से प्रसिद्ध गजल गायक प्रेम भण्‍डारी ने कविवर रविन्‍द्रनाथ टैगोर की एक सौ पचासवीं जयन्‍ति पर डॉ. मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्‍ट, अदबी संगम एवं वेदान्‍ता हिंद जिंक के संयुक्‍त तत्‍वाधान में आयोजित मुशायरे का आगाज किया। डॉ. प्रेम ने तरन्‍नूम में ”रूप इतना ही बहुत है, जितना मालिक दिया, इसको अब और सजाने की जरूरत क्‍या है“ पेश कर भरपूर तालियां बटोरी। शायर ईकबाल सागर ने ”झील हो, दरिया हो, तालाब हो या झरना, जिसको देखो वो सागर से खफा लगता है“ सूनाकर भरपूर दाद बटोरी।
शायर मुश्‍ताक चंचल ने ”लो आओ अब मिल जाये सभी“ को भी एकता के तले सूनाकर माहौल को खुशनुमा बना दिया। शायर असमां बेगम ने ”नस्‍ले आदम की क्‍या पुछिये, आदमी क्‍या से क्‍या हो गया“ पेश कर दाद बटोरी। खुर्शिद नवाब ने क्रान्‍तिकारी गजल ”हिन्‍दू की बात कर ना मुसलमा की बात कर, इंसा है अगर तु तो इंसान की बात कर“ सूना कर मुशायरे को परवान चढ़ाया। कवियत्रि डॉ. बीना ने ”माँ तु दुर्गा बन जा वरना ये आतंकवाद थमेगा नहीं“ सूनाकर आने वाले मदर्स-डे की सूचना दी।
नामचीन शायरा एवं मुशायरे की संयोजक डॉ. सरवत खान ने ”मुंह फेर के युॅ पास से गुजरा ना कीजिये, बातों में जहर इतना मिलाया ना कीजिये“ सूना कर खूब तालियां बटोरी।
दूरदर्शन केन्‍द्र, जयपुर के निदेशक एवं मुख्‍य अतिथि डॉ. के.के. रत्तू ने कहा कि रवीन्‍द्र नाथ टैगोर दुनिया के ऐसे शख्‍स है, जिन्‍होंने भारत और बंगला देश के राष्‍ट्रगान लिखे है। डॉ. रत्तू ने ”मैंने फांसी पर चढ़ने से पहले दरख्‍तों से दुआ की, हरे रहना, भरे रहना“ सुनाकर मुशायरे को परवान चढ़ाया। मुशायरे की सदारत करते हुए जे.एन.यू. के पूर्व कुलपति प्रो. एम.एस. अगवानी ने कहा कि रवीन्‍द्रनाथ टैगोर गांधीजी के शब्‍दों में देश के ”सेन्‍टीनल“ पहरेदार थे, उन्‍होंने जलियावाला हत्‍या काण्‍ड से दुःखी हो ”नाईट हूड“ की उपाधि ब्रिटिश सरकार को लौटा दी थी।
मुशायरे के प्रारम्‍भ में ट्रस्‍ट सचिव नन्‍दकिशोर शर्मा ने गुरुवर रविन्‍द्रनाथ टैगोर को श्रद्धान्‍जलि देते हुए गुरुवर के कवित्‍व पर प्रकाश डाला। विद्या भवन के प्राचार्य एम.पी. शर्मा ने धन्‍यवाद कहा।



