हिन्दी ब्लॉगिंग पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला और संगोष्ठि का उद्घाटन
बाएँ से दाएँ- माइक पर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, मंच पर आलोक धन्वा, डॉ॰ अजित गुप्ता, विभूति नारायण राय, ऋषभ देव शर्मा, अनिल राय 'अंकित' और डॉ. कविता वाचक्नवी
9 अक्टूबर । वर्धा
आज महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में 'हिंदी ब्लॉगिंग की आचार-संहिता' विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला एवं संगोष्ठी उद्घाटन हुआ। उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने किया। कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत कार्यक्रम के संयोजक सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने किया।
अपने स्वागत भाषण में विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति ए. अरविंदाक्षण ने कहा कि इस कार्यक्रम में यूजीसी और मानव संसाधन विकास के प्रतिनिधियों/अधिकारियों को भी आमंत्रित करना चाहिए, जिससे वे जान सकें कि ये विश्वविद्यालय केवल साहित्यधर्मिता और उत्सव का ही केंद्र नहीं है, बल्कि यह हिंदी को तकनीक से भी जोड़ने को प्रयासरत है।
अपना वक्तव्य देते हुए विभूति नारायण राय
कुलपति विभूति नारायण राय ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि इंटरनेट ने राज्यों की बंदिशों को तोड़ा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में यह जो विस्फोट हुआ है, वो इंटरनेट से ही संभव हो सका है। लेकिन हम यहाँ 2 दिनों के लिए इसलिए भी उपस्थित हुए हैं कि हम इस बात पर बहस कर सकें कि इस माध्यम ने हमें एक खास तरह की स्वच्छंदता तो नहीं दे दी है! अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कहीं हम यह तो नहीं भूल रहे हैं कि हम सारी सीमाएँ तोड़ रहे हैं और दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे हैं। कहीं हम तथ्यों को तोड़-मरोड़कर तो नहीं पेश कर रहे हैं। हमें ऐसा लगता है कि हर एक ब्लॉगर को अपनी लक्ष्मण-रेखा खुद बनानी होगी।
श्रोतागण
विषय-प्रवर्तन जोधपुर, राजस्थान से पधारीं प्रसिद्ध साहित्यकार और ब्लॉगर डॉ. अजित गुप्ता ने किया। अध्यक्षता डॉ. ऋषभ देव शर्मा ने की। इनके अतिरिक्त मंच पर वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा, जनसंचार विभाग-प्रमुख अनिल राय और ब्लॉगर और कवयित्री डॉ. कविता वाचक्नवी उपस्थित थे।
जो तटस्थ हैं , समय लिखेगा उनका भी अपराध -- सार्थक संवाद
मुंबई । 17 अगस्त 2010 - अपसंस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यहीनता के खिलाफ "सार्थक संवाद" संस्था का गठन 1994 में मुंबई की महिला रचनाकारों ने मिलकर किया था । 17 अगस्त 2010 को सार्थक संवाद ने हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के सभागार में महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय द्वारा हिन्दी लेखिकाओं पर की गई अभद्र टिप्पणी तथा भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित ‘नया ज्ञानोदय‘ पत्रिका के संपादक रवीन्द्र कालिया के संपादकीय अविवेक के खिलाफ एक निषेध प्रस्ताव पारित किया। मुंबई महानगर की रचनाकारों, प्राध्यापिकाओं और वि.वि. की छात्राओं ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर तथा चर्चा में भाग लेकर सर्वसम्मति से स्वीकार किया कि कुलपति की जिम्मेदार कुर्सी को शर्मसार करने वाले और संपादक के गंभीर दायित्व की उपेक्षा करने वाले व्यक्तियों को इन पदों पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। गरिमापूर्ण पद को कलंकित करने के कारण इन्हें अविलंब इस्तीफा देने के लिए विवश किया जाना चाहिए।
