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Thursday, February 11, 2010

यूँ अनावरित हुए 'काव्यनाद' और 'सुनो कहानी'


आप इस पूरे कार्यक्रम को सुन भी सकते हैं, आपको ऐसा प्रतीत होगा कि आप भी कार्यक्रम में उपस्थित हैं। नीचे के प्लेयर से सुनें-

कुल प्रसारण समय- 1 घंटा 20 मिनट । अपनी सुविधानुसार सुनने के लिए यहाँ से डाउनलोड करें।


19वें विश्व पुस्तक मेले में हिन्द-युग्म ने कई तरीके से धूम मचाई। किसी इंटरनेटीय समूह का प्रकाशन में एक साथ पाँच पुस्तकों के साथ प्रवेश हो या फिर साहित्य और संगीत के मेल का अभिनव प्रयोग, ये हिन्द-युग्म के ऐसे अध्याय बने जिनको पढ़कर हिन्दी की इंटरनेटीय उपस्थिति की गंभीरता का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

विश्व पुस्तक मेला की शुरूआत 30 जनवरी 2010 को हुई। 31 जनवरी को हिन्द-युग्म ने तीन पुस्तकों के लोकार्पण का कार्यक्रम आयोजित किया (इन पुस्तकों में से 'शब्दों का रिश्ता' हिन्द-युग्म के अपने प्रकाशन की पुस्तक थी)।

1 फरवरी 2010 को नई दिल्ली के प्रगति मैदान के सभागार-2 में हिन्द-युग्म ने अपना 'आवाज़ महोत्सव' मनाया जिसमें जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त की प्रतिनिधि कविताओं के संगीतबद्ध एल्बम ‘काव्यनाद’और प्रेमचंद की कहानियों के एल्बम 'सुनो कहानी' का विमोचन हुआ। जहाँ 'सुनो कहानी' का विमोचन महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय ने किया, वहीं काव्यनाद का विमोचन वरिष्ठ कवि और ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक बाजपेयी ने किया। इस कार्यक्रम में संगीत विशेषज्ञ और 'संगीत-संकल्प' पत्रिका के संपादक डॉ॰ मुकेश गर्ग दोनों एल्बमों पर टिप्पणी करने के लिए उपस्थित थे। संचालन प्रमोद कुमार तिवारी ने किया।


'काव्यनाद' का लोकार्पण करते विभूति नारायण राय, अशोक बाजपेयी और डॉ॰ मुकेश गर्ग

कार्यक्रम की शुरूआत में हिन्द-युग्म के कार्यकर्ता दीप जगदीप ने आवाज़ की गतिविधियों का संक्षिप्त परिचय उपस्थित श्रोताओं को दिया। आवाज़ की गतिविधियों से रूबरू होकर बहुत से दर्शकों को सुखद आश्चर्य हुआ कि सजीव सारथी के निर्देशन में हिन्द-युग्म का आवाज़ मंच ढेरों विविधताओं को समेटे है।

इसके बाद वर्ष 2009 के संगीत-आयोजन के सरताज गीत और लोकप्रिय गीत पुरस्कारों का वितरण हुआ। इसके तहत पुणे के संगीतकार-गायक रफीक शेख को रु 6000 का नगद इनाम (सरताज गीत के लिए) और केरल के निखिल-चार्ल्स-मिथिला की टीम को रु 4000 का नगद इनाम (लोकप्रिय गीत के लिए) दिया गया। जहाँ लोकप्रिय गीत के पुरस्कार का चेक लेने के लिए निखिल अपने पिता और अपनी बहन निखिला के साथ इस कार्यक्रम में उपस्थित होने केरल से पधारे थे , वहीं रफ़ीक शेख़ का चेक रफीक की ओर से हिन्द-युग्म के कवि मनीष वंदेमातरम् ने लिया।

दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के एसोशिएट प्रोफेसर डॉ॰ मुकेश गर्ग ने बहुत सधी हुई भाषा में साहित्य और संगीत के अंतर्संबंध पर अपनी रखी। उन्होंने बताया कि 50 के दशक में रेडियो पर सुगम संगीत (लाइट म्यूजिक) की शुरूआत फिल्मी गीतों की प्रतिक्रिया के तौर पर हुई थी। उस जमाने के साहित्य, कला और संगीत के कर्णधार ये मानते थे कि फिल्मी संगीत घटिया म्यूजिक है और उन्होंने फिल्मी गीतों का रेडियो पर प्रसारण बंद करवा दिया। लेकिन लोकतंत्र में लोक की पसंद का भी ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए 5-7 साल के अंदर ही विविध भारती चैनल शुरू करना पड़ा। मज़े की बात ये है कि सौंदर्य और अभिरुचि समय के साथ इस तरह बदलती है कि कई बार उनपर विचार करने से ताज्जुब होता है। 50 और 60 के दशक के फिल्मी गाने आजके लोगों के लिए श्रेष्ठता के मानदंड बने हुए हैं, जबकि उस समय के विशेषज्ञ उसे घटिया मानते थे। सुगम-संगीत बहुत लोकप्रिय नहीं हुआ, जबकि इसमें गंभीर साहित्य को संगीत के साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा था।

