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Saturday, October 16, 2010

नये प्रकाशकों के सामने अच्छी सामग्री की अनुपलब्धता का संकट है- शैलेश भारतवासी

29 सितम्बर । नई दिल्ली
आज शाम गांधी शांति प्रतिष्ठान में पीपुल्स विजन, दिल्ली औरहिंद-युग्म डॉट कॉम के सौजन्य से लेखक-प्रकाशक संबंध और प्रकाशन में आने वाली समस्याएं विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें प्रतिनिधि लेखक और प्रकाशक उपस्थित हुए। गौरतलब है कि इस दिन ‘एक शाम एक कथाकार’ के अंतर्गत वरिष्ठ कथाकार ‘अब्दुल बिस्मिल्लाह’ का कहानीपाठ और उस पर नीलाभ और जयप्रकाश कर्दम की परिचर्चा निश्चित थे। लेकिन अब्दुल बिस्मिल्लाह के अचानक अत्यधिक बीमार हो जाने के कारण कार्यक्रम की रूपरेखा को बदलना पड़ा।
हिंदयुग्म डॉट कॉम के नियंत्रक और निदेशक शैलेश भारतवासी ने इस संबंध में अपने अनुभव बांटते हुए बताया कि इस वर्ष उन्होंने कोई 12 पुस्तकें प्रकाशित की हैं। इन पुस्तकों के प्रकाशन में उन्हें कोई अतिरिक्त दबाव महसूस नहीं हुआ बल्कि इस तकनीकी युग में कागज से लेकर हर चीज की आउट सोर्सिंग करते हुए बड़ी आसानी से उन्होंने पुस्तकें प्रकाशित कर दीं। उन्होंने स्वीकार किया कि देश में अनेक नवोदित लेखक हैं जो अपनी पांडुलिपि को प्रकाशित कराने हेतु धन का जुगाड़ खुद करते हैं और उन्हीं के सहयोग से वे पुस्तकों का प्रकाशन करते हैं। शैलेश भारतवासी ने माना कि नये प्रकाशकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे गंभीर और जनोपयोगी सामग्रियाँ कहाँ से लायें।

लोकमित्र प्रकाशन के आलोक शर्मा का कहना था कि प्रकाशन कोई सरल कार्य नहीं है बल्कि इसमें प्रकाशक अपनी पूंजी लगाता है इसलिए वह येन-केन प्रकारेण वह वापस लेना चाहता है।

नीलाभ प्रकाशन से संबद्ध वरिष्ठ पत्रकार और कवि नीलाभ ने प्रकाशन क्षेत्र से जुड़े दुखद पक्षों की ओर संकेत करते हुए कहाकि इस पेशे में भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है कि हर कोई कमीशन देकर प्रकाशक बन गया है, जिसमें न तो पुस्तक की क्वालिटी देखी जाती है और न ही पुस्तक की उपादेयता ही सिद्ध हो पाती है। पुस्तक थोक खरीद में कमीशन के आधार पर खरीद तो ली जाती है लेकिन वे पुस्तकें कहां जाती हैं, किसी को पता नहीं। यहां प्रकाशक तो मुनाफा कमा लेता है लेकिन लेखक अपने हक से वंचित रह जाता है। उन्होंने वर्तमान इलेक्ट्रानिक्स युग विशेषकर ब्लागिंग की ओर संकेत करते हुए कहाकि जो प्रयोग यहां आजकल चल रहा है, वह यूरोप में बीते वर्षों में हो चुका है, किंतु आखिरकार वे मुद्रण पर ही आ गए हैं। वहां पुस्तकें बड़ी मात्रा में बिकती हैं।


भारतीय ब्लागिंग की दशा और दिशा पर अपने विचार ब्लागर कवि कुमार मुकुल ने रखे। वरिष्ठ लेखक एवं मिनहाज प्रकाशन से संबद्ध शमशेर अहमद खान ने अपने गुरु डॉ. दूधनाथ सिंह को प्रणाम करते हुए हुए बताया कि हिंदी लेखन यदि समय सापेक्ष है तो पाठक उसके लेखन को हाथों-हाथ लेता है। विजय आपरेशन के दौरान केवल एक महीने के भीतर लिखी गई कारगिल के शहीद पुस्तक प्रकाशक समय प्रकाशन के कई संस्करण प्रकाशित हुए और लेखक को रायल्टी भी प्राप्त हुई। अभी तक ऐसे विषयों पर अंग्रेजी लेखकों का वर्चस्व हुआ करता था। प्रकाशक जो राशि भ्रष्टाचार पर व्यय करते हैं, वे उस राशि को गांव, ब्लॉक, जिला स्तर पर जाकर संगोष्टियों का आयोजन करें जिससे नया पाठक वर्ग तैयार होगा और पुस्तकों की सार्थकता भी सिद्ध होगी। आज दिल्ली में कितने स्कूल और कालेज हैं। मोटी-मोटी फीसें ली जाती हैं लेकिन उनके पुस्तकालयों में हिंदी की पुस्तकें नाममात्र को मिलेंगी जबकि फीस की रकम हिंदी वालों की जेब से ली जाती है।

अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. दूधनाथ सिंह ने प्रकाशकों और लेखकों के अनेक किस्से सुनाए जिसमें हमेशा लेखक ही खसारे में रहा है। ब्लॉगिंग की तरफ इंगित करते हुए उन्होंने कहाकि यह केवल महानगरों में ही कुछ लोगों तक सीमित है। जिस देश में शटडाउन होता हो वहां ब्लागिंग केवल वाचालता ही कही जाएगी। अभी गांव तक केवल धार्मिक पुस्तकें ही पहुंची हैं, शायद अगली पीढ़ी तक यह हो जाए तो प्रसन्नता की ही बात होगी।
मंच का संचालन वरिष्ठ आलोचक आनंद प्रकाश ने किया। इस संगोष्ठी में पीपुल्स विजन के सचिव रामजी यादव समेत अनेक कवि, साहित्यकार एवं समीक्षक मौजूद थे।

रिपोर्ट- मुनीश परवेज राणा

Wednesday, June 23, 2010

चलता चला जाऊँगा का लोकार्पण



नई दिल्ली

श्री विष्णु प्रभाकर जी के 99वें जन्म दिन के अवसर पर दिल्ली स्थिति हिंदी भवन में श्री विष्णु प्रभाकर जी द्वारा रचित कविता संग्रह चलता चला जाऊँगा का लोकार्पण हिंदी मनीषियों के सान्निध्य में सर्वश्री अजित कुमार, डॉ. बलदेव बंशी, डॉ. कृष्ण दत्त पालीवाल,डॉ. हरदयाल,महेश दर्पण,हास्य कवि सुरेश शर्मा, शमशेर अहमद खान,लक्ष्मी शंकर वाजपेयी,डॉ. सुरेश शर्मा के कर कमलों द्वारा सम्पन्न किया गया. इन कविताओं के संकलन का दायित्व का निर्वहन श्री विष्णु जी के सुपुत्र अतुल कुमार जी ने किया है और इसका प्रकाशन प्रभात प्रकाशन ने किया है.इस संकलन की भूमिका में हिंदी कविताओं के महान समालोचक श्री अजित कुमार ने लिखा हैश्री विष्णु प्रभाकर से परिचित साहित्य प्रेमी सहसा विश्वास न कर सकेंगे कि कथा-उपन्यास, यात्रा-स्मरण, जीवनी, आत्मकथा, रूपक, फीचर, नाटक, एकांकी, समीक्षा, पत्राचार आदि गद्य विधाओं के लिए ख्यात विष्णु जी ने कभी कविताएं भी लिखी होंगी. लेकिन यह एक सच है.पुस्तक के रैपर पर अतुल जी लिखते हैं कि प्रस्तुत काव्य संकलन में सन 1968 से 1990 की अवधि में उनकी आंतरिक संवेदनाओं को कविता के रूप में संप्रेषित करती उन अभिव्यक्तियों को संकलित करने का प्रयास किया है,जो वे वर्ष में एक या दो बार समाज व मानव की स्थितियों-परिस्थितियों पर कविता के रूप में दीपावली व नववर्ष के संदेश के रूप में अपने चाहने वालों को भेजते रहते थे….मेरे विचार में उनकी कविताओं में प्रेम की अभिव्यक्ति तो है ही, लेकिन उनकी आंतरिक पीडा,आंतरिक इच्छा कि, मनुष्य के अंदर का मनुष्य सच्चे रूप में मानव बन सके और अपने इस जीवन को सार्थक कर सके, की अभिव्यक्ति सबसे ज्यादा मुखर है---पाल ले भले ही दंभ वह, जीतने का प्र्थ्वी को, आकाश को दिग/ दिगंत को,पर/ वह मनुष्य है, मनुष्य ही रहेगा. यही उसकी जीत है, यही उसकी हार है और इसी हार की जीत का नाम है मनुष्य.
कविताओं के बारे में टिप्पणी करते हुए वक्त्तओं ने उन्हें एंटी रोमांटिक मूड में लिखी गई मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन मूल्यों व सामाजिक सरोकारों को दर्शाती संवेदनशील रचनाएं बताईं. एक वक्ता ने 1979 में लिखी गई उनकी व्यास और मैं --युगों पहले
व्यास ने कहा था—
मनुष्य से बडा कोई नहीं है.
आज
मैं कहता हूं
मनुष्य से छोटा कोई नहीं है.
क्योंकि
मैं मनुष्य हूं
व्यास ऋषि थे.
इस कार्यक्रम का सफल संचालन युवा कवि हर्षवर्धन द्वारा किया गया.