हिन्दुस्तानी प्रचार सभा की मानद निदेशक डॉ. सुशीला गुप्ता ने आयोजन के संदर्भ की भूमिका प्रस्तुत की। कुतुबनुमा की संपादक डॉ. राजम नटराजन ने कहा कि महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय केंद्र सरकार की अधीनस्थ संस्था है जिसकी स्थापना भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए की गई है। आज जब देश के सर्वोच्च नागरिक पद पर महिला राष्ट्रपति हों, इस तरह के वक्तव्य असंवैधानिक हो जाते हैं। ‘नया ज्ञानोदय‘ की प्रबंधन समिति की भी जिम्मेदारी बनती है कि हल्के स्तर की सामग्री के प्रकाशन पर रोक लगाएं। ‘नया ज्ञानोदय‘ किसी गली कूचे में छपने वाला पीत पत्र नहीं है। क्या भारतीय भाषाओं को गरिमा देने के लिए बनाए गए संस्थान के प्रबंधकों को भी बाजारीकरण ( टी.आर.पी.) का खेल भाने लग गया है? वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा ने कहा कि इस पूरे प्रकरण ने संपादकीय नैतिकता और दायित्व पर सवाल खड़े किए हैं। इससे भारतीय ज्ञानपीठ जैसे संस्थान की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है। उन्होंने कहा कि हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी विडम्बना है कि जिन लेखकों ने अपने जीवन में स्त्रियों को कभी उनका अपेक्षित सम्मान नहीं दिया और जो हर स्त्री को ‘वस्तु’ की तरह देखते हैं, वे ही स्त्रियों के मुद्दों पर तफरीह से साक्षात्कार देते और विमर्श करते दिखाई देते हैं । शायद वे अपनी करनी के गुनाहों को कथनी की चादर से ढक लेना चाहते हैं। ऐसी मानसिकता वाले पुरुषों का शाब्दिक विचलन स्वाभाविक है पर इस वक्तव्य को शाब्दिक विचलन कहकर माफ नहीं किया जाना चाहिए । डॉ. शशि मिश्रा ने "बेवफाई के विराट उत्सव" पर गहरा क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि बेवफाई का उत्सव ही अपने आप में शर्मनाक है फिर उसका विराट होना तो संस्कृति को रौंदने जैसा है। पद के मद में चूर हमारे ये पुरोधा अपनी पारंपरिक संस्कृति, अपनी सहकर्मी के सम्मान की रक्षा नहीं कर सकते तो उन्हें सार्वजनिक दायित्वों से बर्खास्त करने की मांग प्रबल होनी चाहिए। कथाकार संतोष श्रीवास्तव ने कहा- इन कुलपति महोदय के मनचले स्वभाव के बारे में मैं कई सालों से सुनती आ रही हूँ। अब यह मानसिकता खुलकर सामने आ गई है। उन्होंने कुलपति के अभद्र बयान को ‘बेबाक बयान’ कहने वाले रवींद्र कालिया को समान रूप से जिम्मेदार माना। डॉ. सुनीता साखरे ने महिला वि.वि. का प्रतिनिधित्व करते हुए संपूर्ण समुदाय की अस्मिता की बात की।
सभा में उपस्थित सभी महिलाओं ने जोरदार शब्दों में, एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से कुलाधिपति नामवर सिंह से यह निवेदन किया कि वे अपनी मारक चुप्पी को तोड़ें। वे मात्र एक अकादमिक व्यक्तित्व नहीं है, हिन्दी साहित्य की समीक्षा के श्लाका पुरुष हैं। इस प्रकरण से हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाषा को एक गर्त में धकेल दिया गया है।