डॉ॰ मुकेश गर्ग ने निराला की गीतिका और रवीन्द्र नाथ टैगोर के रवीन्द्र संगीत के माध्यम से अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि गेयता किसी शब्द के अंदर ही होती है। नवभारत टाइम्स, जनसत्ता को आप भले ही गा दें, लेकिन इससे नवभारत टाइम्स गेय नहीं हो जायेगा। हमारे भक्तिकालीन जितने भी कवि हुए, उन सबकी रचनाएँ तब से लेकर अब तक गायी जाती हैं। संगीत को साड़ी की तरह नहीं लपेटा जा सकता। बहुत कम ऐसा हो पाता है कि कोई बहुत बढ़िया रचना को कोई संगीतकार उसी साहित्यिक गंभीरता और संवेदनात्मक स्तर के साथ गा ले। कर्ण का कवच-कुंडल को बाहर से पहनाना अलग बात है और कर्ण के शरीर पर उसे देखना एक अलग बात है। भक्तिकालीन गीतों की खासियत यह थी कि उनकी रचना प्रक्रिया में ही संगीत घुसा हुआ था। गाते-गाते रचा गया। इसी वजह से भक्तिकालीन सारी रचनाएँ लोकभाषा में होती थीं। यहीं पर शब्दों के गोल होने की बात उठती है। लोक किसी शब्द को घिस-घिसकर गोल बना देता है। लोकभाषा अक्सर गोल होती है। कृष्ण संस्कृत का शब्द है, कान्हा उसे सॉफ्ट बनाने की कोशिश है, कन्हाई थोड़ा और गोल बनाने की कोशिश और कन्हैया पूरी तरह से गोल हो चुका शब्द है। कोई शब्द 4-5 पीढ़ियों के यात्रा के बाद गेय होता है। इसीलिए संस्कृत कभी गेय भाषा नहीं रही। वह स्वरों के साथ पाठ की भाषा रही। शास्त्रीय संगीत के लिए ब्रजभाषा सबसे उपयुक्त भाषा है।

'काव्यनाद' पर टिप्पणी करते हुए मुकेश गर्ग ने कहा सबसे पहले मैं इस बाद के लिए हिन्द-युग्म को साधुवाद देना चाहूँगा कि इसने उन कविताओं को संगीतबद्ध करने की कोशिश की है जिन्हें गाना बहुत मुश्किल है, उसकी वजह यह है कि ये सभी कविताएँ संस्कृष्ठनिष्ठ शब्दों वाले हैं, उन्हें संगीतबद्ध करना तो मुश्किल नहीं है, लेकिन ऐसा बनाना कि लोग इसे गायें, बहुत मुश्किल है। सभी कविताओं के मुझे वो संस्करण पसंद आये जो बिना ताल के गाये गये हैं, लेकिन मुझे कुहू गुप्ता का पाश्चात्य शैली में गाया गया एक गीत 'जो तुम आ जाते एक बार' बहुत पसंद आया। इस गीत के बीच में नाटकीय ढंग से बोला गया डायलाग भी बहुत पसंद आया। मुझे यदि 'काव्यनाद' से कोई एक गीत चुनना हो तो यही गीत चुनूँगा। मैं चाहता हूँ कि इस तरह के प्रयास ज़ारी रहे।


'सुनो कहानी' का लोकार्पण करते विभूति नारायण राय, अशोक बाजपेयी और डॉ॰ मुकेश गर्ग

प्रेमचंद की कहानियों के एल्बम 'सुनो कहानी' पर टिप्पणी करते हुए महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति और प्रसिद्ध कथाकार विभूति नारायण राय ने कहा कि हमारे समय में यथार्थ कितनी तेजी से बदल रहा है यह देखना हो तो आज से पहले जब कहा जाता था कि 'मसि-कागद छुयो नहीं॰॰॰॰' को अब ऐसे कहा जा सकता है कि यदि आपने माउस-कीबोर्ड नहीं छुआ तो आज के समय के साथ कदमताल नहीं कर सकते। उन्होंने प्रेमचंद के डिजीटल रूप की प्रसंशा की और कहा कि यदि हिन्द-युग्म चाहे तो हमारा विश्वविद्यालय हिन्द-युग्म के साथ मिलकर इस तरह के प्रयासों में भागीदार हो सकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय की वेबसाइट हिन्दीसमय डॉट कॉम पर जल्द ही 1 लाख साहित्यिक पृष्ठों के अपलोडिंग की बात की और कहा कि हिन्द-युग्म या अन्य कोई वेबसाइट जब चाहे तब उनकी वेबसाइट से आवश्यक जानकारियाँ ले सकता है और हिन्दी के बड़े समुदाय तक हिन्दी साहित्य की बातें पहुँचा सकता है।

अंत में कार्यक्रम के संचालक प्रमोद कुमार तिवारी ने कार्यक्रम के अध्यक्ष, ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और वरिष्ठ कवि अशोक बाजपेयी को माइक पर आमंत्रित किया। अशोक बाजपेयी ने कहा कि पहले यह बात समझने वाली है कि इससे क्या साहित्य और संगीत की लोक-पहुँच पर कोई फर्क पड़ता है। भारत में 19वीं सदी तक कविता, संगीत और रंगमंच साथ-साथ थे, लेकिन जब पश्चिम प्रेरित आधुनिकता का हस्तक्षेप हुआ तब ये तीनों चीजें अलग-अलग हो गईं। कई बार इनके बीच की खाई पाटने की कोशिश हुई है और मैं इस प्रयास का भी स्वागत करता हूँ।

उन्होंने आगे कहा कि कविता में संगीत खुद होता है, कवि या कोई काव्य-मर्मज्ञ उसे जब पढ़ता है या गाता है तो संगीत के साथ ही गाता है। इसे गहराई से समझने की ज़रूरत है कि कविता गाने से क्या उसके नये अर्थ खुलते हैं।

अंत में गायक संगीतकार निखिल, कृष्णा पंडित और निखिला ने आवाज़ का उद्‍‌घोष गीत 'आवाज़ के रसिया हैं हम'प्रस्तुत किया जिसे इन्होंने कार्यक्रम शुरू होने से कुछ समय पहले ही तैयार किया था। धन्यवाद ज्ञापन आवाज़ के संपादक सजीव सारथी ने किया।

कार्यक्रम में 'काव्यनाद' के संकल्पनाकर्ता आदित्य प्रकाश और इस प्रोजेक्ट के सहयोगी ज्ञान प्रकाश सिंह को भी उपस्थित होना था, लेकिन किन्हीं अपरिहार्य कारणों से सम्मिलित न हो सके। कार्यक्रम में आकाशवाणी के वरिष्ठ उद्‍घोषक प्रदीप शर्मा, वरिष्ठ कवि उपेन्द्र कुमार, पुस्तक वार्ता के संपादक भारत भारद्वाज, लंदन से पधारे मोहन अग्रवाल के अलावा सैकड़ों गणमान्य लोगों ने भाग लिया।

