Showing posts with label Mahesh Darpan. Show all posts
Showing posts with label Mahesh Darpan. Show all posts

Tuesday, April 26, 2011

नागार्जुन जन्मशती विशेषांक के बहाने हुआ नागार्जुन-संवाद


मिथिलेश श्रीवास्तव, विष्णुचंद्र शर्मा, डॉ आनंद प्रकाश एवं राम कुमार कृषक (मंच पर बैठे हुए क्रमश: बाएं से दायें)

कविता और विचार के मंच लिखावट, साहित्यिक पत्रिका अलाव और स’आदतपुर साहित्य समाज के संयुक्त तत्वावधान में “नागार्जुन-संवाद” नामक चार सत्रीय कार्यक्रम दिनांक 24 - 4 -11 को संपन्न हुआ। कार्यक्रम के पहले दूसरे और तीसरे सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु चंद्र शर्मा ने तथा संचालन राम कुमार कृषक ने किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. आनंद प्रकाश थे। कार्यक्रम के पहले सत्र में कृष्ण कल्पित, डॉ. बली सिंह, मणिकांत ठाकुर, महेश दर्पण, उमेश चतुर्वेदी, डॉ. आनंद प्रकाश, मिथिलेश श्रीवास्तव और विष्णु चन्द्र शर्मा जी नें बाबा नागार्जुन की रचनाओं पर अपने अपने वक्तव्य दिए साथ ही साथ कई रोचक संस्मरण भी सुनाये। महेश दर्पण नें कहा कि हमारे देश में विकास की दर इतनी धीमी है कि बाबा की प्रासंगिकता बहुत अधिक समय तक बनी रहेगी साथ साथ उन्होंनें यह भी कहा कि बाबा अपने समय के निर्देशक थे। मिथिलेश श्रीवास्तव कुछ लोगों द्वारा नागार्जुन के साहित्य का लगातार अवमूल्यन करने से काफी आहात दिखे, उन्होंनें कहा कि नागार्जुन और शमशेर पर लगातार बात चीत होनी चाहिए क्यूंकि कुछ लोग उन्हें दूसरे सन्दर्भों में चुराने की कोशिश कर रहे हैं। उमेश चतुर्वेदी नें बाबा से जुड़ी कुछ बातों की चर्चा तथा पत्रकारिता में बाबा के योगदान पर चर्चा की। मुख्य अतिथि डॉ. आनंद प्रकाश नें नागार्जुन की कविता “हरिजन गाथा” के शीर्षक के पीछे की कहानी बताई और कहा कि नागार्जुन की कविता जनता की तरफ से संवाद करती है इसलिए इस गोष्ठी का नाम “नागार्जुन-संवाद” भी सार्थक है। इस सत्र का समापन अध्यक्ष विष्णुचंद्र शर्मा के वक्तव्य के साथ हुआ। उन्होंनंन कहा कि जहाँ भी क्रांति कि सम्भावना है वहाँ नागार्जुन हैं, आज नागार्जुन होते तो उस व्यक्ति के लिए कविता लिखते जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध हम सबके लिए भूखा बैठा था।


अपनी कहानी का पाठ करते हुए हीरालाल नागर

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में नागार्जुन की एक कविता का पाठ राम कुमार कृषक जी ने किया तथा उसके बाद नागार्जुन की एक कविता मन्त्र का संगीतबद्ध प्रसारण किया गया जिसे दस मिनट तक सभी श्रोतागण ध्यान लगाकर सुनते रहे। कार्यक्रम के तीसरे सत्र में हीरालाल नागर नें एकल कहानी पाठ किया। खिड़की नाम की उनकी कहानी नें श्रोताओं को बांधे रखा। इसके बाद इस कहानी पर महेश दर्पण जी ने अपनी विशेष टिपण्णी दी और कहानी को सराहा।


काव्यपाठ करते हुए सुरेन्द्र श्लेष
कार्यक्रम के चौथे और अंतिम सत्र में विभिन्न कवियों नें कविता पाठ किया। इस गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. आनंद प्रकाश नें तथा संचालन मुकेश मानस नें किया। गोष्ठी में सुरेन्द्र श्लेष, अभिषेक, प्रताप अनम, रमेश प्रजापति, रजनी अनुरागी, बागी चाचा, राधेश्याम बंधु, राधेश्याम तिवारी, स्वप्निल तिवारी “आतिश”, अशोक तिवारी, प्रदीप गुप्ता, मणिकांत ठाकुर, मुकेश मानस, मिथिलेश श्रीवास्तव एवं राम कुमार कृषक नें अपनी अपनी कविताओं का पाठ किया। उसके बाद डॉ. आनंद प्रकाश नें अपना वक्तव्य दिया और कविता की संभावनाओं को देखकर हर्षित हुए। डॉ. बली सिंह नें अपनी अपनी कविता के साथ धन्यवादयापन करते हुए कार्यक्रम का समापन किया।