इस अवसर पर वरिष्ठ कथाकार श्रीमती कमलेश बख्शी, गुजराती लेखिका डॉ. हंसा प्रदीप, युवा कवयित्री कविता गुप्ता, डॉ. नगमा जावेद, डॉ. उषा मिश्रा, डॉ. किरण सिंह, डॉ. विनीता सहाय, डॉ. मंजुला देसाई, डॉ. संगीता सहजवानी, सुश्री संज्योति सानप तथा समस्त स्नातकोत्तर छात्राओं ने विभूतिनारायण राय और रवीन्द्र कालिया के इस्तीफे की मांग पर एकजुट होकर हस्ताक्षर किए। सांस्कृतिक और साहित्यिक अवमूल्यन को अपदस्थ कर हिन्दी साहित्य और संस्कृति की गरिमा को लौटा लाने की विकलता को क्या ये सभी पदाधिकारी और संस्थानों के मालिक और उच्चाधिकारी महसूस करेंगे? (स्रोतः जनसत्ता ब्यूरो)
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कुल प्रसारण समय- 1 घंटा 20 मिनट । अपनी सुविधानुसार सुनने के लिए यहाँ से डाउनलोड करें।
19वें विश्व पुस्तक मेले में हिन्द-युग्म ने कई तरीके से धूम मचाई। किसी इंटरनेटीय समूह का प्रकाशन में एक साथ पाँच पुस्तकों के साथ प्रवेश हो या फिर साहित्य और संगीत के मेल का अभिनव प्रयोग, ये हिन्द-युग्म के ऐसे अध्याय बने जिनको पढ़कर हिन्दी की इंटरनेटीय उपस्थिति की गंभीरता का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
1 फरवरी 2010 को नई दिल्ली के प्रगति मैदान के सभागार-2 में हिन्द-युग्म ने अपना 'आवाज़ महोत्सव' मनाया जिसमें जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त की प्रतिनिधि कविताओं के संगीतबद्ध एल्बम ‘काव्यनाद’और प्रेमचंद की कहानियों के एल्बम 'सुनो कहानी' का विमोचन हुआ। जहाँ 'सुनो कहानी' का विमोचन महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय ने किया, वहीं काव्यनाद का विमोचन वरिष्ठ कवि और ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक बाजपेयी ने किया। इस कार्यक्रम में संगीत विशेषज्ञ और 'संगीत-संकल्प' पत्रिका के संपादक डॉ॰ मुकेश गर्ग दोनों एल्बमों पर टिप्पणी करने के लिए उपस्थित थे। संचालन प्रमोद कुमार तिवारी ने किया।
'काव्यनाद' का लोकार्पण करते विभूति नारायण राय, अशोक बाजपेयी और डॉ॰ मुकेश गर्ग
कार्यक्रम की शुरूआत में हिन्द-युग्म के कार्यकर्ता दीप जगदीप ने आवाज़ की गतिविधियों का संक्षिप्त परिचय उपस्थित श्रोताओं को दिया। आवाज़ की गतिविधियों से रूबरू होकर बहुत से दर्शकों को सुखद आश्चर्य हुआ कि सजीव सारथी के निर्देशन में हिन्द-युग्म का आवाज़ मंच ढेरों विविधताओं को समेटे है।
इसके बाद वर्ष 2009 के संगीत-आयोजन के सरताज गीत और लोकप्रिय गीत पुरस्कारों का वितरण हुआ। इसके तहत पुणे के संगीतकार-गायक रफीक शेख को रु 6000 का नगद इनाम (सरताज गीत के लिए) और केरल के निखिल-चार्ल्स-मिथिला की टीम को रु 4000 का नगद इनाम (लोकप्रिय गीत के लिए) दिया गया। जहाँ लोकप्रिय गीत के पुरस्कार का चेक लेने के लिए निखिल अपने पिता और अपनी बहन निखिला के साथ इस कार्यक्रम में उपस्थित होने केरल से पधारे थे , वहीं रफ़ीक शेख़ का चेक रफीक की ओर से हिन्द-युग्म के कवि मनीष वंदेमातरम् ने लिया।
दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के एसोशिएट प्रोफेसर डॉ॰ मुकेश गर्ग ने बहुत सधी हुई भाषा में साहित्य और संगीत के अंतर्संबंध पर अपनी रखी। उन्होंने बताया कि 50 के दशक में रेडियो पर सुगम संगीत (लाइट म्यूजिक) की शुरूआत फिल्मी गीतों की प्रतिक्रिया के तौर पर हुई थी। उस जमाने के साहित्य, कला और संगीत के कर्णधार ये मानते थे कि फिल्मी संगीत घटिया म्यूजिक है और उन्होंने फिल्मी गीतों का रेडियो पर प्रसारण बंद करवा दिया। लेकिन लोकतंत्र में लोक की पसंद का भी ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए 5-7 साल के अंदर ही विविध भारती चैनल शुरू करना पड़ा। मज़े की बात ये है कि सौंदर्य और अभिरुचि समय के साथ इस तरह बदलती है कि कई बार उनपर विचार करने से ताज्जुब होता है। 50 और 60 के दशक के फिल्मी गाने आजके लोगों के लिए श्रेष्ठता के मानदंड बने हुए हैं, जबकि उस समय के विशेषज्ञ उसे घटिया मानते थे। सुगम-संगीत बहुत लोकप्रिय नहीं हुआ, जबकि इसमें गंभीर साहित्य को संगीत के साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा था।
डॉ॰ मुकेश गर्ग ने निराला की गीतिका और रवीन्द्र नाथ टैगोर के रवीन्द्र संगीत के माध्यम से अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि गेयता किसी शब्द के अंदर ही होती है। नवभारत टाइम्स, जनसत्ता को आप भले ही गा दें, लेकिन इससे नवभारत टाइम्स गेय नहीं हो जायेगा। हमारे भक्तिकालीन जितने भी कवि हुए, उन सबकी रचनाएँ तब से लेकर अब तक गायी जाती हैं। संगीत को साड़ी की तरह नहीं लपेटा जा सकता। बहुत कम ऐसा हो पाता है कि कोई बहुत बढ़िया रचना को कोई संगीतकार उसी साहित्यिक गंभीरता और संवेदनात्मक स्तर के साथ गा ले। कर्ण का कवच-कुंडल को बाहर से पहनाना अलग बात है और कर्ण के शरीर पर उसे देखना एक अलग बात है। भक्तिकालीन गीतों की खासियत यह थी कि उनकी रचना प्रक्रिया में ही संगीत घुसा हुआ था। गाते-गाते रचा गया। इसी वजह से भक्तिकालीन सारी रचनाएँ लोकभाषा में होती थीं। यहीं पर शब्दों के गोल होने की बात उठती है। लोक किसी शब्द को घिस-घिसकर गोल बना देता है। लोकभाषा अक्सर गोल होती है। कृष्ण संस्कृत का शब्द है, कान्हा उसे सॉफ्ट बनाने की कोशिश है, कन्हाई थोड़ा और गोल बनाने की कोशिश और कन्हैया पूरी तरह से गोल हो चुका शब्द है। कोई शब्द 4-5 पीढ़ियों के यात्रा के बाद गेय होता है। इसीलिए संस्कृत कभी गेय भाषा नहीं रही। वह स्वरों के साथ पाठ की भाषा रही। शास्त्रीय संगीत के लिए ब्रजभाषा सबसे उपयुक्त भाषा है।
'काव्यनाद' पर टिप्पणी करते हुए मुकेश गर्ग ने कहा सबसे पहले मैं इस बाद के लिए हिन्द-युग्म को साधुवाद देना चाहूँगा कि इसने उन कविताओं को संगीतबद्ध करने की कोशिश की है जिन्हें गाना बहुत मुश्किल है, उसकी वजह यह है कि ये सभी कविताएँ संस्कृष्ठनिष्ठ शब्दों वाले हैं, उन्हें संगीतबद्ध करना तो मुश्किल नहीं है, लेकिन ऐसा बनाना कि लोग इसे गायें, बहुत मुश्किल है। सभी कविताओं के मुझे वो संस्करण पसंद आये जो बिना ताल के गाये गये हैं, लेकिन मुझे कुहू गुप्ता का पाश्चात्य शैली में गाया गया एक गीत 'जो तुम आ जाते एक बार' बहुत पसंद आया। इस गीत के बीच में नाटकीय ढंग से बोला गया डायलाग भी बहुत पसंद आया। मुझे यदि 'काव्यनाद' से कोई एक गीत चुनना हो तो यही गीत चुनूँगा। मैं चाहता हूँ कि इस तरह के प्रयास ज़ारी रहे।
'सुनो कहानी' का लोकार्पण करते विभूति नारायण राय, अशोक बाजपेयी और डॉ॰ मुकेश गर्ग