अन्य झलकियाँ-


संचालक प्रमोद कुमार तिवारी


दर्शक-दीर्घा


डॉ॰ मुकेश गर्ग


विभूति नारायण राय



अशोक बाजपेयी



आवाज़ का परिचय देते दीप जगदीप



दीप जगदीप, संचालक और अतिथि


मंच



'काव्यनाद' का अनावरण करते अशोक बाजपेयी



'लोकप्रिय गीत' पुरस्कार का चेक मुख्य अतिथि के हाथों ग्रहण करते निखिल



रफीक़ शेख़ की ओर से 'सरताज गीत' पुरस्कार का चेक मुख्य अतिथि के हाथों ग्रहण करते मनीष वंदेमातरम्



'आवाज़ के रसिया हैं हम' गीत पेश करते निखिला, निखिल और कृष्णा पंडित


धन्यवाद ज्ञापित करते आवाज़ के संपादक सजीव सारथी


बाएँ से दाएँ- सखी सिंह, मनीष वंदेमातरम्, शैलेश भारतवासी, प्रमोद कुमार तिवारी, मोहन अग्रवाल, दीप जगदीप और महुआ


फुरसत के पलों में- निखिला, निखिल, कृष्णा पंडित और सजीव सारथी



शैलेश भारतवासी, प्रमोद कुमार तिवारी और मोहन अग्रवाल

Monday, February 8, 2010

19वां विश्व पुस्तक मेला संपन्न

30 जनवरी 2010 से 07 फरवरी 2010 तक आयोजित 19वां विश्व पुस्तक मेला सफलता पूर्वक संपन्न हो गया। इस मेले ने उन सब रिकार्डों को तोड़ दिया जो अब तक इसके पूर्व के पुस्तक मेलों के नाम थे। हालांकि शहर में अनेक गतिविधियाँ थीं किंतु मेले में उमड़े दर्शक भीड़ से परे जिम्मीदार लगे। अधिकांश दर्शक अपने नौनिहालों के साथ मेले में उनकी पसंद के स्टालों पर घूमत दिखे। हालाँकि बच्चों के लिए 14 नं. हाल आबंटित था फिर भी अन्य स्टालों में बच्चों से संबंधित पुस्तकें थीं. पुस्तक मेले में सर्वाधिक भीड़ एन.बी.टी., राधाकृष्ण, राजपाल,प्रभात प्रकाशन, हिंद पॉकेट बुक्स, डायमंड बुक्स,वाणी प्रकाशन आदि पर दिखे। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान और उत्तेर प्रदेश उर्दू अकादमी के स्टालों की अनेक पुस्तकें और सूचियां दो दिन पहले ही समाप्त हो चुकी थीं जो पाठकों की रुझ्हान की सूचक थीं। हर प्रकाशक चाहे वह छोटा हो या बडा इस मेले से खुश था। लेखक और प्रकाशक के बीच अनेक सकारात्मक पहल भी देखी गई। प्राइवेट मीडिया कुछ खट्टी तो कुछ मीठी दिखी। अनेक ने तो सम्यक दृष्टि अपनाई तो कुछ ने चाटुकारिता की सीमा को भी लांघ दिया। वेब मीडिया की भूमिका बड़ी अहम रही। जो काम अक्षर नहीं कर सकते थे उसे फोटो-फीचर के माध्यम तक पाठकों तक पहुंचाया। सभागारों में हर स्तर पर अनेक संगोष्ठियां आयोजित की गईं।

प्रगति मैदान के 42000 वर्ग मीटर में 2400 स्टाल और स्टैंड आबंटित किए गए थे जिसमें लगभग 1200 देशी एवं विदेशी प्रकाशकों ने अपनी सहभागिता की थी। मेले की थीम खेल पर आधारित थी।

इस मेले की सफलता के पीछे इस संस्था की निदेशक सुश्री नुजहत हसन और उनकी टीम को जाता है जो दिन-रात एक कर मेले के दुख-दर्द को समझा और यथासंभव उसके निराकरण का प्रयास किया। उनके सामूहिक लगन का ही प्रयास था जो सफलता पूर्वक संपन्न हो गया।

वे अपने संदेश में कहती हैं- मैं विदेशी प्रतिभागियों की बहुत आभारी हूँ, जिनमें से कई यहां पहली बार यहां आए और बहुत से प्रतिभागी पिछले कई पुस्तक मेलों में अपना सहयोग देते रहे हैं। मैं आशवस्त हूं कि उन सभी के लिए मेला सफल रहा। मैं उन सभी की भी आभारी हूं जिन्होंने इस मेले को सफल बनाने में अपना सहयोग दिया।


बिपिन चंद्रा से बात करते शमशेर अहमद खान

मेले के समापन समारोह में संस्था के अध्यक्ष विपिन चंद्रा ने एक मुलाकात में बताया कि इस मेले की सफलता के पीछे न केवल निदेशक के कुशल नेतृत्व की बात है बल्कि संस्था के सभी कार्मिकों ने दिन-्रात एककर इसे बुलंदियोम तक पहुंचाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, हमें ऐसे कर्मठ लोगों पर गर्व है।

बाल साहित्य की चर्चा के दौरान भारतीय परिवेश और उससे जुड़े साहित्य के प्रकाशन की प्रमुखता पर उन्होंने बल दिया। वर्ष 2012 में पुनः नए इरादों और संकल्पनाओं के साथ 20वां विश्व पुस्तक मेला आयोजित होगा।

शमशेर अहमद खान
2-सी, प्रैस ब्लॉक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस, दिल्ली-110054