Friday, December 31, 2010

महेश दर्पण ‘पुश्किन के देस में’



‘रूस के बारे में अभी तक जो संस्मरण या यात्रा वृत्तान्त हिंदी में प्रकाशित हुए थे, वे सभी उन लेखकों ने लिखे थे जो आज से बीस-पच्चीस साल पहले यानी सोवियत काल में रूस गए थे. सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूस काफी बदल गया है. रूस का जीवन भी अब पहले जैसा नहीं रहा. महेश दर्पण ने हाल ही में रूस की यात्रा करने के बाद इसी बदले हुए ज़माने का बेहद आत्मीय, सच्चा और सहज चित्र प्रस्तुत किया है’ यह परिचय है ‘सामयिक प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित महेश दर्पण की सद्यप्रकाशित यात्रा वृत्तान्त पुस्तक ‘पुश्किन के देस में’ का जो रूसी साहित्यकार ल्युद्मीला ख्खलोवा द्वारा इसी पुस्तक के फ्लैप पर दिया हुआ है.
महेश दर्पण हिंदी साहित्य जगत व पत्रकारिता के एक जाने माने हस्ताक्षर हैं जिन्होंने ‘अपने हाथ’ ‘चेहरे’ ‘मिट्टी की औलाद’ ‘वर्त्तमान में भविष्य’ ‘जाल’ ‘इक्कीस कहानियां’ ‘एक चिड़िया की उड़ान’ आदि जैसे सशक्त कहानी संग्रह हिंदी साहित्य को दिये हैं तथा अनेक सम्मानों यथा ‘पुश्किन सम्मान’, ‘साहित्यकार सम्मान’, हिंदी अकादमी का ‘कृति सम्मान’ व ‘पीपुल्स विक्ट्री अवार्ड’ आदि से सम्मानित हुए हैं.
दि. 15 दिसंबर 2010 को उर्मिल सत्यभूषण द्वारा संचालित ‘परिचय साहित्य परिषद’ के तत्वावधान में नई दिल्ली के फेरोज़शाह रोड स्थित ‘राशियन कल्चरल सेंटर’ में महेश दर्पण की पुस्तक ‘पुश्किन के देस में’ पर एक बेहद सारगर्भित व विचारोत्तेजक गोष्ठी हुई जिस की अध्यक्षता राजेंद्र यादव ने की तथा प्रसिद्ध कवि विष्णु चन्द्र शर्मा, चित्रा मुद्गल व रमेश उपाध्याय इस संगोष्ठी के विशिष्ट वक्ता रहे.
प्रारंभ में ‘राशियन कल्चलर सेंटर’ की येलेना शटापकिना ने पुष्प भेंट किये तथा ‘परिचय साहित्य परिषद’ की ओर से प्रसिद्ध कवि लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने मंच पर उपस्थित विशिष्ट गण को पुस्तकों के रूप में शब्द-पुष्प भेंट किये.
गोष्ठी में विषय प्रवर्तन स्वयं ‘परिचय साहित्य परिषद’ की अध्यक्षा उर्मिल सत्यभूषण ने किया और कहा कि इस पुस्तक में रूसी समाज का ऐसा जीवंत चित्रण है कि एक एक दृश्य आँखों के सामने घूमता सा नज़र आता है. ‘परिचय साहित्य परिषद’ की हर संगोष्ठी में ‘राशियन सेंटर’ की ओर से किसी न किसी प्रसिद्ध रूसी साहित्यकार का जीवन वृत्त स्क्रीन पर प्रस्तुत किया जाता है. उर्मिल सत्यभूषण ने कहा कि आज ‘पुश्किन के देस में’ पुस्तक की चर्चा उसी शृंखला की एक कड़ी जैसी है.
येलेना ने अंग्रेज़ी में भाषण करते हुए एक भारतीय द्वारा रूसी समाज पर लिखी गई एक और पुस्तक पर प्रसन्नता प्रकट की तथा यह भी कहा कि पुस्तक पठनीय है व उसमें रूसी पाठकों के लिये भी कई नई जानकारियाँ हैं.
महेश दर्पण ने संक्षिप्त भाषण अपनी पुस्तक का परिचय देते हुए कहा कि पुश्किन का देस केवल रूस ही नहीं है, वरन पुश्किन का देस भारत भी हो सकता है. उन्होंने रूसी साहित्यकारों की उन कई प्रदर्शनियों का ज़िक्र किया जो रूस में उन्हें देखने को मिली.
वरिष्ठ कवि कथाकार विष्णु चंद्र शर्मा ने महेश दर्पण की कहानियों में पारिवारिक संवेदना के संरक्षण की बात की. उन्होंने कहा कि परिस्थितियों के साथ रूस की तस्वीर बदली और महेश ने अपनी पुस्तक में बदलाव से पहले और बाद के रूस की अच्छी तुलना की है. उन्होंने भी महेश द्वारा वर्णित प्रदर्शनियों व रूसी समाज की झलकियों में चल्चित्रात्मकता का गुण होने की बात कही.
चित्रा मुद्गल ने कहा कि महेश दर्पण की यह पुस्तक एक उपन्यास सी लगती है और उन्होंने टूटते हुए रूसी समाज के जीवन में बहुत गहरे पैठ कर यह पुस्तक लिखी है. रूस के शहरों व गांवों का उन्हें बेहद प्रामाणिक विवरण इस पुस्तक में मिला तथा उन्होंने पुस्तक की पठनीयता की भी प्रशंसा की.



