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Tuesday, November 22, 2011

देवनागरी लिपि और सूचना प्रौद्योगिकी विषयक विचारगोष्‍ठी

विश्‍व नागरी विज्ञान संस्‍थान के तत्‍वावधान में 28 अप्रैल, 2011 को देवनागरी लिपि और सूचना प्रौद्योगिकी विषयक विचारगोष्‍ठी का आयोजन के.आई.आई.टी. कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, गुड़गाँव के परिसर में सुविख्‍यात साहित्‍यकार तथा भाषाविद् प्रो. गंगा प्रसाद विमल की अध्‍यक्षता में हुआ। नागरी विज्ञान संस्‍थान के अध्‍यक्ष श्री बलदेव राज कामराह ने विचारगोष्‍ठी का उद्घाटन करते हुए कहा कि आज देवनागरी लिपि की महत्ता बढ़ गई है और इसलिए इसके विकास में प्रौद्योगिकी कारगर भूमिका निभा सकती है। संस्‍थान के उपाध्‍यक्ष तथा वैज्ञानिक डॉ. श्‍याम सुंदर अग्रवाल ने स्‍वागत करते हुए बताया कि नागरी लिपि के वैज्ञानिक स्‍वरूप को देखते हुए यह आवश्‍यक हो गया है कि इसमें सूचना प्रौद्योगिकी का सहयोग प्राप्‍त किया जाए ताकि इसके मानकीकरण और विकास में अधिकाधिक सहायता मिल सके।
विचारगोष्‍ठी के संयोजक संस्‍थान के महासचिव और निदेशक तथा सुप्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक प्रो. कृष्‍ण कुमार गोस्‍वामी संस्‍थान और विचार गोष्‍ठी का परिचय देते हुए बताया कि देवनागरी लिपि ब्राह्मी लिपि से उद्भूत भारत की प्राचीनतम लिपि है। इस समय इसका प्रयोग संविधान में उल्लिखित बाईस भाषाओं में से दस मुख्‍य भाषाओं में हो रहा है। यह लिपि अन्‍य सभी लिपियों से अधिक वैज्ञानिक है और इसीलिए इसके मानकीकरण, विकास और संवर्धन में सूचना प्रौद्योगिकी विशिष्‍ट भूमिका निभा सकती है और यह विश्‍व लिपि के रूप में स्‍थापित हो सकती है।