प्रस्तुति- नीतेश सिंह

Friday, April 2, 2010

टोहाना ने दी शहीदों को श्रद्धाँजलि

टोहाना । फतेहाबाद


रामप्रसाद बिस्मिल के जीवन पर कोरियोग्राफी करते हुए धरोहर थियेटर गु्रप के कालाकार

शहीद भगत सिह के भान्जे जगमोहन जी व कारगिल शहीद मनोहरलाल के पिता जी रामेश्वर दास जब एक साथ कला व साहित्य सदन द्वारा आयोजित कार्यक्रम "श्रदांजलि" में पहुचे तो वहाँ पर मौजुदू सभी लोग उनके सम्मान में अपने स्थानों से उठ कर खडे हो गए एक साथ दो शहीद परिवारों के इस कार्यक्रम में पहुचने से मौहोल देशप्रेम के नारो से गूँज उठा। भगत सिह, राजगुरू,सुखदेव व कारगिल शहिद मनोहरलाल की तस्वीरों के सामने शहीद भगत सिह के भान्जे जगमोहन जी व कारगिल शहीद मनोहरलाल के पिता जीज्योती प्रज्जवित करने के बाद कार्यक्रम की शुरूआत हुई शहीद परिवारों के सम्मान में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रो॰ जगमोहन ने "भगतसिह व उनके साथियों के विचारों की वर्तमान समय में प्रांसगिकता पर विस्तार से अपना वक्तव्य रखा, उन्होनें कहा कि भगत सिह व उनके साथियों के विचारों आजाद भारत को लेकर बिल्कुल ही साफ थे, उनका मानना था कि आजाद भारत में आजादी सभी के लिए हो पर आज देश में बेरोजगारी, मंहगाई, भष्ट्राचार, भाई-भतीजावाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद व तुष्टीकरण की नितियाँ फैली हुई है। उनके विचारों को आम जन तक नही पहुचाया जा रहा उन शहीदों की सोच विज्ञानिक होनें के साथ ही तर्कपुर्ण भी थी आज भी उनके विचारों में हमें कई समस्याओं के हल मिल सकते हैं उन्होनें बताया कि भगत सिह का अपने छोटे भाई को लिखा पत्र आज के विद्यार्थियों के लिए निःसिन्देह ही प्ररेणा देने वाला हैं उन्होंनें कहा था कि हिम्मत रखों और मन लगा कर पढो- इसी तरह से उन्होंने अपने दूसरे भाई को लिखा कि हाथ को कोई काम सिख लो तो बेहतर है। आज देश के लोगों को शहीदों के बताए मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
कारगिल शहिद के पिता जी ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम होते रहने चाहिएं मौके पर बजरंग माडल स्कूल के बच्चों ने कारगिल युद पर कोरियोग्राफी पेश की। "धरोहर" थियेटर गुप ने कोरियोग्राफी शायर रामप्रसाद बिस्मल "विरासत" नामक कोरियोग्राफी के माध्यम से शहीद विस्मिल के जीवन के कई पहलुओं को उजागर किया ।
सदन के सचिव नवल सिह ने कार्यक्रम में आने वाले सभी अथितियो का स्वागमत करते हुए कहा कि सदन का उद्देश्य जमीन से जुड़ी प्रतिभाओं को सामने लाना है इसके लिए भविष्य में भी कार्यक्रमों को सिलसिला शहरवासियों के सहयोग से चलाया जाता रहेगा।
इस मौके पर भारत विकास परिषद, आजाद युवा सगठन, यंग इण्डिया फाउंडेशन, मानव सेवा संगम, लक्कड मार्किट कमेटी ऐशोसियन, विधि र्स्पोटस कल्ब, आजाद र्स्पोटस कल्ब के आलावा अन्य संस्थाओं के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।