सभागार में एक सशक्त पुस्तक पर इतनी गंभीर चर्चा सुनते हुए हिंदी के कई जाने माने हस्ताक्षर यथा केवल गोस्वामी, हरिपाल त्यागी, सुरेश उनियाल, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, वीरेंद्र सक्सेना प्रेम जनमेजय आदि भी उपस्थित थे. रमेश उपाध्याय ने भी अपने भाषण में इस पुस्तक के औपन्यासिक प्रारूप होने की बात कही और कहा कि इस प्रकार मानो एक नई विधा का जन्म हुआ है. उन्होंने कहा कि ‘पुश्किन के देस में’ पुस्तक केवल उन्हें नहीं वरन उनके समस्त परिवार को बहुत अच्छी लगी.
अपने अध्यक्षीय भाषण में राजेंद्र यादव एक ‘नॉस्टाल्’ज्या सा महसूस करते हुए साठ वर्ष पहले के काल में पहुँच गए जब उन्होंने आगरा में चेखव को पढ़ना शुरू किया था. उन्होंने कलकत्ता की ‘नैशनल लाइब्रेरी’ में भी चेखव को खूब खंगाला. वैसे अपने समय में ही राजेंद्र यादव ने अपने किसी आत्याकथ्य में यह कहा था कि वे स्वयं को चेखव के अधिक निकट पाते हैं. उन्होंने काफी वर्ष पहले रूस पर लिखी हुई प्रभाकर द्विवेदी की पुस्तक ‘पार उतर कहं जइहोँ’ का सन्दर्भ दे कर कहा कि उस पुस्तक की तरह ‘पुश्किन के देस में’ भी एक लंबे अरसे तक उनकी स्मृति में रहेगी.
वैसे देखा जाए तो हिंदी साहित्य के कई कालजयी हस्ताक्षर रूसी साहित्य से प्रभावित रहे, यह बात स्वयं अपने आप में सर्वविदित है. जब भारत ब्रिटिश जैसी उपनिवेशवादी शक्ति के अधीन था तब भारत के स्वाधीनता संघर्ष से जुड़े कई नेताओं यथा नेहरु, सुभाषचंद्र बोस व भगत सिंह पर रूस के समाजवाद की बहुत गहरी छाप रही. भगत सिंह की जीवनी देखी जाए तो यह भी कहा जा सकता है कि यदि उन्हें मृत्युदंड न मिलता तो भारतीय समाज को एक और लेनिन मिल जाता. साहित्य में भी प्रेमचंद और मैक्सिम गोर्की के व्यक्र्तित्वो कृतित्वों की परस्पर समानता सर्वविदित है. प्रेमचंद ने स्वयं अपनी सोच व साहित्य पर गोर्की के प्रभाव की बात कही थी. नई कहानी के दौर में भी मोहन राकेश राजेन्द्र यादव जैसे सशक्त हस्ताक्षर चेखव से पूर्णतः प्रभावित थे. रूस अब भले ही पहले जैसा रूस नहीं रह गया है और न ही भारत ही पहले सा समाजवादी रहा है, बाज़ार के दबाव में भारत के रूप में भी आमूलचूल परिवर्वन लगातार आ रहे हैं. पर इस के बावजूद भारतीय और रूसी समाज में अब भी कुछ ऐसा बचा है जो उन्हें अपने प्रारंभिक समय से जोड़ता है. ‘पुश्किन के देस में’ जैसी पुस्तकें उसी समाज के एक एक्स-रे सी लगती हैं जो बदला तो तेज़ी से है पर अपनी कोख को शायद भूल नहीं पाया है व जिसमें अभी भी उस समय के कई अच्छी बुरे अवशेष बचे हैं. ‘पुश्किन के देस में’ जैसी अन्य कई रचनाओं की आवश्यकता है जो इस विषय को गंभीर शोध की तरह लें और भारत के अमरीका से नैकट्य व रूस से धीमी धीमी बढ़ती दूरी पर अपने चिंतन की प्रचुर रौशनी डालें.