Saturday, February 6, 2010

साहित्य और मीडिया: रिश्तों का संकट



राष्ट्रीय प्रकाशक संघ, दिल्ली के तत्वाधान में 19वें अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले के अवसर पर प्रगति मैदान के सभागार में साहित्य और मीडिया: रिश्तों का संकट पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया.इसकी अध्यक्षता देवेंद्र इस्सर ने की और इसके मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. महीप सिंह थे.अन्य वक्ताओं मॅं नरेंद्र मोहन,एन.के.सिंह (ब्यूरो चीफ ई. टी. वी.), ओम गुप्ता(मीडिया),प्रेम जन्मेजय(व्यंग्यकार),राजीव शर्मा(प्रकाशक),योगेंद्र पाल त्यागी,प्रवीण खुराना और प्रताप सहगल थे. एक प्रबुद्ध वक्ता ने संगोष्ठी के विषय पर सवालिया निशान लगाते हुए क्षमा याचना सहित अपनी आपत्ति दर्ज कराई कि आज साहित्य और मीडिया के रिश्तों के बीच कोई संकट नजर नहीं आता क्योंकि दोनों के माध्यम अलग-अलग हैं, हां मानाकि दोनों के उद्देश्य एक हैं.साहित्य भी वही बात समाज तक पहुंचाने का काम करता है जो मीडिया कहना चाहता है. जब दोनों के लक्ष्य समाज को एक सोद्देश्य प्रेरणा देनी की हो तो फिर दोनों के बीच संकट का प्रश्न ही कहां उठता है?एक वक्ता का यह मानना था कि मीडिया और साहित्य अलग-अलग नहीं हैं. दोनों के तरीके अलग हो सकते हैं लेकिन साहित्य को इतना सशक्त होना चाहिए कि उसे वैशाखी की जरूरत न पड़े. इसके प्रतिक्रिया स्वरूप एक वक्ता का यह कहना था कि आज साहित्य अपने पैरों पर स्वयं खडा है, उसने कभी मीडिया की वैशाखी का सहारा नहीं लिया.मुख्य अतिथि ने समाज में साहित्य की भूमिका पर अपनी बेबाक टिप्पणी से इसकी महत्ता पर विस्तृत प्रकाश डाला.

इस संगोष्ठी से यह बात उभरकर आई कि आज मीडिया या साहित्य कहीं न कहीं समाज से कटता जा रहा है.अगर स्वस्थ समाज की संकल्पना साकार करनी है तो दोनों को अपनी उपस्थिति समाज में दर्ज करानी होगी. समाज की दृष्टि सूक्ष्मता से बातों का आंकलन कर लेती है. मीडिया और साहित्य को कुच ऐसे फैक्टर हैं जो उनको समाज से काटकर अलग किए हुए हैं.अगर मीडिया और साहित्य को समाज का पथ प्रदर्शक बनना है तो उन्हें अपने भीतर आत्म मंथन करना होगा और अग्नि परीक्षा देकर पुरानी भूमिका में वापस लौटना होगा.जिस प्रकार स्वस्थ मनुष्य का मस्तिष्क स्वस्थ सोचने के योग्य होता है,वैसे ही स्वस्थ लक्ष्य साहित्य और मीडिया के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी और गुणकारी होंगे.

अंत में प्रकाशक संघ के अध्यक्ष श्री योगेंद्र पाल त्यागी ने उपस्थित वक्ताओं और सुधी श्रोताओं को धन्यवाद दिया.

रिपोर्ट और फोटो-
शमशेर अहमद खान
2-सी,प्रैस ब्लॉक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस, दिल्ली---110054

Friday, February 5, 2010

हिन्दयुग्म के तत्वावधान में तीन पुस्तकों का विमोचन


(बाएं से दाएं)- सुमीता प्रवीण केशवा, उपेन्द्र कुमार, पद्मश्री बालस्वरूप राही, इमरोज़, रश्मि प्रभा

आप इस पूरे कार्यक्रम को सुन भी सकते हैं, आपको ऐसा प्रतीत होगा कि आप भी कार्यक्रम में उपस्थित हैं। नीचे के प्लेयर से सुनें-

कुल प्रसारण समय- 1 घंटा 10 मिनट । अपनी सुविधानुसार सुनने के लिए यहाँ से डाउनलोड करें।


19वें विश्व पुस्तक मेले में हॉल नं. 12A का स्टाल नं. 285 यानी हिन्दयुग्म डॉट कॉम अब मेले में आने वाले पुस्तक प्रेमियों के सैलाब के लिए एक सुपरिचित स्टाल बन गया है। यहाँ आगंतुकों को कई अच्छी काव्य पुस्तकें व अन्य सामग्री तथा प्रेमचंद की कहानियां व निराला जयशंकर प्रसाद आदि कालजयी कवियों की कविताएँ CD रूप में उपलब्ध हो रही हैं।

दि. 31 जनवरी 2010 को हिन्दयुग्म के तत्वावधान में ही एक साथ तीन पुस्तकों का विमोचन प्रगति मैदान के हॉल नं. 7D के कांफ्रेंस रूम नं. 2 में संपन्न हुआ। हिन्दयुग्म की गतिविधियों में अब सोने पर सुहागे की तरह पुस्तक प्रकाशन की गतिविधि भी जुड गई है। ‘हिन्दयुग्म’ द्वारा प्रकाशित, सुपरिचित कवियत्री रश्मि प्रभा की 72 कविताओं का संकलन ‘शब्दों का रिश्ता’ इस कार्यक्रम में लोकार्पित तीन साहित्यिक कृतियों में से एक था। रश्मि प्रभा के संकलन ‘शब्दों का रिश्ता’ के अतिरिक्त उनके द्वारा ही सम्पादित 31 कवियों के सम्मिलित संकलन ‘अनमोल संचयन’ तथा सुपरिचित लेखिका सुमीता प्रवीण केशवा के प्रथम नाटक ‘सम-बंध’ का भी लोकार्पण हुआ। ‘सम-बंध’ का लोकार्पण प्रसिद्ध साहित्यकार उपेन्द्र कुमार ने, ‘अनमोल संचयन’ का पद्मश्री बाल स्वरुप राही ने तथा ‘शब्दों का रिश्ता’ का विख्यात चित्रकार इमरोज़ ने किया।