विचारगोष्‍ठी के प्रथम सत्र की मुख्‍य वक्‍ता सूचना और प्रौद्योगिकी विभाग, संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय,भारत सरकार की निदेशक और वैज्ञानिक डॉ. (श्रीमती) स्‍वर्णलता ने ‘लिपि व्‍याकरण’ के बारे में बताते हुए कहा कि लिपि व्‍याकरण किसी भाषा की लेखन पद्धति की व्‍यवहारपरक पैटर्न निर्देशित करता है। इसमें संसक्‍त पैटर्न का इस्‍तेमाल होता है जो किसी भाषा के भाषापरक व्‍याकरण के समान होता है। भारतीय भाषाओं के संदर्भ में लिपि व्‍याकरण की आवश्‍यकता पर चर्चा करते हुए डॉ. स्‍वर्णलता ने कहा कि इसमें फोंट का डिजाइन बनाते समय यह देखा जाता है कि यह विशेष लिपि के मानकों के अनुरूप हो और साथ ही कुंजी पटल तथा इनपुट कार्यप्रणाली का डिजाइन बनाते हुए यह भी अपेक्षा रहती है कि वह विशिष्‍ट भाषाभाषी समुदाय की आवश्‍यकताओं को पूरा करे। विशेष लिपि के वर्ण समूह को यूनीकोड के साथ भी संयोजित किया जा सके। इसी संदर्भ में देवनागरी लिपि के लिपि व्‍याकरण का निर्माण करने के प्रयास किए जा रहे है। देवनागरी लिपि के स्‍वर, व्‍यंजन, मात्रा आदि के साथ संयुक्‍ताक्षरों की विविधता पर भी ध्‍यान दिया जा रहा है ताकि इसका विकास यूनीकोड के अनुरूप हो। डॉ. स्‍वर्णलता के प्रपत्र के बाद केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान के पूर्व प्रोफेसर डॉ. मोहन लाल सर ने देवनागरी लिपि पर सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा किए गए कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि इस विषय पर और अधिक कार्य करने की आवश्‍यकता है। नागरी लिपि परिषद् के महासचिव डॉ. परमानंद पाँचाल ने इस बात पर बल दिया कि देवनागरी लिपि के विकास में सूचना प्रौद्योगिकी वैज्ञानिकों की अत्‍यंत आवश्‍यकता है। अंत में प्रो. विमल ने अपने अध्‍यक्षीय भाषण में सूचना प्रौद्योगिकी के सहयोग से देवनागरी के अधिक प्रयोग की संभावनाओं की ओर संकेत किया।
दूसरे सत्र में डॉ. परमानंद पाँचाल की अध्‍यक्षता में मुख्‍य वक्‍ता सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के वरिष्‍ठ निदेशक, वैज्ञानिक और संस्‍थान के उपाध्‍यक्ष डॉ. ओम विकास ने ‘सूचना प्रौद्योगिकी में नागरी लिपि के फिसलते कदम’ विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि देवनागरी लिपि का वैज्ञानिक आधार होने के कारण पाणिनि ने ध्‍वनियों के उच्‍चारण और उच्‍चारण विधि की लिपि संरचना सारणी का निर्माण किया, जिसे ‘लिपि व्‍याकरण’ कहा जाता है। आगे बोलते हुए डॉ. ओम विकास ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी का विकास सैद्धांतिक रूप से लिपि या भाषापरक नहीं है क्‍योंकि रोमन लिपि में अंग्रेजी में जो संभव है, वह नागरी लिपि में भी संभव है। लेकिन प्रौद्योगिकी का प्रयोग व्‍यापक रूप से नहीं हो रहा है। इसीलिए सकल भारती फोंट का प्रयोग किया जाए तो इससे न तो केवल हिन्‍दी को लाभ होगा, वरन् सभी भारतीय भाषाओं को भी लाभ होगा। इस समय यूनीकोड का प्रचार-प्रसार तो बढ़ा है, लेकिन फोनीकोड के निर्माण से और अधिक सुविधा होगी। इस संदर्भ में डॉ. ओम विकास ने यह खेद प्रकट किया कि विभिन्‍न कार्यक्षेत्रों में देवनागरी का प्रयोग नहीं हो रहा, जबकि सूचना प्रौद्योगिकी इसमें काफी योगदान कर सकती है। इसके बाद प्रगत संगणन विकास केंद्र (सी-डैक) नोएडा के निदेशक श्री वी.एन.शुक्‍ल ने डॉ. ओम विकास की वेदना को समझते हुए कहा कि देवनागरी लिपि की स्थिति इतनी शोचनीय नहीं कि हम दु:खी हो। इसका प्रयोग तो अधिकाधिक हो रहा है। केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान के भाषा प्रौद्योगिकी विभाग के पूर्व अध्‍यक्ष प्रो. ठाकुरदास ने कुछ कार्यक्षेत्रों में देवनागरी लिपि का प्रयोग न होने पर अपनी वेदना प्रकट की और बताया कि सरकारी स्‍तर पर उतना कार्य नहीं हो रहा है जितना गैर-सरकारी स्‍तर पर हो रहा है। इस संबंध में हमें गंभीरता से विचार करना होगा। अंत में डॉ. पाँचाल ने अपने अध्‍यक्षीय भाषण में कहा कि देवनागरी का प्रचार-प्रसार तभी व्‍यापक हो सकता है, यदि हम सब इसमें पूरी तरह से संलिप्‍त हो जाएँ।