ज्योति को प्रज्जलवित करते हुए प्रो॰ जगमोहन व रामेश्वर दास के साथ संस्था के सदस्य

प्रस्तुति-
नवल सिह
सचिव, कला व साहित्य सदन

Tuesday, December 15, 2009

सूरीनाम की एक शाम डॉ. हरिवंशराय बच्चन के नाम


कविता पाठ करती एक छात्रा
डॉ. हरिवंशराय बच्चन की 102वीं जयंती की पूर्व संध्या पर 26 नवंबर 2009 को सूरीनाम में भारत के राजदूतावास ने पारामारिबो स्थित भारतीय सांस्कृतिक केंद्र में "एक शाम डॉ. हरिवंशराय बच्चन के नाम" कायर्क्रम आयोजित किया गया, कार्यक्रम का आरंभ संगीत छात्रों ने सरस्वती वंदना से किया जिसका निर्देशन संगीत अध्यापिका श्रीमती मधुमिता बोस ने किया। भारतीय दूतावास की हिंदी एवं संस्कृति अधिकारी श्रीमती भावना सक्सैना ने डॉ. हरिवंशराय बच्चन के जीवन व रचनाओं पर प्रकाश डाला। छायावाद के प्रमुख कवि को जीवन संघर्ष का कवि बताते हुए उन्होंने कहा कि बच्चन जी सिर्फ मधुशाला के ही कवि नहीं वह आज के युग को भी यह चेतना प्रदान करते हैं कि विकास का मार्ग हमें स्वयं बनाना है; और इस कार्यक्रम का उद्देश्य डॉ. हरिवंशराय बच्चन को श्रद्धांजली अर्पित करने के साथ साथ सूरीनाम के हिंदी प्रेमियों को साहित्य रचना की ओर प्रेरित करना भी है। 25 नवंबर 2009 को सूरीनाम साहित्य मित्र संस्था के आठ वर्ष पूरे होने व उस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम पर बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि सूरीनाम में साहित्य रचना हो तो रही हे किंतु प्रकाशन के अभाव में विश्व तक पहुँच नहीं पा रही, इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है।

इस कायर्क्रम में भारत के राजदूतावास के द्वितीय सचिव व चाँसरी प्रमुख, श्री अरुण कुमार शर्मा, सूरीनाम हिंदी परिषद के अध्यक्ष, श्री हरनारायण जानकीप्रसाद, सचिव श्री भोलानाथ नारायण, और परीक्षा समिति के अध्यक्ष पंडित पाटनदीन भी उपस्थित थे।

कायर्क्रम में हिंदी छात्रों ने डॉ. हरिवंशराय बच्चन की कविताओं का वाचन किया। कोशिश करने वालों की हार नहीं होती और जो बीत गई सो बात गई कविताएँ बहुत पसंद की गईं।

सूरीनाम हिंदी परिषद के सचिव श्री भोलानाथ नारायण ने भी डॉ बच्चन के काव्य और भाषा पर चर्चा की और कार्यक्रम में भाग लेने वाले सभी व्यक्तियों से ङिंदी साहित्य से जुड़ने का आग्रह किया।

कार्यक्रम का अंत द्वितीय सचिव श्री अरुण कुमार शर्मा के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।


उपस्थित श्रोतागण


चाँसरी प्रमुख श्री अरुण कुमार शर्मा

Friday, December 11, 2009

कैलाश गौतम स्मृति समारोह में कुमार विश्वास का काव्यपाठ


काव्यपाठ करते डॉ॰ कुमार विश्वास
इलाहाबाद।

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है।।
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है।
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है।।



इन पंक्तियों से काव्यजगत और कविसम्मेलनी मंचों पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाकर लोकप्रियता के नये रिकार्ड कायम करने वाले युवा कवि और गीतकार डॉ. कुमार विश्वास ने जब खचाखच भरे एकेडेमी सभागार में माइक सम्हाला तो वातावरण मिश्रित भावों से भर उठा था। एक तरफ़ स्व.कैलाश गौतम की पुण्य तिथि के अवसर पर सहज ही उतर आयी उदासी का भाव सबके मन में बैठा हुआ था तो दूसरी ओर कैलाश जी की लिखी कविताओं के अनेक उद्धरण पूर्व वक्ताओं से सुनकर सभी श्रोता उनके विलक्षण कवित्व से आह्लादित भी थे।

कुमार विश्वास ने गौतम जी को याद करते हुए कहा कि कैलाश गौतम एक सच्चे और साहसी कवि थे। समाज की विडम्बनाओं को जिस हिम्मत और ताकत से व्यक्त करते थे वैसा बिरले लोगों में ही मिलता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कैलाश जी काव्यजगत में हमेशा अण्डरएस्टिमेटेड रहे।

अपनी कविताओं में उन्होंने आदमी की आम संवेदनाओं के विविध रूपों को प्रस्तुत किया। उनकी रूमानी कविताओं ने विशेषकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने अपने अनेक प्रसिद्ध मुक्तक सुनाकार खूब तालियाँ बटोरी।

1.
बहुत टूटा बहुत बिखरा थपेडे सह नही पाया
हवाऒं के इशारों पर मगर मै बह नही पाया
रहा है अनसुना और अनकहा ही प्यार का किस्सा
कभी तुम सुन नही पायी कभी मै कह नही पाया