सम-बंध का लोकार्पण करते सुमीता प्रवीण केशवा, उपेन्द्र कुमार, पद्मश्री बालस्वरूप राही, इमरोज़ और रश्मि प्रभा

‘सम-बंध’ समलैंगिक संबंधों पर रचा गया एक नाटक है, जिस के बारे में श्री उपेन्द्र कुमार ने कहा कि ऐसे विषय पर लिखना सचमुच एक साहसिक कार्य है, जो कि निश्चय ही एक स्वागत योग्य बात है। उन्होंने कहा कि नाटक अपने चरम पर तब आता है जब उस का बाकायदा मंचन हो, जहाँ पात्रों के अभिनय के साथ-साथ पार्श्व-संगीत आदि तत्वों से मिल कर नाटक अपने समग्र प्रभाव में सामने आता है। इस के साथ उन्होंने नाटककार सुमीता केशवा को शुभकामना दी कि नाटक शीघ्र ही मंच पर अभिनीत रूप में सब के सामने आए। नाटक की प्रशंसा करते हुए उन्होंने यह माना कि लेखिका ने समलैंगिक संबंधों को बहुत गहराई से विश्लेषित कर के उसे मानवीय स्तर पर और समुचित सहानुभूति से देखा परखा है। समलैंगिक संबंधों पर काफी लंबे अरसे से बातचीत चल रही है और उन्होंने इस बात पर खुशी व्यक्त की कि भारत के न्यायालयों ने भी अब इस ओर ध्यान दिया है और इस पर खुले तौर पर चर्चा चल पड़ी है। कई पुस्तकें भी आ रही हैं। लेकिन उन के अनुसार हम जब भी कोई पुस्तक पढ़ रहे होते हैं, तो हमारे बहुत-से पूर्वाग्रह होते हैं, जिनके कारण हम ऐसे विषयों पर लिखी पुस्तक को पढ़ने से पहले ही रिजेक्ट कर चुके होते हैं। पर उन्हें आशा है कि जब पाठक ‘सम-बंध’ को पढेंगे, या किसी मंच पर देखेंगे तो खुले मन से पढ़ेंगे या देखेंगे और उसकी बाद ही कोई धारणा बनाएँगे।


अनमोल-संचयन का विमोचन करते अतिथि

रश्मि प्रभा द्वारा सम्पादित कविता संकलन ‘अनमोल संचयन’ के विमोचन भाषण में श्री बाल स्वरुप राही ने सब से पहले कहा कि इस संकलन में 31 कवि हैं, जिन में से ज़्यादातर नए हैं। इसलिए इसे पढ़ना शुरू कर के उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई कि नई पीढ़ी के इन कवियों की अपनी राहें हैं और किसी बड़े साहित्यकार का प्रभाव इन पर नहीं हैं। स्वयं अपना उदहारण देते हुए उन्होंने कहा कि जब उन्होंने कविता लिखनी शुरू की तो कुछ कुछ इस अंदाज़ में शुरू की:

न मैं गा सकूंगा ज़माने के स्वर में
ज़माना मेरे साथ गाए तो गाए.

उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि कवि का नाम सुपरिचित न होना कोई नई बात नहीं है। यह बहुत पहले से चला आ रहा है कि कविता बहुत कम पढ़ी जाती है। पर जिन कवियों के नाम अपरिचित हैं, उनमें से कई कवि ऐसे हैं जो बहुत अच्छा लिख रहे हैं। राजशेखर ने प्राचीन काल में अपनी काव्य मीमांसा में लिखा था कि बहुत से कवि ऐसे हैं जो केवल घर तक सीमित रह जाते हैं। कुछ ऐसे हैं, जो केवल मित्र-मंडली तक पहुँच पाते हैं और ऐसे बहुत कम होते हैं जिनकी दुनिया भर में पहुँच होती हो। एक रोचक बात की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा कि इस संकलन में कवियों के परिचय में उनके जन्म-दिन तो दिए गए हैं, पर उनके (और अधिकतर कवयित्रियों के) जन्म वर्ष नहीं दिए गए हैं। सभागार में हँसी बिखेरते हुए उन्होंने कहा कि इस बात को ले कर अधिक सोचने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि परिचय में जो कवियों कवयित्रियों के चित्र दिए गए हैं, उन चित्रों से आप आसानी से उन की उम्र का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

कविता और गद्य की परस्पर तुलना करते हुए उन्होंने किसी महान साहित्यकार का सन्दर्भ देते हुए कहा कि:

What is prose?

Ans: Words in thier best order.

What is poetry?

Anss: The best words in their best order.

संकलन के विषय में उन्होंने कहा कि उसे उन्होंने बहुत महत्वाकांक्षा से पढ़ना शुरू किया और अपनी पत्नी पुष्पा राही जो स्वयं एक सशक्त कवयित्री हैं (और इस कार्यक्रम में सभागार में उपस्थित भी थी) से भी कहा कि ये बहुत अच्छी कविताएँ हैं। संकलन की सबसे पहली कविता की कुछ पंक्तियाँ पढकर सुनाते हुए वे अभिभूत से लगे:

मेरा मन एक पुस्तक है/जिस के प्रत्येक पृष्ठ पर तुम्हीं रेखांकित हो/अक्षर अक्षर में/ तुम्हारी ही छवि बोलती है...


'शब्दों का रिश्ता' का लोकार्पण करते सुमीता प्रवीण केशवा, उपेन्द्र कुमार, पद्मश्री बालस्वरूप राही, इमरोज़ और रश्मि प्रभा

चित्रकार इमरोज़ ने बेहद संक्षिप्त भाषण दिया और अपनी एक नज़्म की कुछ पंक्तियाँ भी कही:

मैं एक अनलिखी गज़ल को कई बार लिख चूका हूँ/ पर वह अनलिखी ही रही...