इस विचारगोष्‍ठी के समापन पर श्री बलदेवराज कामराह ने आशा प्रकट की कि भविष्‍य में इस विषय पर शोधकार्य होंगे और इंजीनियरिंग तथा सूचना प्रौद्योगिकी के छात्रों से इस विषय पर कार्य कराया जाएगा। के.आई.आई.टी. कॉलेज ऑफ एजुकेशन के प्राचार्य प्रो. मनजीत सेनगुप्‍ता ने सभी विद्वानों, प्रतिभागियों और छात्रों का धन्‍यवाद ज्ञापन भावभीनी शव्‍दावली में किया। इस विचारगोष्‍ठी का संचालन प्रो. कृष्‍ण कुमार गोस्‍वामी और के.आई.आई.टी. कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग की प्राध्‍यापक सुश्री अनीता शर्मा ने किया।

इस विचारगोष्‍ठी में डॉ. एन.के. अग्रवाल, श्री विक्रम सिहँ, डॉ. नीरज भारद्वाज, श्रीमती मंगल मेहता, श्रीमती कनिका कौर, डॉ. सोमनाथ चंद्रा, प्रो.वी.के.स्‍याल, प्रो.आर.के.जैन, प्रो.डी.वी.कालरा, डॉ. हर्षवर्धन, आदि विद्वानों ने सक्रिय भाग लिया।
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Friday, April 22, 2011

सुविख्यात भाषाविज्ञानी और आलोचक प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी की मॉरिशस यात्रा



विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरिशस के तृतीय आधिकारिक कार्यारंभ दिवस पर भारत के सुविख्यात भाषाविज्ञानी और आलोचक प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी को मुख्य अतिथि के रूप में मॉरिशस में आने का निमंत्रण दिया गया। प्रो. गोस्वामी 06 फ़रवरी, 2011 को मॉरिशस पहुँचे और उनका स्वागत विश्व हिन्दी सचिवालय के महासचिव डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र और उप महासचिव गंगाधर सिंह गुलशन सुखलाल ने किया।

11 फ़रवरी, 2011 को सचिवालय का आधिकारिक कार्यारंभ दिवस पर महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट के सभाकक्ष में सचिवालय की कार्यकारिणी परिषद् के सदस्य और मॉरिशस के सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री माता बदल अजामिल की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। इसमें प्रो. गोस्वामी ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने वक्तव्य में ‘अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में हिन्दी’ विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि विदेशों में रह रहे हिन्दी भाषी भारतीयों को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है - एक वर्ग में वे देश आते हैं जिनमें भारतीय मूल के लोग वर्षों पहले गए थे और वहीं बस गए हैं। इनमें मॉरिशस, फीजी, गुयाना, सूरिनाम, टोबेगो एवं त्रिनिदाद देश आते हैें। इन देशों में हिन्दी का व्यापक प्रयोग होता है। इनमें हिन्दी का सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ है, साहित्यिक सृजन का संदर्भ है और प्रयोजनमूलक संदर्भ है। इन देशों में साहित्य रचना तो होती है, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अस्मिता का भी प्रश्न ज्वलंत रहता है। दूसरे वर्ग में वे देश आते हैं जो आधुनिक युग में नौकरी के लिए भारत से बाहर गए और वही अल्पसंख्यक वर्ग के रूप में प्रयोजनमूलक कार्य के लिए वहीं बस गए। इनमें अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, इंग्लैंड, हालैंड, मलेशिया, सिंगापुर आदि देश हैं जिनके प्रवासी भारतीय अर्थात् ‘डायस्पोरा’ अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता बनाए रखने के लिए अपनी भाषा हिन्दी को आवश्यक मानते हैं। तीसरे वर्ग में पाकिस्तान, नेपाल, अफ़गानिस्तान, श्रीलंका आदि पड़ोसी देश एक ही भाषा-परिवार की भाषाएं बोलते हैं और इसी कारण उनका हिन्दी से परिचय होना स्वाभाविक है। चौथे वर्ग में रूस, जापान, कोरिया, मंगोलिया, चीन आदि देशों तथा एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका महाद्वीपों के लगभग 150 देशों में हिन्दी शिक्षण की व्यवस्था है। इन देशों में हिन्दी बोली-सुनी नहीं जाती, किंतु भारतीय दर्शन, संस्कृति और साहित्य के अध्ययन के लिए हिन्दी की आवश्यकता महसूस की जाती है। इसीलिए यहाँ हिन्दी के शैक्षिक संदर्भ का विशेष महत्व है। इसके बाद काव्यगोष्ठी का कार्यक्रम आयोजित किया गया। अंत में अजामिल जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में मॉरिशस में हिन्दी में रचे जा रहे साहित्य का परिचय दिया। भारतीय उच्चायुक्त के द्वितीय सचिव श्री मीमांसक ने अपने धन्यवाद प्रस्ताव में हिन्दी की गरिमा को बढ़ाने में मॉरिशस के योगदान की प्रशंसा की। इसका संचालन सचिवालय के उप महासचिव श्री गुलशन सुखलाल ने किया। इसमें मॉरिशस के हिन्दी साहित्यकार रामदेव धुरंधर, श्रीमती भानुमति नागदान, हिन्दी संगठन के अध्यक्ष श्री राजनारायण गति, महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट के प्रोफ़ेसर डॉ. सुंदर, डॉ. राजरानी गोबिन और श्री कुमारदत्त गुदारी विनय ने सक्रिय भाग लिया।