प्रेमचंद की कहानियों के एल्बम 'सुनो कहानी' पर टिप्पणी करते हुए महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति और प्रसिद्ध कथाकार विभूति नारायण राय ने कहा कि हमारे समय में यथार्थ कितनी तेजी से बदल रहा है यह देखना हो तो आज से पहले जब कहा जाता था कि 'मसि-कागद छुयो नहीं॰॰॰॰' को अब ऐसे कहा जा सकता है कि यदि आपने माउस-कीबोर्ड नहीं छुआ तो आज के समय के साथ कदमताल नहीं कर सकते। उन्होंने प्रेमचंद के डिजीटल रूप की प्रसंशा की और कहा कि यदि हिन्द-युग्म चाहे तो हमारा विश्वविद्यालय हिन्द-युग्म के साथ मिलकर इस तरह के प्रयासों में भागीदार हो सकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय की वेबसाइट हिन्दीसमय डॉट कॉम पर जल्द ही 1 लाख साहित्यिक पृष्ठों के अपलोडिंग की बात की और कहा कि हिन्द-युग्म या अन्य कोई वेबसाइट जब चाहे तब उनकी वेबसाइट से आवश्यक जानकारियाँ ले सकता है और हिन्दी के बड़े समुदाय तक हिन्दी साहित्य की बातें पहुँचा सकता है।
अंत में कार्यक्रम के संचालक प्रमोद कुमार तिवारी ने कार्यक्रम के अध्यक्ष, ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और वरिष्ठ कवि अशोक बाजपेयी को माइक पर आमंत्रित किया। अशोक बाजपेयी ने कहा कि पहले यह बात समझने वाली है कि इससे क्या साहित्य और संगीत की लोक-पहुँच पर कोई फर्क पड़ता है। भारत में 19वीं सदी तक कविता, संगीत और रंगमंच साथ-साथ थे, लेकिन जब पश्चिम प्रेरित आधुनिकता का हस्तक्षेप हुआ तब ये तीनों चीजें अलग-अलग हो गईं। कई बार इनके बीच की खाई पाटने की कोशिश हुई है और मैं इस प्रयास का भी स्वागत करता हूँ।
उन्होंने आगे कहा कि कविता में संगीत खुद होता है, कवि या कोई काव्य-मर्मज्ञ उसे जब पढ़ता है या गाता है तो संगीत के साथ ही गाता है। इसे गहराई से समझने की ज़रूरत है कि कविता गाने से क्या उसके नये अर्थ खुलते हैं।
अंत में गायक संगीतकार निखिल, कृष्णा पंडित और निखिला ने आवाज़ का उद्घोष गीत 'आवाज़ के रसिया हैं हम'प्रस्तुत किया जिसे इन्होंने कार्यक्रम शुरू होने से कुछ समय पहले ही तैयार किया था। धन्यवाद ज्ञापन आवाज़ के संपादक सजीव सारथी ने किया।
कार्यक्रम में 'काव्यनाद' के संकल्पनाकर्ता आदित्य प्रकाश और इस प्रोजेक्ट के सहयोगी ज्ञान प्रकाश सिंह को भी उपस्थित होना था, लेकिन किन्हीं अपरिहार्य कारणों से सम्मिलित न हो सके। कार्यक्रम में आकाशवाणी के वरिष्ठ उद्घोषक प्रदीप शर्मा, वरिष्ठ कवि उपेन्द्र कुमार, पुस्तक वार्ता के संपादक भारत भारद्वाज, लंदन से पधारे मोहन अग्रवाल के अलावा सैकड़ों गणमान्य लोगों ने भाग लिया।
अन्य झलकियाँ-
संचालक प्रमोद कुमार तिवारी
दर्शक-दीर्घा
डॉ॰ मुकेश गर्ग
विभूति नारायण राय
अशोक बाजपेयी
आवाज़ का परिचय देते दीप जगदीप
दीप जगदीप, संचालक और अतिथि
मंच
'काव्यनाद' का अनावरण करते अशोक बाजपेयी
'लोकप्रिय गीत' पुरस्कार का चेक मुख्य अतिथि के हाथों ग्रहण करते निखिल
रफीक़ शेख़ की ओर से 'सरताज गीत' पुरस्कार का चेक मुख्य अतिथि के हाथों ग्रहण करते मनीष वंदेमातरम्
'आवाज़ के रसिया हैं हम' गीत पेश करते निखिला, निखिल और कृष्णा पंडित
धन्यवाद ज्ञापित करते आवाज़ के संपादक सजीव सारथी
बाएँ से दाएँ- सखी सिंह, मनीष वंदेमातरम्, शैलेश भारतवासी, प्रमोद कुमार तिवारी, मोहन अग्रवाल, दीप जगदीप और महुआ
फुरसत के पलों में- निखिला, निखिल, कृष्णा पंडित और सजीव सारथी
शैलेश भारतवासी, प्रमोद कुमार तिवारी और मोहन अग्रवाल
भगत सिंह पर चर्चा और प्रेमचंद सहजवाला की पुस्तक का लोकार्पण सम्पन्न