इस कार्यक्रम में सम्मिलित संकलन ‘अनमोल संचयन’ के दो कवि अनिल पराशर व संगीता स्वरुप भी भी उपस्थित थे और उन्हें मंच पर आमंत्रित कर के कविता पाठ करने को भी कहा गया। अनिल पराशर की कविता ‘पिता’ पर सभी अभिभूत थे। कुछ पंक्तियाँ:

हाथ कांधे पे बस एक रखता था वो
इन आँखों में सब देख सकता था वो
कोई सिहरन हुई जब भी सोचा इसे
उफ़! मेरे वास्ते मर भी सकता था वो.

संगीता स्वरुप की कविता कोयला भी सब को अच्छी लगी:

मेरा मन/सुलगता हुआ कोयला/...चाहती हूँ कि/कोई आए/ और ढक ले मुझे/ अपने पूरे वजूद से/ इस तरह कि/ दम तोड़ दें सारी चिंगारियां/ अंदर ही अंदर/ और शांत हो जाए मन/ एक राख विहीन/ ठंडे कोयले की तरह...

पूरे कार्यक्रम में उपस्थित होना एक सुखद सी अनुभूति सी लग रहा था जिस में मुंबई पुणे से आई दोनों कवयित्रियों व संकलन के सभी कवियों के प्रति सब के हृदय में सराहना सी उमड़ रही थी।

कार्यक्रम के अंत में नीलम मिश्र ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया और स्वादिष्ट जलपान के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ.

चित्रों में कार्यक्रम-


कार्यक्रम की शुरूआत करने के लिए संचालक को आमंत्रित करते शैलेश भारतवासी


संचालक प्रमोद कुमार तिवारी


संचालक प्रमोद कुमार तिवारी


रश्मि प्रभा और संगीता स्वरूप


इमरोज


काव्यपाठ करतीं संगीता स्वरूप


काव्यपाठ करते अनिल मासूम शायर


श्रोताओं से मुखातिब इमरोज








सम-बंध पर अपने विचार व्यक्त करते कवि उपेन्द्र कुमार


हिन्द-युग्म के स्टॉल में इमरोज़


रिपोर्ट- प्रेमचंद सहजवाला

Thursday, February 4, 2010

चांद पर प्लाट ले लो का लोकार्पण



03 फरवरी 2010 को प्रगति मैदन पुस्तक मेले में हाल नं. 12ए, स्टाल सं.153-154 साहित्य भंडार,इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित पुस्तक चांद पर प्लाट ले लो लेखक शमशेर अहमद खान का लोकार्पणा श्रीमती कुसुम वीर के कर कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ.वे मानव संसाधन विकास मंत्रालय में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं और सुप्रसिद्ध कवियत्री हैं.
लोकार्पण के उपरांत अपने उद्बोधन भाषण में उन्होंने व्यक्त किया कि शमशेर अहमद खान अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हिंदी और उर्दू दोनों ज़बानों के वरिष्ठ बाल साहित्यकार हैं.इसके साथ ही वे एक खोजी पत्रकार भी हैं. उनकी अशारे क़दीमा यानी पुरातत्व में काफी रुचि है. जिन दिनों उन्मादी तालिबानी बामियान में पुरातात्विक महत्व की बुद्ध की मूर्तियों को विध्वंस कर रहे थे उन्हीं दिनों श्री खान ने अपने चार अन्य वरिष्ठ सहयोगियों के साथ कपिलवस्तु,लुंबिनि, धम्म संघ,कस्या से राजघाट की शांतिमय पुरातात्विक यात्राएं की थीं.

उनकी यह अविरल यात्रा केवल यहीं नहीं रुकी बल्कि उन्होंने उस समय भी उस परम्परा को तोड़ दिया जिसपर केवल अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व होता था.आप्रेशन विजय के दौरान उन्होंने एक महीने के भीतर कारगिल के शहीद नामक पुस्तक भी लिख ली जो हिंदी भाषा के लिए गौरव की बात थी.उन्होंनेपर्यावरण संरक्षण के लिए भी अनेक कार्य किए .इस क्षेत्र में उनका अवदान केवल पुस्तक लेखन ही तक सीमित नहीं रहा बल्कि एक सक्रीय कार्यकर्ता के रूप में अपना योगदान देते रहे हैं और आज एक पूरी पीढी उनके पर्यावरणीय अवदानों पर गर्व करती है.

इसी क्रम में उनका नया सृजन चांद पर प्लाट ले लो आया है जो हिंदी साहित्य जगत में बिल्कुल नया और अनोखा प्रयोग है.हिंदी साहित्य के इतिहास में यह पहली चित्रात्मक पुस्तक हैजो रंगीन है. चित्र अपनी कहानी स्वयं कहते हैं. इस पुस्तक पर बिहारी का यह दोहा सटीक बैठता है…देखन में छोटन लगें घाव करें गंभीर या यूं भी कह सकते हैं..उन्होंने गागर में सागर भरा है. कक्षा 2 के बच्चोम से लेकर प्रौढों तक हिंदी भाषा को सीखने और जीव-जंतुओं के साथ संवाद करने या संस्कारित करने का करने का एक टूल है. मुझे खुशी है कि श्री खान की पुस्तक का लोकार्पण मेरे द्वारा हो रहा है.मैं यह भी बता दूं कि श्री खान मेरे साथ काम कर चुके हैं. सरकार में पदानुक्रम होता है लेकिन उन्होंने हिंदी के विकास में अनेक ऐसे कार्य किए जो वरिष्ठ से वरिष्ठ अधिकारी नहीं कर पाते. आज भी उनका उत्साह, उनकी जिन्दादिली लोगों के प्रति सेवा भाव और स्फूर्ति न केवल मुझे बल्कि समाज के लिए भी प्रेणादायी है.

इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार अमरनाथ अमर, सुशील सिद्धार्थ, मुकेश नादान, डॉ. राजेंद्र सिंह कुशवाहा, अरूण कुमार, अनिल कुमार, वेब पत्रिका hindyugm.com के संपादक शैलेश भारतवासी,चंद्र्भूषण सहित अनेक मीडिया कर्मी, पत्रकार, विशिष्टजन, प्रकाशक बड़ी संख्या में उपस्थित थे.