2.
बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन
मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तन चंदन
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की है
एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन

3.
तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ
तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ


4.
पनाहों में जो आया हो तो उस पर वार करना क्या
जो दिल हारा हुआ हो उस पर फिर अधिकार करना क्या
मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कश्मकश मे है
हो गर मालूम गहराई तो दरिया पार करना क्या


5.
समन्दर पीर का अन्दर है लेकिन रो नही सकता
ये आँसू प्यार का मोती है इसको खो नही सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नही पाया वो तेरा हो नही सकता



उन्होंने अपनी चुटीली व्यंग्योक्तियों से मीडिया और चैनलों पर प्रहार किया और कैलाश गौतम को याद करते हुए कहा कि कैलाश गौतम एक बड़े कवि हैं क्योंकि वे जिम्मेदारियों के बोध के कवि हैं। उन्होंने ग्लोबल विलेज की बात करते हुए कहा कि भारत में उपनिषदों में ग्लोबल विलेज की बात ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के रूप में बहुत पहले ही कही गयी है। उन्होंने अपने वक्तव्यों के माध्यम से समाज में फैली विसंगतियों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने देशभक्ति के जज्बे को प्रदर्शित करते हुए गीत पढ़ा-

शौहरत न अता करना मौला, दौलत न अता करना मौला।
बस इतना अता कना चाहें, जन्नत न अता करना मौला।।
शम्ए वतन की लौ पर, जब कुर्बान पतंगा हो।
होठो पर गंगा हो हाथों पर तिरंगा हो।


उन्होंने अपनी लम्बी कविता ‘पगली लड़की’ के कुछ अंश भी सुनाए जो बहुत सराहे गये।

अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसू के संग होते हैं,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं,सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार-बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,
जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।


इससे पहले कार्यक्रम का शुभारम्भ माता सरस्वती एवं स्व० श्री कैलाश गौतम जी के चित्रों पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ श्री रामकेवल जी, श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, डॉ० शिव गोपाल मिश्र, डॉ० कुमार विश्वास ने किया। इस अवसर पर सुधांशु उपाध्याय, प्रदीप कुमार, यश मालवीय एवं कैलाश गौतम जी के मित्र एवं सहयोगियों ने कैलाश गौतम जी के चित्र पर पुष्प अर्पित करके भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

एकेडेमी के सचिव राम केवल जी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि स्व० कैलाश गौतम जी की स्मृति में आयोजित यह कार्यक्रम एक बहुत ही छोटा सा प्रयास है जिसके माध्यम से गौतम जी को स्मरण किया जा रहा है। एकेडेमी के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने शाल भेंट कर आमंत्रित कवि डा० कुमार विश्वास का स्वागत किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिलाधिकारी श्री संजय प्रसाद (आई०ए०एस०) ने कहा कि स्व० श्री कैलाश गौतम जी को मंच के माध्यम से मैं श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। हमारे समाज में जो साम्प्रदायिक जहर है उनके प्रति कवि की संवेदना मात्र रचना नहीं है। कवि की वाणी में लेखनी में हर वर्ग के लिए कोई सन्देश होता है। रचनाएं शक्ति प्रदान करती है। आदमी दुविधा में हो तो वह सही मार्ग प्रदर्शित करती है। इस शहर ने बड़े नामचीन कवियों, साहित्यकारों को जन्म दिया है। यहां के चप्पे-चप्पे में इतिहास है। सही मायने में गौतम जी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब उनके बताये मार्ग पर चलने का प्रयास करें। हर नागरिक की एक जिम्मेदारी होती है, उसे निभाये तो सपनों के भारत को साकार कर सकता है।

इस अवसर पर शहर के प्रतिष्ठत और लोकप्रिय गीतकार यश मालवीय ने स्व० कैलाश गौतम को याद करते हुए कहा कि मैं कैलाश गौतम जी के जाने के पश्चात उनको लिखी हुई एक चिट्ठी सुनाता हूं। इस चिट्ठी में मालवीय जी ने कैलाश गौतम की स्मृतियों को मार्मिक ढंग से याद करते हुए कहा कि "तुम गंगा के देवव्रत थे, तुम यमुना के बंधु जैसे थे, तुममें संस्कृतियों का संगम लहराता था। तुम झूंसी से अरैल, अरैल से किले तक शरद की धूप और चांदनी आत्मा में उतरने देते थे, कहते थे- "याद तुम्हारी मेरे संग वैसे ही रहती है, जैसे कोई नदी किले से सटके बहती है।" साथ ही यश मालवीय जी ने गौतम जी की स्मृति में एक कविता भी प्रस्तुत की।