मुनीश परवेज राणा

Saturday, May 22, 2010

अमीर खुसरो कालजयी रचनाकार हैं



विगत दिनों वरिष्ठ साहित्यकार शमशेर अहमद खान द्वारा लिखित भारत भारती के सच्चे सपूत-अमीर खुसरो शीर्षक पुस्तक का लोकार्पण राज्य सभा के माननीय उप सभापति श्री के. रहमान खान के कर- कमलों द्वारा उनके आवास पर संपन्न हुआ.इस अवसर पर देश के प्रतिष्ठित बुद्धजीवी, विधायक, प्रशासक,साहित्यकार,कवि आदि उपस्थित थे.माननीय उपसभापति जी ने लोकार्पण के उपरांत अमीर खुसरो के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए बताया कि इस बात में कोई संदेह नहीं कि खुसरो साहब हिंदी और उर्दू जबानों के न सिर्फ आदि कवि रहे हैं बल्कि साहित्य और संगीत के कई एक विधाओं के जन्मदाता भी रहे हैं. कई एक वाद्ययंत्रों और छंदों का उन्होंने अविष्कार भी किया. भारतीयता उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी. आज एक अजीब सी स्थिति यह हो गई है कि आज की युवा पीढ़ी खुसरो साहब को नहीं जानती,हमारा फर्ज बनता है कि हम उनके योगदान को न भूलें और युवाओं को उनके बारे में बताएं.मैं शमशेर साहब को मुबारकबाद दूंगा कि उन्होंने मेहनत से उनके सारे टेक्स्ट को एक जगह एकत्रित कर पुस्तक का आकार दिया है .वे इसी तरह और लिखें और ऐसी ही पुस्तकें प्रकाश में आएं.
उन्होंने आगे कहाकि खुसरो उस युग में पैदा हुए थे जब सुल्तानों का शासन हुआ करता था. उस जमाने में उन्होंने हिंदवी की बुनियाद डाली और यहीं से हिंदी और उर्दू दो जबानों का उद्गम हुआ. आज हमें न सिर्फ इन जबानों पर नाज है बल्कि भूमंडलीकरण के इस दौर में दुनिया की ताकतवर देश भी अपनी मार्केटिंग मे लिए इन जबानों का सहारा ले रहे हैं. अमीर खुसरो साहब की जितनी भी तारीफ की जाए वह कम ही होगी. उनका सारा अदब बच्चों से लेकर बड़ों तक न सिर्फ नई सोच देता है बल्कि आपसी मेल-मिलाप,भाईचारा, हुब्बुलवतनी,प्रकृति प्रेम और विश्व बंधुत्व की ओर इशारा करता है. उनकी सारी रचनाएं कालजयी हैं जो हर युग में लागू होती हैं.
इस संगोष्ठी का कुशल संचालन वरिष्ठ पत्रकार श्री एस.एस. शर्मा ने किया. उन्होंने संगोष्ठी में पधारे सीलमपुर क्षेत्र के विधायक श्री मतीन अहमद चौधरी, डॉ. अजय कुमार गुप्ता, जनाब किदवई साहब,प्रकाशक अनिल कुमार शर्मा,पुस्तक के कवर डिजाइनर श्री नरेंद्र त्यागी का विशेष आभार व्यक्त किया.

मुनीश परवेज राणा
बी-1/44, डी.एल.एफ.,
दिलशाद एक्टेंशन, साहिबाबाद, गाजियाबद-(उ.प्र.)