रिपोर्ट – प्रेमचंद सहजवाला

Sunday, August 15, 2010

क्षितिज शर्मा की कहानियाँ व्यवस्था में रहकर व्यवस्था के अस्वीकार की कहानियाँ हैं- राजेन्द्र यादव

एक शाम एक कथाकार-1




आप इस पूरे कार्यक्रम को सुन भी सकते हैं। नीचे के प्लेयर से सुनें-

कुल प्रसारण समय- 1 घंटा 23 मिनट 45 सेकण्ड । अपनी सुविधानुसार सुनने के लिए यहाँ से डाउनलोड करें।


नई दिल्ली।

13 अगस्त 2010 को पीपुल्स विजन, दिल्ली, हिन्द-युग्म और गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में 'एक शाम एक कथाकार' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ कथाकार क्षितिज शर्मा ने कहानीपाठ किया। अध्यक्षता हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने की। क्षितिज शर्मा के कृतित्व पर समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट और कथाकार महेश दर्पण ने अपने विचार रखे। संयोजन हिन्द-युग्म के संपादक शैलेश भारतवासी तथा युवा कवि व लेखक रामजी यादव ने किया। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ आलोचक आनंद प्रकाश ने किया।

पीपुल्स विजन निकट भविष्य में हर महीने एक ऐसी गोष्ठी के आयोजन को लेकर कटिबद्ध है जिसमें एक कथाकार अपनी कहानियों का पाठ करे और कहानी के जानकार और आम पाठक उपसर अपनी ईमानदार टिप्पणियाँ करें। कथाकार की प्रशस्ति करना ही मात्र इस गोष्ठी का उद्देश्य नहीं हो, बल्कि कहानीकार को तल्ख और वास्तविक प्रतिक्रियाएँ तत्काल मिलें। इस आयोजन में पीपुल्स विजन को हिन्द-युग्म डॉट कॉम और गांधी शांति प्रतिष्ठान का सहयोग प्राप्त है।

इसी शृंखला की पहली कड़ी के तौर पर वरिष्ठ कथाकार क्षितिज शर्मा ने अपनी कहानी 'अनुत्तरित' का पाठ किया। क्षितिज ने इस कहानी का बहुत ही धीमा और नीरस पाठ किया। यह बात वहाँ उपस्थित श्रोताओं और विशेषज्ञों ने भी रेखांकित की। लेकिन गोष्ठी की सफलता इस बात में भी थी कि कोई भी श्रोता कथापाठ के दौरान टस से मस नहीं हुआ। संचालक आनंद प्रकाश ने क्षितिज शर्मा के कथापाठ से पहले ही वहाँ मौज़ूद सभी रचनाकारों से यह सवाल पूछा कि आज के रचनाक्षेत्र में सभी अच्छी बातें, ग्राह्य बातें या पक्ष की बातें किसी सेट फॉर्मुले के तौर पर आती हैं, समकालीन रचनाओं में शत्रु पक्ष की विशेषताओं और क्रूरताओं की ओर स्पष्ट संकेत नहीं मिलता। तो क्या शत्रु पक्ष के आवश्यक मूल्यांकन के बिना इन रचनाओं की सार्थकता एक निश्चित बिंदु के आगे सम्भव है? क्षितिज शर्मा ने इस सवाल का उत्तर देते हुए कहा कि वो अपनी रचनाओं में दोनों पक्षों का एक बराबर उल्लेख इसलिए भी नहीं करते कि कहीं पाठक दोनों में उलझ ने जाये, उसे दो रास्ते न मिल जायें और वह उनमें कहीं भटक न जाये। इसलिए वे शत्रु पक्ष का वर्णन इशारों में करते हैं।