माध्यमिक शिक्षा परिषद के अपर सचिव श्री प्रदीप कुमार जी ने कहा कि मैं गाजीपुर में था जब समाचार पत्रों में पढ़ा कि कैलाश गौतम जी नहीं रहे। सुनते ही उनकी कविता अमौसा का मेला आंखों के सामने आ गयी ऐसा लगा मानो अमौसा के मेले में सब खो गया। कैलाश गौतम देह से शहर में रहे पर मन गांव में था। कैलाश गौतम के काव्य में ग्रामीण जीवन की विसंगतियां आंखों के समक्ष आ जाती थीं वह निश्चित रूप से अतुलनीय थे।


उपस्थित श्रोतागण

श्लेष गौतम ने अपने पिता श्री कैलाश गौतम को गीतात्मक शब्दों में श्रद्धांजलि अर्पित की।

उनके गीत के बोल थे -
सूरज डूबा चांद छिपा, तारे भी टूट गये।
नेह का बन्धन बना रहा पर देह के छूट गये

उनके दूसरे गीत के बोल थे
हुआ न कोई न होई होगा पिता तुम्हारे बाद,
पल पल तुमको याद कर रहा आज इलाहाबाद।।


कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ० शिवगोपाल मिश्र ने कहा कि मैं कैलाश गौतम को बहुत पहले से जानता हूं। मैं उनकी ग्रामीण पृष्ठभूमि की कविताओं को पसन्द करता हूं। जो कवि जनता के बीच से आयेगा उसे शासन-प्रशासन से डर नहीं लगेगा। हमारे नये कवि कई विधाओं में काम कर रहे हैं। आज सभागार की भीड़ को देखकर प्रसन्नता हो रही कि लोग कवि गोष्ठियों में शामिल हो रहे हैं और नये लोगों को सम्मानित कर रहे हैं।


कार्यक्रम का संचालन इमरान प्रतापगढ़ी ने कैलाश गौतम से जुड़ी भावविभोर कर देने वाली यादों को स्मरण करते हुए किया। वह बीच-बीच में कैलाश गौतम से जुड़े संस्मरणों से गौतम जी को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए एक कविता प्रस्तुत की-

सूनी सूनी दीवारे सूना सूना ये घर है,
है उदास तारीखें और चुप कलेण्डर है।
मैंने खुद से जब पूंछा क्यों उदास मंजर है
तो दिल ये चीख कर बोला, आज नौ दिसम्बर है।


कार्यक्रम के अन्त में एकेडेमी के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

Sunday, November 15, 2009

मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद की 121वीं जयंती पर रुधौली में सेमिनार और मुशायरा

बस्ती।



इमामुलहिन्द आज़ादी के अजीम लीडर और स्वतंत्र भारत के प्रथम केन्द्रीय शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की 121वीं यौमें पैदाइश के अवसर पर श्रद्धाँजलि अर्पित करने के लिए मजलिश-ए-इस्लाहुल मुस्लमीन-रूधौली के द्वारा संचालित मौलाना अबुल कलाम आजाद इस्लामिक जूनियर हाईस्कूल के तत्वाधान में सेमीनार एवं मुशायरे का आयोजन किया गया। सेमिनार में वक्ताओं ने मौलाना आज़ाद के जीवन के हर पहलू पर खुल कर बहस की। सेमीनार की अध्यक्षता कर रहे मौलाना अब्दुल हफ़ीज़ रहमानी सेखुल हिन्द-एकेडमी दारुल-उलूम देवबन्द ने कहा कि मौलाना आजाद देश की एकता के सबसे बड़े अलम बरदार ते, और शख्त विरोधी थे। उन्होंने कहा कि जिस समय आज़ादी का आन्दोलन पूरे शबाब पर था उस समय देश में दो तरह के लोग सर उठाने लगे। एक तबका देश को आज़ाद कराने में कमर कसे था तो दूसरा कुर्सी की दौड़ में। इसी कसमकश में देश विभाजन का शिकार हो गया और पाकिस्तान वज़ूद में आया। मौलाना रहमानी ने किसी का नाम न लेते हुए कहा कि जो लोग देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार थे वे पाकिस्तान की हालत देखें।