Thursday, April 8, 2010

अब्बू का तोहफा का लोकार्पण



विगत दिनों वरिष्ठ बालसाहित्यकार शमशेर अहमद खान की उर्दू ज़ुबान में लिखित बच्चों का मशहूर नावेल अब्बू का तोहफा का लोकार्पण फिल्म समारोह निदेशालय के अपर महानिदेशक श्री एस. एम.खान द्वारा किया गया. इस मौके पर बांसी स्टेट के राजकुमार श्री जय प्रताप सिंह भी मौजूद थे. श्री खान साहब ने लेखक को मुबारकबाद देते हुए उनकी दोनों जुबानों में की जा रही खिदमात पर रोशनी डाली और उम्मीद जाहिर की कि आगे भी वे इसी तरह देश की दोनों जुबानों में अपने नए शाह्कार से बच्चों को एक नेक इंसान बनने और कौम की खिदमत करने योग्य बनाते रहेंगे.उनकी इन सेवाओं पर राष्ट्र को फख्र है.आज बहुत कम लोग ऐसे हैं जो जिंदगी के जद्दोजेहद से निकलकर कौम की खिदमात को अंजाम देते हैं. जनाब शमशेर साहब को मैं अर्से से देख रहा हूं वे बिना किसी लोभ या लालच के बड़ी बेबाकी से इस तरफ मायल हैं.उनकी कलम की ताकत दिन-ब-दिन ताक़तवर होती जा रही है जोकि सकारात्मक दिशा में है जबकि इस अवस्था में अधिकांश अपनी ऊर्जा नहीं बचा पाते. हमारी नेक ख्वाहिसात उनके साथ है.

श्री जयप्रताप सिंह ने कहा यद्दपि मुझे उर्दू नहीं आती लेकिन मैं उनके इस शाहकार की कद्र करता हूं. आज मैं जिस कार्यालय में आया हूं वह फिल्म समारोह का कार्यालय है लिहाजा मेरी इच्छा है कि श्मशेर केवल कागजों को ही स्याह न करते रहें बल्कि बच्चों के लिए फिल्में भी बनाएं ताकि जहां कागज की पहुंच न हो वहां वे फिल्म के माध्यम से अपनी बात पहुंचा सकें.शमशेर को मैं भलीभांति जानता हूं, वे हमारे गृह जनपद सिद्धार्थ नगर से संबंधित हैं. बुद्ध के प्रति प्रेम और श्रद्धा भाव उनकी लेखनी में एक नई ऊर्जा का संचार करता है.आज जबकि भौतिकवाद से चारों तरफ मारकाट और गलाघोटूं स्पर्धा मची हुई है ऐसे में केवल बुद्ध का अहिंसात्मक मार्ग बचता है. इसलिए मैं यह कहूंगा कि वे बच्चों के फिल्म निर्माण में कदम रखें जो वक्त की सख्त जरूरत है.

-मुनीश परवेज़ राणा

Thursday, March 4, 2010

भारत रत्न डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम शीर्षक पुस्तक की प्रति डॉ. कलाम को प्रस्तुत



उर्दू में लिखित भारत रत्न डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम शीर्षक पुस्तक की प्रति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को उनके निवास 10-राजा जी मार्ग पर लेखक शमशेर अहमद खान द्वारा भेंट की गई.इस अवसर पर पूर्व राष्ट्रपति महामहिम डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के पूर्व प्रैस सचिव तथा वर्तमान में फिल्म समारोह के अपर महानिदेशक श्री एस. एम. खान सहित डॉ. जयनारायण मिश्र, श्री महेंद्र नाथ,डॉ. अंगद सिंह, डॉ. अबरार अंसारी, मो. शरीफ अंसारी,पुस्तक के डिजाइनर श्री नरेंद्र त्यागी,पत्रकार एवं शिक्षाविद श्री मुनीश परवेज राणा,श्री अनिल कुमार शर्मा और आरिफ अहमद खान उपस्थित थे.