महेश दर्पण ने अपने वक्तव्य में कहा कि मैं यह तो नहीं कहूँगा कि 'अनुत्तरित' क्षितिज शर्मा की प्रतिनिधि कहानी है, लेकिन इनकी लगभग सभी कहानियों में अपने समय के बड़े प्रश्न मौज़ूद हैं। इस समाज में, इस व्यवस्था में या इस समाज में जीने को विवश व्यक्ति के पास इन सवालों के जवाब मौज़ूद हैं या नहीं यह एक अलग बात है। महेश ने श्रोताओं को बताया कि आलोचकों और पाठकों का क्षितिज शर्मा की ओर ध्यान तब गया जब इनके उपन्यास 'उकाव' को एक ऐसे प्रकाशन ने पुरस्कृत किया, जिसने उसे छापा नहीं था। महेश ने कहा कि यदि किसी को क्षितिज के कहानियो के केन्द्र-बिन्दु की तलाश करनी हो तो पहले उसे पर्वतीय स्त्रियों के संघर्षों को बहुत करीब से देखना होगा।



महेश दर्पण ने क्षितिज शर्मा को शैलेश मटियानी और शेखर जोशी की परम्परा का कथाकार कहा और कहा कि इन कथाकारों को मालूम है कि पहाड़ी स्त्रियों के दुःख-दर्द क्या हैं, कैसे वो अपने पीठ पर वो पहाड़ लादे हैं, जिन्हें पहाडी जीवन कहते हैं। क्षितिज शर्मा अपनी कहानियों में बहुत कम बोलते हैं, वे अपने आपको बहुत पीछे रखते हैं। यदि आप शैलेश मटियानी की केवल 'अर्धांगिनी' को याद रखें, तो क्षितिज की कहानियों के स्त्री-पात्रों की तुलना आप कर सकते हैं। क्षितिज शर्मा बहुत धीमी गति से चलने वाले कथाकार हैं। अपनी कहानियों को पढ़ते वक्त वे उन्हें दुश्मन की कहानी जैसा भी स्नेह नहीं देते। बिलकुल भी इन्वाल्व नहीं होते। अपनी कहानियों का इतना नीरस पाठ क्षितिज शर्मा ही कर सकते हैं।

महेश ने आगे कहा- "क्षितिज शर्मा की कहानियों को अमरकांत की कहानियों की तरह एकबार पढ़कर नहीं समझा जा सकता। मैं समझता हूँ कि क्षितिज 'ताला बंद है' से आगे बढ़े हैं। इधर की कुछ कहानियों में क्षितिज ने नये कथ्यों की खोज की है, जिसमें आज के समाज और व्यक्ति की चिंताएँ हैं और उनके समाधान का संकेत है।"

पंकज बिष्ट ने कहा कि मुझे क्षितिज शर्मा की पहली कहानी 'रोटी' को प्रकाशित करने का सौभाग्य प्राप्त है। क्षितिज शर्मा पहाड़ी जीवन और उसकी संवेदना जिस इंटीमेसी, जिस समझ के साथ देखते हैं, मेरा ख्याल है कि आज के समय के और किसी दूसरे पहाड़ी कहानीकार में वह नही मिलती। इसमें कोई शक नहीं है कि जब क्षितिज पहाड़ पर लिखते हैं तो वे शैलेश मटियानी के करीब होते हैं। लेकिन शैलेश मटियानी और क्षितिज शर्मा में यह फर्क है कि शैलेश मानवीय-संवेदना की कहानियाँ लिखते हैं, लेकिन क्षितिज शर्मा पहाड़ी जीवन के टूटते-बिखरते जाने की व्यथा लिखते हैं, पहाड़ी जीवन में पैदा होने वाली विकृतियों और उसके दुष्परिणाम की कहानियाँ लिखते हैं। क्षितिज शर्मा की कहानी में शैलेश मटियानी की शैली का प्रभाव देखना हो तो क्षितिज शर्मा की 'जागर' कहानी पढ़ी जा सकती है।