मुनीश परवेज़ राणा
बी-1/44, डी.एल.एफ. दिलशाद एक्टेंशन-2
साहिबाबाद,गाजियाबाद---

Tuesday, February 2, 2010

कपिल सिब्बल की दो टूक बातें – 19 वें ‘विश्व पुस्तक मेला’ (30 Jan – 7 Feb) की उद्घाटन रिपोर्ट



‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ द्वारा प्रति दो वर्ष में ‘विश्व पुस्तक मेला’ का आयोजन पुस्तक प्रेमियों के लिए एक त्यौहार की तरह होता है. हजारों प्रकाशक, लाखों पुस्तकें और लाखों पुस्तक प्रेमी एक सैलाब की तरह दिल्ली के प्रगति मैदान में उमड़ते देखे जा सकते हैं.

19 वां पुस्तक मेला भी उसी त्यौहार शृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में 30 जनवरी 2010 को मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा उद्घाटित हुआ. कपिल सिब्बल की एक विशेषता यह कि वे बहुत उत्साह से अपने मंत्रालय में एक स्फूर्ति सी भर देते हैं. केवल निपटाऊ तरीके से काम करके जनता को झूठे आश्वासनों द्वारा आश्वस्त रखना उनकी कार्य शैली में शामिल नहीं है. जिस तरीके से कपिल सिब्बल ने मानव संसाधन मंत्री की शपथ लेते ही भारतीय शिक्षा प्रणाली में अचानक कुछ क्रन्तिकारी परिवर्तन करने शुरू कर दिए उस से शिक्षा से जुड़े सभी महत्वपूर्ण लोगों की चेतनाओं का झकझोर दिया जाना निश्चित सा था. उन के विषय में कहने से पहले मेरी स्मृति अचानक कुछ पूर्व मानव संसाधन मंत्रियों की ओर सहज ही चली जाती है. वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार के मानव संसाधन मंत्री मुरली मनोहर जोशी कुछ विचित्र सा चेहरा ले कर जनता के सामने प्रस्तुत हुए. अपनी तथा अपनी पार्टी की चिर-परिचित सांप्रदायिक छवि की प्रमाणिकता सी देते उन्होंने करोड़ों रूपए प्राचीन भारत के इतिहास पर शोध के लिए बहाने शुरू कर दिए जिस में उनकी सनक यही थी कि प्राचीन भारत की अधिकाधिक गौरवशाली छवि जनता के सामने प्रस्तुत की जाए और क्यों कि प्राचीन भारत में अधिकाधिक हिंदू राजा थे सो हिंदू गौरव प्राचीन भारत के गौरव का पर्यायवाची बन कर लगे हाथों उनकी पार्टी के लिए हिंदू वोट भी बटोर देगा. उसी हिंदू गौरव की सनक में उन्होंने विश्वविद्यालयों में ज्योतिष पढाने का नया शगूफा छोड़ दिया था. इस के आलावा कभी सरस्वती वंदना कभी वंदे मातरम, हिंदू गौरव उन की दुखती रग बन गई और इस से देश की धर्म-निरपेक्ष छवि को कितनी क्षति पहुंचेगी यह उनकी फ़िक्र में शामिल था ही नहीं. बहरहाल, बहुत बे-आबरू हो कर ...के अंदाज़ में सन 2004 में NDA सरकार को जनता ने हटा दिया तो अर्जुन सिंह मानव संसाधन मंत्री बने जो इतने वृद्ध थे कि चाह कर भी शायद वो उत्साह न पद कर सके जिस की दरकार थी, हालांकि उन्होंने मंडल आयोग के आरक्षण को निजी स्कूलों कालेजों में भी लागू करने का अच्छा कदम उठाया जो फिलहाल अदालती युद्ध में खटाई में सा पड़ा हुआ है.






(कपिल सिब्बल का वक्तव्य)

कपिल सिब्बल ने कोई भी विवादस्पद या सांप्रदायिक काम न कर के सीधे ही शिक्षा प्रणाली में कुछ क्रन्तिकारी कदम उठाने शुरू कर दिए जिन के बारे में सोचते सब थे पर कार्यान्वित करने का साहस कम में था. दसवीं कक्षा के बोर्ड की परीक्षाएं समाप्त की तथा बारहवी में भी ग्रेडिंग सिस्टम लागू करनी के बात की. . संयोग कि पुस्तक मेले के उद्घाटन भाषण में उन्होंने सब से पहले इसी विषय को छुआ. उन्होंने मंच पर उपस्थित विद्वान इतिहासकार विपिनचंद्र समेत उन सभी लोगों को आड़े हाथों लिए जिन्होंने यह प्रश्न उछाला कि दसवीं के बोर्ड की परीक्षा समाप्त करने का आखिर उद्देश्य क्या था. उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि फिर तो मैं क्षमा चाहता हूँ क्यों कि मैं तो फेल हो गया हूँ. पर यह कौन कहता है कि हम चाहते हैं कि बच्चों की परीक्षाएं ही न हों और अध्यापक उन्हें पढाएं ही नहीं, और न ही विद्यार्थी पुस्तकें पढ़ें! स्वयं को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि हम तो बल्कि चाहते हैं कि विद्यार्थियों का लगातार परीक्षण होता रहे, न केवल उस एक परीक्षा में! विद्यार्थी केवल अपनी उन पाठ्य पुस्तकों और कक्षा की चारदीवारी में ही न फंसा रहे. बल्कि उस चारदीवारी के बाहर झांक कर वह दुनिया देखे और पाठ्य पुस्तकों के अलावा भी अन्य पुस्तकें पढ़े. उस के मूल्यांकन अध्यापक केवल उस एक अंतिम परीक्षा से न कर के निरंतर पूरा वर्ष उस से संपर्क में रह कर करते रहें! यही तो पंडित जवाहरलाल नेहरु ने कहा था और हम तो जवाहरलाल नेहरु के पद-चिह्नों पर चल रहे हैं!
उन्होंने इस बात पर खुशी व्यक्त की कि भारत में 37 भाषाओँ में लाखों पुस्तकें प्रकाशित होती हैं और अकेले अंग्रेजी में ही भारत विश्व में अंग्रेजी पुस्तकें प्रकाशित करने वाले देशों में तीसरे स्थान पर है.