मूलतः उक्त पुस्तक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम हिंदी में वर्ष 2002 में प्रकाशित हुई थी जिसे दिनमान प्रकाशन ने प्रकाशित किया था किंतु उर्दू भाषियों को ध्यान में रखते हुए कौमी कौंसिल बराए फ़रोग़ उर्दू ज़बान के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित की गई है. इसे मिनहाज प्रकाशन, 2-सी,प्रैस ब्लाक,सिविल लाइंस, दिल्ली-54 ने छापा है।

प्रस्तुति-मुनीश परवेज राणा

Thursday, February 4, 2010

चांद पर प्लाट ले लो का लोकार्पण



03 फरवरी 2010 को प्रगति मैदन पुस्तक मेले में हाल नं. 12ए, स्टाल सं.153-154 साहित्य भंडार,इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित पुस्तक चांद पर प्लाट ले लो लेखक शमशेर अहमद खान का लोकार्पणा श्रीमती कुसुम वीर के कर कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ.वे मानव संसाधन विकास मंत्रालय में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं और सुप्रसिद्ध कवियत्री हैं.
लोकार्पण के उपरांत अपने उद्बोधन भाषण में उन्होंने व्यक्त किया कि शमशेर अहमद खान अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हिंदी और उर्दू दोनों ज़बानों के वरिष्ठ बाल साहित्यकार हैं.इसके साथ ही वे एक खोजी पत्रकार भी हैं. उनकी अशारे क़दीमा यानी पुरातत्व में काफी रुचि है. जिन दिनों उन्मादी तालिबानी बामियान में पुरातात्विक महत्व की बुद्ध की मूर्तियों को विध्वंस कर रहे थे उन्हीं दिनों श्री खान ने अपने चार अन्य वरिष्ठ सहयोगियों के साथ कपिलवस्तु,लुंबिनि, धम्म संघ,कस्या से राजघाट की शांतिमय पुरातात्विक यात्राएं की थीं.

उनकी यह अविरल यात्रा केवल यहीं नहीं रुकी बल्कि उन्होंने उस समय भी उस परम्परा को तोड़ दिया जिसपर केवल अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व होता था.आप्रेशन विजय के दौरान उन्होंने एक महीने के भीतर कारगिल के शहीद नामक पुस्तक भी लिख ली जो हिंदी भाषा के लिए गौरव की बात थी.उन्होंनेपर्यावरण संरक्षण के लिए भी अनेक कार्य किए .इस क्षेत्र में उनका अवदान केवल पुस्तक लेखन ही तक सीमित नहीं रहा बल्कि एक सक्रीय कार्यकर्ता के रूप में अपना योगदान देते रहे हैं और आज एक पूरी पीढी उनके पर्यावरणीय अवदानों पर गर्व करती है.

इसी क्रम में उनका नया सृजन चांद पर प्लाट ले लो आया है जो हिंदी साहित्य जगत में बिल्कुल नया और अनोखा प्रयोग है.हिंदी साहित्य के इतिहास में यह पहली चित्रात्मक पुस्तक हैजो रंगीन है. चित्र अपनी कहानी स्वयं कहते हैं. इस पुस्तक पर बिहारी का यह दोहा सटीक बैठता है…देखन में छोटन लगें घाव करें गंभीर या यूं भी कह सकते हैं..उन्होंने गागर में सागर भरा है. कक्षा 2 के बच्चोम से लेकर प्रौढों तक हिंदी भाषा को सीखने और जीव-जंतुओं के साथ संवाद करने या संस्कारित करने का करने का एक टूल है. मुझे खुशी है कि श्री खान की पुस्तक का लोकार्पण मेरे द्वारा हो रहा है.मैं यह भी बता दूं कि श्री खान मेरे साथ काम कर चुके हैं. सरकार में पदानुक्रम होता है लेकिन उन्होंने हिंदी के विकास में अनेक ऐसे कार्य किए जो वरिष्ठ से वरिष्ठ अधिकारी नहीं कर पाते. आज भी उनका उत्साह, उनकी जिन्दादिली लोगों के प्रति सेवा भाव और स्फूर्ति न केवल मुझे बल्कि समाज के लिए भी प्रेणादायी है.

इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार अमरनाथ अमर, सुशील सिद्धार्थ, मुकेश नादान, डॉ. राजेंद्र सिंह कुशवाहा, अरूण कुमार, अनिल कुमार, वेब पत्रिका hindyugm.com के संपादक शैलेश भारतवासी,चंद्र्भूषण सहित अनेक मीडिया कर्मी, पत्रकार, विशिष्टजन, प्रकाशक बड़ी संख्या में उपस्थित थे.

मुनीश परवेज़ राणा
बी-1/44, डी.एल.एफ. दिलशाद एक्टेंशन-2
साहिबाबाद,गाजियाबाद---