प्रो. गोस्वामी ने 10 फरवरी, 2011 को सचिवालय के महासचिव और उपमहासचिव सहित मॉरिशस के राष्ट्रपति महामहिम श्री अनिरुद्ध जगनाथ से राष्ट्रपति निवास में भेंट की। उनके साथ भारत-मॉरिशस के संबंधों तथा हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार पर बातचीत हुई। भारत के उच्चायुक्त माननीय श्री मधुसूदन गणपति से भी भेंट हुई और उनके साथ हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर चर्चा हुई। प्रो. गोस्वामी ने महामहिम राष्ट्रपति को ‘हिंदी का भाषिक और सामाजिक परिदृश्य’ पुस्तक भेंट की। माननीय उच्चायुक्त को ‘आधुनिक हिंदीः विविध आयाम’ पुस्तक भेंट की। इसके अतिरिक्त उपउच्चायुक्त श्री प्रशांत पिसे से भी औपचारिक भेंट हुईै।



प्रो. गोस्वामी ने मॉरिशस ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन में दो रेडियो कार्यक्रम तथा टेलीविज़न कार्यक्रम प्रस्तुत किए। इनमें भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर गंभीर चर्चा हुईं दो दिन मॉरिशस भ्रमण करते हुए प्रो. गोस्वामी ने मॉरिशस के सौंदर्य के दर्शन किए। इस समूची यात्रा में सचिवालय के महासचिव डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र और उप महासचिव श्री गंगाधर सिंह गुलशन सुखलाल का आतिथ्य-सत्कार स्तुत्य था।