पंकज बिष्ट ने क्षितिज शर्मा की कहानी 'ताला बंद है' को हिन्दी की उल्लेखनीय कहानी कहा। पंकज ने आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि क्षितिज शर्मा ने केवल पहाड़ी जीवन की कहानियाँ लिखी हैं, इनकी यहाँ की भी कहानियाँ भी उल्लेखनीय हैं। क्षितिज शर्मा की कहानियाँ निम्न मध्यवर्ग का बहुत गहराई से वर्णन करती हैं।

वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र यादव ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मुझे हमेशा इस जगह से शिकायत है क्योंकि यहाँ कभी बात सुनाई देती हैं और कभी सुनाई ही नहीं देतीं। मैं क्षितिज शर्मा की कहानी सुन नहीं पाया, इसलिए मैं भी उस कहानी पर कुछ कहने का अधिकारी नहीं हूँ। क्षितिज शर्मा एक लो-लाइन व्यक्ति हैं। न वे अधिकारी हैं, न कोई संपादक और न कोई हाई प्रोफाइल व्यक्ति। मतलब कि हम उनकी कहानियों को बिना किसी दबाव के पढ़ सकते हैं। मैंने क्षितिज की 4-5 कहानियों को पढ़ा हैं, लेकिन 'उकाव' उपन्यास को पढ़ने से पहले मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि क्षितिज पहाड़ी जीवन के संघर्षों को इतने निकट से जानते हैं। आजादी के बाद की हिन्दी कहानियाँ वैक्यिक्तिक थीं। उनके केन्द्र में व्यक्ति था। वह समाज को स्वीकारता था। वह स्त्री-पुरुष के संबंधों की कहानियाँ थीं। आज की कहानियों के केन्द्र में भी व्यक्ति है, लेकिन वह व्यक्ति के आस-पास, उसकी समस्त यात्रा की कहानियाँ हैं, जिनमें समाज में रहते हुए भी समाज का अस्वीकार है। मैं समझता हूँ कि क्षितिज की कहानियाँ भी इसी अस्वीकार की कहानियाँ हैं, जिनमें व्यवस्था की बात करते हुए व्यवस्था का अस्वीकार है।



राजेन्द्र यादव ने आगे कहा कि क्षितिज शर्मा एक ठंडे कहानीकार हैं, जिनके पात्रों को पढ़कर, जानकर हम किसी तरह की उत्तेजना, उद्विग्नता, उदग्रता का अनुभव नहीं करते। वे सामान्य तरह की कहानियाँ है। मुझे लगता है कि इस तरह की सामान्यता को भी समझने के लिए हमें व्यक्ति में जाना होता है, भीड़ को समझने के लिए भी कुछ व्यक्तियों की ही तस्वीरें बनानी पड़ती हैं। इस व्यक्ति को सामाजिक संदर्भों में समझे बिना कहानी अपने आप को नहीं पढ़वा सकती। कई बार ये कहानियाँ लगभग समाजशास्त्रीय अध्ययन लगती हैं। और मुझे इस तरह की कहानियों से थोड़ी सी शिकायत है। मैं समझता हूँ कि क्षितिज शर्मा की कहानियाँ इस बात के लिए आश्वस्त करती हैं कि कहानी एक समाजशास्त्रीय अध्ययन नहीं है, किसी व्यक्ति का निजी और एकांतिक अनुभव नहीं हैं।

अंत में रामजी यादव ने आभार व्यक्त किया।

प्रस्तुति- www.hindyugm.com

Friday, August 13, 2010

निमंत्रणः एक शाम एक कथाकारः क्षितिज शर्मा का कहानीपाठः 13 अगस्त 2010, शाम 5‍ः30 बजे, गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली

पीपुल्स विजन, दिल्ली, हिन्द-युग्म, दिल्ली और गांधी शांति प्रतिष्ठान

द्वारा आयोजित

'एक शाम एक कथाकार' कार्यक्रम में

क्षितिज शर्मा के कहानी-पाठ

एवं परिचर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।

कार्यक्रम विवरण

कहानी पाठ- क्षितिज शर्मा

परिचर्चा- पंकज बिष्ट, महेश दर्पण

अध्यक्षता- राजेन्द्र यादव

स्थान- गांधी शांति प्रतिष्ठान

दीनदयाल उपाध्याय मार्ग

नई दिल्ली- 110001

समय- शाम 5:30 बजे

दिनांक- शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

आपकी उपस्थिति हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है।

संयोजक-

सुरेन्द्र कुमार, 9312974018

रामजी यादव, 9015634902

शैलेश भारतवासी, 9873734046

निवेदक-

आनंद प्रकाश

अध्यक्ष, पीपुल्स विजन, दिल्ली

Saturday, July 24, 2010

उर्मिल सत्यभूषण के कहानी संग्रह ‘सृजन समग्र – खंड 1 पर समीक्षा गोष्ठी

(सृजन समग्र – उर्मिल सत्यभूषण कथा संसार – नमन प्रकाशन)

दि. 23 जुलाई 2010 को नई दिल्ली के फेरोज़शाह रोड स्थित ‘रशियन कल्चर सेण्टर’ में ‘परिचय साहित्य परिषद’ की स्थाई अध्यक्ष व सुपरिचित साहित्यकार उर्मिल सत्यभूषण के सद्य:प्रकाशित कहानी संग्रह ‘सृजन समग्र – खंड 1’ पर एक समीक्षा गोष्ठी का आयोजन किया गया. गोष्ठी के मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध साहित्यकार बालस्वरूप राही थे व श्री राजेंद्र गौतम, श्री महेश दर्पण, श्री लक्ष्मी शंकर बाजपेई व श्री प्रेमचंद सहजवाला गोष्ठी के विशिष्ट वक्ता रहे. श्री सहजवाला ने उर्मिल सत्यभूषण के कहानी संग्रह पर एक समीक्षा पत्र पढ़ते हुए कहा कि उर्मिल सत्यभूषण के पास बेहद विस्तृत अनुभव संसार है तथा उन के इस संग्रह की 27 में से अधिकाँश कहानियों में नारी जीवन की बेहद यथार्थ झलकियाँ हैं. उर्मिल सत्यभूषण के पास एक सिद्धहस्त कलम है जिस के माध्यम से वे नारी के सामाजिक जीवन की सशक्त तस्वीर प्रस्तुत करती हैं. नारी किन किन परिवेशगत दबावों में जीती है तथा किन किन मोर्चों पर वह इस पुरुष प्रधान समाज में हारती है, इस का बेहद सशक्त लेखा-जोखा उर्मिल जी के कथा संसार में मिलता है. कुछ कहानियों की विशेष प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इन कहानियों की विशिष्टता यह है कि इन में अन्याय अनाचार के विरुद्ध नारी की विद्रोही तेवरों से साक्षात्कार होते हैं, जैसे कहानी ‘अब और नहीं’, ‘आखिर कब तक’ वगैरह. श्री राजेंद्र गौतम ने कहा कि उर्मिल सत्यभूषण की कहानियों में नारी-पुरुष प्रेम को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया गया है. पर कहानी ‘रौशनी की जीत’ जो कि सन् 84 की निर्मम सिख हत्याओं पर आधारित है, की उन्होंने विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि जैसे ‘द्वितीय विश्व युद्ध’ मानव सभ्यता की एक अविस्मरणीय त्रासदी है जिस पर निरंतर आज भी बहुत से उपन्यास लिखे जा रहे हैं, वैसे ही हमारे देश में सन् 84 का कलंक कभी नहीं मिटेगा और उस पर लगातार साहित्य लिखा जाता रहेगा. श्री लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने कहा कि ‘शाबास कुडिये’ जैसी व इस संग्रह की अन्य कई कहानियों जैसी नारी पात्र हमारे पूरे समाज में लगभग घर घर में हैं, जो अपनी स्वतंत्रता के लिए छटपटाती न जाने किन किन पारिवारिक सामजिक दबावों में जीती हैं. इस सब को रेखांकित करने में पूर्ण सफलता पर उन्होंने उर्मिल सत्यभूषण को हार्दिक बधाई दी. श्री महेश दर्पण ने कहा कि लेखिका के सरोकार बेहद ‘जेनुइन’ रहे और इस संग्रह को पढ़ कर किसी शिल्पगत गठन या अन्य तत्वों की ओर ध्यान न जा कर सीधे उन नारी पात्रों के जीवन पर जाता है, जिन्हें लेखिका ने अपने करीब पाया है. श्रोतागण में से लेखिकाओं तूलिका व शोभना समर्थ आदि ने भी संग्रह की कुछ कहानियों की विशेष प्रशंसा की. अंत में मुख्य अतिथि बाल स्वरुप राही ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि जो लेखन अपने अनुभव को पाठक की अनुभूति में बदल सकता है, वही लेखन सही लेखन है और उर्मिल सत्यभूषण इस कसौटी पर पूर्णतः खरी उतरी हैं. उन्होंने संग्रह में नारी के विस्तृत रूपों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि भारत में पहली नारी शतरूपा थी और उर्मिल के कथा संसार में भी नारी के अनेकों रूपों से साक्षात्कार होता है. गोष्ठी का संचालन भी प्रेमचंद सहजवाला ने किया.