एक महत्वपूर्ण अवलोकन

स्कूली शिक्षा के बाद अचानक उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि आज प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रोनिक्स में क्रांति आई हुई है पर उन्हें डर है कि विधार्थी तो अब e-books की ओर उन्मुख होंगे और पुस्तकें खरीदेंगे ही नहीं, जो कि एक चिंताजनक बात होगी. स्वयं अपना उदहारण देते हुए उन्होंने कहा कि वे प्रतिमाह पुस्तकों की दुकान पर जाते हैं तथा विश्व भर की नई पुरानी पुस्तकों के शीर्षक जांच कर घर लौटते हैं तो हाथों में कई नई और महत्वपूर्ण पुस्तकें होती हैं. एक प्रकार से उन्होंने पुस्तक की सत्ता को दूरदर्शन व कम्प्युटर के आगे झुकने न देने की ओर संकेत दिए.
उन्होंने यह भी कहा कि आज हर कोई शिक्षा लेते समय या पढते समय यही देखटा है कि उसे कितना पैसा मिलेगा. पर ज़रूरत इस बात की है कि आज हमें एक सेकूलर सहनशील वातावरण की ज़रूरत है. कपिल सिब्बल के समग्र भाषण को देखा जाए तो उपस्थित श्रोताओं के लिए ही नहीं वरन मंच पर उपस्थित विद्वानगण के लिए भी सोचने को काफी कुछ महत्वपूर्ण था और यदि समाज का चिंतन सही धारा में बढ़ा तो नई सोच के इस मसीहा का कार्यकाल एक सफल कार्यकाल माना जाएगा.


(टिकट खरीदने के लिए लाइन में खड़े आगंतुक)



(मेला में हिन्द-युग्म का स्टॉल और हिन्द-युग्म के कार्यकर्ता)

रिपोर्ट- प्रेमचंद सहजवाला
फोटो- शमशेर अहमद खान

Thursday, January 28, 2010

ब्लॉग जगत की 3 किताबों के लाकार्पण अवसर पर आप आमंत्रित हैं

पुस्तक प्रेमियो,


हिन्द-युग्म 30 जनवरी 2010 से 7 फरवरी 2010 के बीच नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित होने वाले 19वें विश्व पुस्तक मेला में अपना स्टॉल सजा रहा है। जहाँ हमारी कोशिश होगी कि हम इंटरनेट की दुनिया पर हिन्दी की सजीव उपस्थिति का प्रचार-प्रसार कर पायें। गौरतलब है कि हिन्द-युग्म 18वाँ विश्व पुस्तक मेला में भी इंटरनेट-जगत का प्रतिनिधित्व कर चुका है।

सन् 2008 में इंटरनेट पर हिन्दी का जितना बड़ा संसार था, आज उससे कई गुना विस्तार उसे मिल चुका है। इसलिए हिन्द-युग्म ने भी अपनी सक्रियता, अपनी प्रचार रणनीति में विस्तार किये हैं। यह इंटरनेट जगत के लिए अपने आप में बड़ी बात है कि इंटरनेट पर काम करने वाला एक समूह विश्व पुस्तक मेला में 3X3 मीटर2 का क्षेत्रफल घेर रहा है, जहाँ की हर बात इंटरनेट से जुड़ी है।

हिन्द-युग्म प्रिंट की दुनिया से भी तालमेल करना चाहता है, इसलिए हिन्द-युग्म ने इस बार प्रकाशन भी प्रवेश किया है और पाँच पुस्तकों का प्रकाशन कर रहा है।

31 जनवरी 2010 को हिन्द-युग्म विश्व पुस्तक मेला के सभागार में तीन पुस्तकों का विमोचन कार्यक्रम आयोजित कर रहा है, जिनमें से एक पुस्तक का प्रकाशक खुद हिन्द-युग्म है।

कृपया इस कार्यक्रम में ज़रूर पधारें और हमारा मनोबल बढ़ाये। कार्यक्रम का पूरा विवरण निम्नवत् है-

1) सुमीता प्रवीण केशवा की नाट्य पुस्तक ‘सम-बंध’ का लोकार्पण (द्वारा- एच॰ एस॰ एस॰ शिवप्रकाश, कन्नड़ के प्रसिद्ध नाटककार और कवि)।

2) रश्मि प्रभा के कविता-संग्रह
‘शब्दों का रिश्ता’ का विमोचन (द्वारा- इमरोज़, प्रसिद्ध चित्रकार)।

3) रश्मि प्रभा द्वारा संपादित 31 नये कवियों की प्रतिनिधि कविताओं के संग्रह
‘अनमोल संचयन’ का विमोचन (द्वारा- पद्मश्री बालस्वरूप राही, प्रसिद्ध कवि)।

काव्यपाठ- शोभना चौरे, संगीता स्वरूप

संचालन- प्रमोद कुमार तिवारी

स्थान- कॉन्फ्रेंस रूम-2, हॉल नं॰ 7D के पास, प्रगति मैदान, नई दिल्ली

दिन व समयः 31 जनवरी 2010, दोपहर 2-4

जलपान- दोपहर- 3:30-4 बजे तक

निवेदक-
हिन्द-युग्म टीम

संपर्क-
9873734046, 9968755908, 8010678194, 9871123997, 9868097199, 9015634902


(ऊपर्युक्त बैनर को बड़ा करके देखने के लिए बैनर पर क्लिक करें)

प्रगति मैदान, नई दिल्ली में 30 जनवरी 2010 से 7 फरवरी 2010 तक, 19वाँ विश्व पुस्तक मेला के दौरान हिन्द-युग्म के स्टॉल (हॉल नं॰ 12A, स्टॉल नं॰- 285) पर जरूर पधारें।