Tuesday, October 5, 2010

प्रो. हर्मन वॉन आल्‍फन का ‘अमेरिका में हिन्दी’ पर विशेष व्‍याख्‍यान



गुड़गाँव
विश्‍व नागरी विज्ञान संस्‍थान के तत्‍वावधान में 19 अगस्‍त, 2010 को के.आई.आई.टी. एजुकेशन वर्ल्‍ड के के.आई.आई.टी. कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के परिसर में टेक्‍सॅस विश्‍वविद्यालय, ऑस्टिन (यू.एस.ए.) के दक्षिण एशियाई अध्‍ययन संस्‍थान के हिन्दी-उर्दू फ्लैगशिप के निदेशक प्रो. हर्मन वॉन आल्‍फन का व्‍याख्‍यान ‘अमेरिका में हिन्दी की स्थिति’ पर नागरी विज्ञान संस्‍थान के अध्‍यक्ष श्री बलदेवराज कामराह की अध्‍यक्षता में आयोजित हुआ। नागरी विज्ञान संस्‍थान के उपाध्‍यक्ष और के.आई.आई.टी. कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के कार्यपालक निदेशक डॉ. श्‍याम सुंदर अग्रवाल ने प्रो. वॉन आल्‍फन का स्‍वागत किया। नागरी विज्ञान संस्‍थान के महासचिव ओर निदेशक प्रो. कृष्‍ण कुमार गोस्‍वामी ने संस्‍थान का परिचय देते हुए और प्रो. वॉन आल्‍फन के कृतित्‍व पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि अंतरराष्‍ट्रीय संदर्भ में हिन्‍दी की विशिष्‍ट भूमिका हो गई है और विश्‍वजनीन भाषा के रूप में यह विभिन्‍न कार्यक्षेत्रों में भी प्रयुक्‍त होने लगी है।

प्रो. वॉन आल्‍फन ने हिन्‍दी के महत्‍व की चर्चा करते हुए कहा कि हिन्‍दी विश्‍व की तीन बड़ी भाषाओं –चीनी, हिन्‍दी और अंग्रेजी में मानी जाती है। हिन्‍दी की व्‍यापकता को देखते हुए अमेरिका में विश्‍ववि़द्यालयों के अतिरिक्‍त हिन्‍दी स्‍कूलों में भी पढ़ाई जाती है। ह्यूस्‍टन में एक हिन्‍दी स्‍कूल है जिसमें स्‍पे‍निश, गोरे और प्रवासी भारतीय बच्‍चे पढ़ाए जा रहे हैं। उत्तर टेक्‍सॅस में तीन साल से व्‍यापार से संबद्ध हिन्‍दी और चीनी में से किसी एक भाषा का चयन कर सकते हैं। ग्रीष्‍मकाल में अटलांटा में एक सौ अमरीकी बच्‍चों को दस दिन हिन्‍दी सिखाई जाती है। टेक्‍सॅस विश्‍वविद्यालय में भी भाषा संबंधी फ्लैगशिप कार्यक्रम चलाए जाते हैं। यह कार्यक्रम सन् 2002 में प्रारंभ हुआ था। पहले चीनी और अरबी फ्लैगशिप का श्रीगणेश हुआ था, बाद में हिन्‍दी-उर्दू फ्लैगशिप की स्‍थापना हुई। इस हिन्‍दी-उर्दू फ्लैगशिप कार्यक्रम का उद्ददेश्‍य शिक्षार्थियों को वैश्विक व्‍यवसायी (ग्‍लोबल प्रोफेशनल) बनाना है जिसमें चार वर्ष तक डॉक्‍टर, इंजीनियर, प्रशासनिक आदि लोग हिन्‍दी सीखते हैं। इसका यह भी लक्ष्‍य है कि इन व्‍यवसायों के लोग अंग्रेजी में तो काम करते ही हैं, हिन्‍दी में भी काम करें।

प्रो. हर्मन वॉन आल्‍फन ने इस बात का उल्लेख किया कि हिन्‍दी एक गंभीर मामला है, यह कोई मनोरंजन का विषय नहीं है। ऐसा आवश्‍यक है कि सभी गंभीर कार्य अंग्रेजी में किया जाए। उन्‍होंने यह भी बताया कि भारत में राष्‍ट्रमंडल खेलों के दौरान विदेशियों को ऐसा न लगे कि भारत में अंग्रेजी ही प्रयुक्‍त होती है। अत: अपनी भाषा का विशिष्‍ट स्‍थान होता है और इस दृष्टि से दुनिया के सभी लोग भारत की ओर देख रहे हैं और इसमें हिन्‍दी की विशेष भूमिका है।