रिपोर्ट – ‘परिचय साहित्य परिषद’ रिपोर्ट विभाग

Wednesday, June 23, 2010

चलता चला जाऊँगा का लोकार्पण



नई दिल्ली

श्री विष्णु प्रभाकर जी के 99वें जन्म दिन के अवसर पर दिल्ली स्थिति हिंदी भवन में श्री विष्णु प्रभाकर जी द्वारा रचित कविता संग्रह चलता चला जाऊँगा का लोकार्पण हिंदी मनीषियों के सान्निध्य में सर्वश्री अजित कुमार, डॉ. बलदेव बंशी, डॉ. कृष्ण दत्त पालीवाल,डॉ. हरदयाल,महेश दर्पण,हास्य कवि सुरेश शर्मा, शमशेर अहमद खान,लक्ष्मी शंकर वाजपेयी,डॉ. सुरेश शर्मा के कर कमलों द्वारा सम्पन्न किया गया. इन कविताओं के संकलन का दायित्व का निर्वहन श्री विष्णु जी के सुपुत्र अतुल कुमार जी ने किया है और इसका प्रकाशन प्रभात प्रकाशन ने किया है.इस संकलन की भूमिका में हिंदी कविताओं के महान समालोचक श्री अजित कुमार ने लिखा हैश्री विष्णु प्रभाकर से परिचित साहित्य प्रेमी सहसा विश्वास न कर सकेंगे कि कथा-उपन्यास, यात्रा-स्मरण, जीवनी, आत्मकथा, रूपक, फीचर, नाटक, एकांकी, समीक्षा, पत्राचार आदि गद्य विधाओं के लिए ख्यात विष्णु जी ने कभी कविताएं भी लिखी होंगी. लेकिन यह एक सच है.पुस्तक के रैपर पर अतुल जी लिखते हैं कि प्रस्तुत काव्य संकलन में सन 1968 से 1990 की अवधि में उनकी आंतरिक संवेदनाओं को कविता के रूप में संप्रेषित करती उन अभिव्यक्तियों को संकलित करने का प्रयास किया है,जो वे वर्ष में एक या दो बार समाज व मानव की स्थितियों-परिस्थितियों पर कविता के रूप में दीपावली व नववर्ष के संदेश के रूप में अपने चाहने वालों को भेजते रहते थे….मेरे विचार में उनकी कविताओं में प्रेम की अभिव्यक्ति तो है ही, लेकिन उनकी आंतरिक पीडा,आंतरिक इच्छा कि, मनुष्य के अंदर का मनुष्य सच्चे रूप में मानव बन सके और अपने इस जीवन को सार्थक कर सके, की अभिव्यक्ति सबसे ज्यादा मुखर है---पाल ले भले ही दंभ वह, जीतने का प्र्थ्वी को, आकाश को दिग/ दिगंत को,पर/ वह मनुष्य है, मनुष्य ही रहेगा. यही उसकी जीत है, यही उसकी हार है और इसी हार की जीत का नाम है मनुष्य.
कविताओं के बारे में टिप्पणी करते हुए वक्त्तओं ने उन्हें एंटी रोमांटिक मूड में लिखी गई मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन मूल्यों व सामाजिक सरोकारों को दर्शाती संवेदनशील रचनाएं बताईं. एक वक्ता ने 1979 में लिखी गई उनकी व्यास और मैं --युगों पहले
व्यास ने कहा था—
मनुष्य से बडा कोई नहीं है.
आज
मैं कहता हूं
मनुष्य से छोटा कोई नहीं है.
क्योंकि
मैं मनुष्य हूं
व्यास ऋषि थे.
इस कार्यक्रम का सफल संचालन युवा कवि हर्षवर्धन द्वारा किया गया.



मुनीश परवेज राणा