मुम्बई हाईकोर्ट के अधिवक्ता और कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जनाब कुद्रतुल्लाह ने सुझाव दिया कि मौलाना आज़ाद पर हर महीने लेख द्वारा चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मौलाना आज़ाद अपनी बहुचर्चित पत्रिका अल हलाल तथा हलबलाल के द्वारा देशवासियों के दिलों में आज़ादी की आग भड़का दी, जिससे देशवासी एकत्र होकर आज़ादी के लिए कमर बस्ता हुए थे। हक़ीम अब्दुर्रउफ ने कहा कि आज़ादी से पूर्व मौलाना आज़ाद कई बार जेल गये।

संस्थाध्यक्ष मोहम्मद असलम "शॉदा बस्तवी"ने कहा कि मौलाना आज़ाद को देश का पहला केन्द्रीय शिक्षा मंत्री बनाया गया। उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए बहुत से कार्य किये। कार्यक्रम का शुभारम्भ विद्ञालय के छात्र एजाज अहमद ने तिलावत-ए-कलाम पाक से किया। जबकि 8वीं कक्षा की छात्रा कौशर जहाँ ने मौलाना आज़ाद के साहित्यिक जीवन पर प्रकाश डालकर लोगों के दिलों को मोह लिया। विद्यालय के छात्र अब्दुल माबूद ने तराना पेश किया। उसके बाद कार्यक्रम मुशायरे में बदल गया। सबसे पहले सन्त कबीर नगर जनपद के सेमरियावाँ बाज़ार के मशहूर और उस्ताद शायर मनव्वर बस्तवी ने यह शेर पेश करके खूब वाहवाही बटोरी-

कहो उससे तमन्ना करे न फूलों की, जो फसल उगाता रहा बबूलों की।
तमाम उम्र गुजरी है बेवसूलों में,वह बात कैसे करेगा वसूलों की।।


कविराज भट्ट की बारी आयी तो उन्होंने मौलाना आज़ाद को श्रद्धाँजलि अर्पित करते हुए कहा-

मौलाना आज़ाद तुम्हें सौ बार नमन है;जन्म दिवस पर सभी कर रहे अभिनन्दन है।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे रशीद बस्तवी का यह शेर खूब सराहा गया।

धड़कता दिल मेरे सीने में है रशीद आखिर,
जुनू में जुल्म की जन्जीर तोड़ सकता हूँ।


शाँदा बस्तवी ने श्रोताओं का ध्यान मौलाना आज़ाद की तरफ आकृष्ट कराते हुए यह शेर पेश किया।

मुल्कोमिल्लत के निगहबान थे मौलाना कलाम।
गुनचये जिस्त का उनवान थे मौलाना कलाम।।


इसके बाद डॉ॰ परशुराम वर्मा ने अपनी रचना के माध्यम से मौलाना आज़ाद के जीवन पर प्रकाश डाला। उनकी पंक्तियाँ खूब सराही गईं।

वतन के लिएलहू देकर तूने, बढ़ाया जिसकी शान-ए-आज़ाद।
तेरे अहसानों को नहीं भूल सकता, ये अपना हुन्दुस्तान-ए-आज़ाद।।


ख्याति प्राप्त शायर दीदार बस्तवी ने मुशायरे को बुलन्दी पर पहुँचा दिया, उनका शेर-

दिलोजिगर में जरा हौसला तो पैदा कर, मिलेगी मंजिल तू रास्ता तो पैदा कर।
हर एक जुल्म की जन्जीर टूट जायेगी, तू अपने वीन कोई रहनुमा तो पैदा कर।






प्रेषक-
मोहम्मद असलम 'शाँदा बस्तवी'
रुधौली (बस्ती)