अंत में के.आई.आई.टी. कॉलेज ऑफ एजुकेशन के प्राचार्य प्रो. मंजीत सेनगुप्‍ता ने धन्‍यवाद ज्ञापन किया। इस व्‍याख्‍यान में नागरी लिपि परिषद् के सचिव डॉ. परमानंद पांचाल, के.आई.आई.टी. एजुकेशन वर्ल्‍ड के चीफ एक्‍जीक्‍यूटिव डॉ. हर्ष वर्धन, प्रो. आर.के.जैन, प्रो. वी.के. स्‍याल की उपस्थिति उल्‍लेखनीय रही है।

व्‍याख्‍यान से पूर्व विश्‍वनागरी विज्ञान संस्‍थान की कार्यकारिणी स‍मिति की बैठक हुई, जिसमें प्रो. हर्मन वॉन आल्‍फन का स्‍वागत हुआ और उन्‍हें अमेरिका के प्रतिनिधि के रूप में कार्यकारिणी समिति का सदस्‍य घोषित किया गया। संस्‍थान के महासचिव प्रो. कृष्‍ण कुमार गोस्‍वामी ने संस्‍थान की गतिविधियों की जानकारी देते हुए इसके भावी कार्यक्रमों की भी चर्चा की। अंत में संस्‍थान के अध्‍यक्ष श्री बलदेवराज कामराह ने नागरी लिपि को सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़कर विश्‍व स्‍तर पर लाने पर बल दिया।

रिपोर्ट- प्रो. कृष्‍ण कुमार गोस्‍वामी

Saturday, May 15, 2010

राष्ट्रीय अनुवाद मिशन और राष्ट्र को चुनौतियाँ विषयक संगोष्ठी



राष्ट्रीय अनुवाद मिशन के गठन से अनुवाद के क्षेत्र का विस्तार किसा प्रकार किया जाए जिससे अंतरराष्ट्रीय साहित्य भारतीय जन-जन तक पहुँच सके, इस बात को ध्यान में रखते हुए नई दिल्ली सांध्यकालीन हिन्दी संस्थान द्वारा भारतीय विद्या भवन, कस्तूरबा गांधी मार्ग, नई दिल्ली में डॉ. नगेन्द्र स्मृति साहित्यिक संगोष्ठी तथा संस्थान द्वार संचालित अनुवाद पाठ्यक्रम में उत्तीर्ण विद्यार्थियों के लिए प्रमाणपत्र वितरण समारोह का आयोजन किया गया।

प्रारंभ में सुविख्यात भाषाविज्ञानी, संस्थान के निदेशक और हिन्दी भाषा के प्रकांड विद्वान प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी ने बीज भाषण दिया। प्रो. गोस्वामी ने अपने वक्तव्य में बताया कि राष्ट्रीय अनुवाद मिशन की स्थापना प्रधानमंत्री की प्ररेणा से और राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के प्रयास से सन् 2006 में हुई थी। इस मिशन का प्रमुख उद्देश्य भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भारतीय भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान आधारित साहित्य को अनुवाद द्वारा जन-जन तक पहुँचाना है। उच्च स्तरीय कोश, थिसारिस आदि अनुवाद उपकरणों और कंप्यूटर साफ़्टवेयरों का उत्पादन करना है। अनुवाद की गुणवत्ता की वृद्धि के लिए लघु अवधीय नवीकरण पाठ्यक्रम तथा शोध परियोजनाओं से अनुवाद संबंधी शिक्षा प्रदान करनी है। इसी संदर्भ में प्रो. गोस्वामी ने ये प्रश्न उठाए कि क्या उच्च शिक्षा के सत्तर मुख्य कार्यक्षेत्रों के साहित्य का उच्च स्तरीय अनुवाद समय पर हो पाएगा। यदि है तो क्या-क्या मानदंड अपनाए गए हैं? भारतीय और विश्व की क्लासिकल कृत्तियों के अनुवाद का चयन किन आधारों पर किया जाएगा? इसमें पुनरावृत्ति की आशंका तो नहीं होगी। अनुवाद मिशन द्वारा निर्धारित 73 करोड़ 90 लाख रुपए का बजट समय पर खर्च हो पाएगा और हुआ भी तो, कितना कार्य होगा और वह कितना लाभकारी, उपयोगी तथा शीघ्र हो पाएगा? क्या इसके लिए कोई रोडमैप बनाया गया है? अनुसृजन की दृष्टि से क्या यह अनुवाद मूल पाठ लग पाएगा। मशीनी अनुवाद कब तक विकसित हो पाएँगे और उनके कार्य में कितनी गुणवत्ता होगी। प्रो. गोस्वामी ने इस प्रकार के प्रश्न उठा कर अनुवाद मिशन की कार्य प्रणाली पर अपने विचार व्यक्त किए।

प्रगत संगणन विकास केन्द्र (सी-डैक) नोएडा के निदेशक और कंप्यूटर वैज्ञानिक श्री वी.एन. शुक्ल ने बताया कि अंग्रेज़ी-हिन्दी मशीनी अनुवाद का विकास पूरा हो चुका है और अंग्रेज़ी-पंजाबी, अंग्रेज़ी-बंगाली, अंग्रेज़ी-उर्दू, अंग्रेज़ी-मलयालम मशीनी अनुवाद का विकास अब चल रहा है। इसके साथ भारतीय भाषाओं के परस्पर अनुवाद और मुख्यतः हिन्दी से भारतीय भाषाओं के मशीनी अनुवाद विकसित किए जा रहे हैं। इनमें अधिकतर पर्यटन, स्वास्थ्य, प्रशासन संबंधी अनुवाद हो रहे है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय राष्ट्रीय अनुवाद मिशन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए मशीन आधारित अनुवाद के विकास के लिए प्रयासरत है। इस अनुवाद के मानव अनुवाद की अपेक्षा अत्यंत शीघ्र होने की संभावना है।

साहित्य अकादमी के उपसचिव और ‘समकालीन साहित्य’ पत्रिका के संपादक श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं के अतिरिक्त कई ऐसी गैर-अनुसूचित भाषाएँ और बोलियाँ हैं, जिनका साहित्य काफ़ी स्तरीय है। इस पर प्रश्न उठाया जा सकता है कि इन भाषाओं में रचित साहित्य और लोक साहित्य की उपेक्षा क्यों की जा रही है।

संगोष्ठी की अध्यक्ष सुश्री सुरेंद्र सैनी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में अनुवाद की उपयोगिता और सार्थकता पर अपने विचार प्रकट करते हुए यह आशा व्यक्त प्रकट की कि अनुवाद मिशन से अनुवाद के क्षेत्र में काफ़ी वृद्धि होगी। इसके बाद संस्थान द्वारा संचालित स्नातकोत्तर अनुवाद पाठ्यक्रम के छात्रों को अध्यक्ष महोदया द्वारा प्रमाणपत्र और पुरस्कार वितरित किए गए। संस्थान के सचिव डॉ. जय नारायण कौशिक ने संस्थान का परिचय देते हुए सभी अतिथियों का स्वागत किया। अनुवाद पाठ्यक्रम के संयोजक डॉ. पूरनचंद टंड़न ने संगोष्ठी और वितरण समारोह का संचालन करते हुए सभी अतिथियों का धन्यवाद किया। डॉ. धर्मपाल आर्य (पूर्व कुलपति, गुरूकुल कांगड़ी, हरिद्वार) श्री ओम प्रकाश अरोड़ा (वरिष्ठ पत्रकार), प्रो. ठाकुर दास (वरिष्ठ भाषाविद्), डॉ. हरीश कुमार सेठी (इग्नु), डॉ. शिव कुमार शर्मा (दिल्ली वि.वि.) आदि विद्वानों की उपस्थिति उल्लेखनीय थी।


डॉ. रमा द्विवेदी