पुस्तक का अनावरण करते भारत भारद्वाज, प्रो॰ चमन लाल, विभूति नारायण राय, हिंमाशु जोशी, साथ में खड़े हैं लेखक प्रेमचंद सहजवाला
नई दिल्ली । 12 नवम्बर हिन्द-युग्म ने गाँधी शांति प्रतिष्ठान सभागार में प्रेमचंद सहजवाला द्वारा लिखित पुस्तक 'भगत सिंहः इतिहास के कुछ और पन्ने' का विमोचन-कार्यक्रम आयोजित किया। पुस्तक का विमोचन प्रसिद्ध साहित्यकार और महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायाण राय ने किया। इस कार्यक्रम में भगत सिंह विषय के घोषित विशेषज्ञ प्रो॰ चमन लाल, वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी और वरिष्ठ आलोचक भारत भारद्वाज ने 'बदलते दौर में युवा चेतना और भगत सिंह की परम्परा' विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में अपने-अपने विचार रखे।
उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया से पहली ऐसी पुस्तक है जो किसी खास विषय पर केन्द्रित है और पहले ब्लॉग पर सिलसिलेवार ढंग से प्रकाशित है। इस पुस्तक के सभी 13 अध्याय पहले हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हैं, जिनमें भगत सिंह के जीवन, जीवन दर्शन और गाँधी के साथ इनके मतांतर को रेखाकिंत किया गया है। प्रेमचंद सहजवाला ने इसे पुस्तक रूप देने से पहले सभी अध्यायों को संशोधित और परिवर्धित भी किया है।
प्रेमचंद सहजवाला ने बताया कि उन्होंने किस तरह से भगत सिंह पर कलम चलाने का विचार बनाया। प्रेमचंद ने कहा कि 1990 में भारत में हुए कई राजनैतिक-धार्मिक और साम्प्रादायिक उथल-पुथल ने उन्हें कथा-कहानियों से अलग भारतीय इतिहास को परखने के लिए प्रेरित किया। प्राचीन भारतीय इतिहास से होते-होते ये आधुनिक भारतीय इतिहास तक पहुँचे और गाँधी-नेहरू-भगत सिंह की शौर्यगाथा में उलझ गये और यह खँगालने की कोशिश करने लगे कि भगत सिंह आखिर क्या हैं!
हिन्द-युग्म ने विमोचन कार्यक्रम के साथ 'बदलते दौर में युवा चेतना और भगत सिंह की परम्परा' विषय पर एक गोष्ठी भी आयोजित किया था, जिसमें जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केन्द्र के अध्यक्ष और भगत सिंह से संबंधित कई पुस्तकों और दस्तावेज़ों के संपादक प्रो॰ चमन लाल, मशहूर कथाकर हिमांशु जोशी, पुस्तक-वार्ता के संपादक और वरिष्ठ आलोचक भारत भारद्वाज और इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विभूति नारायण राय अपने-अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किये गये थे।
इस विषय पर सबसे पहले हिमांशु जोशी ने अपने विचार रखे। हिमांशु जी ने बताया कि आज़ादी हमें तीन तरह से मिल सकती थीं- गाँधी जी के तरीके से, दूसरा भगत सिंह-चंद्रशेखर आज़ाद का और तीसरा सैन्य विद्रोह यानी सुभाष चंद्र बोस से। ये तीनों शक्तियाँ मिली और भारत आज़ाद हो गया। इन्होंने आगे कहा कि भगत सिंह केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे बल्कि एक क्रांतिदर्शी थे।
भारत भारद्वाज ने इस बात का खुलासा किया कि एक बलिदानी ने भगत सिंह के लिए अपनी कुर्बानी दी। भगत सिंह के खिलाफ इकबालिया गवाही देने वाले फणीन्द्रनाथ घोष को मारने वाले बैकुंठ शुक्ल को फाँसी दी गई थी।
मुख्य अतिथि विभूति नारायण ने कहा कि भगत सिंह होना एक खास तरह का सपना देखना है। भगत सिंह केवल उत्साही, भावुक या देशभक्त किस्म के युवा नहीं थे, बल्कि भगत सिंह एक दर्शन, एक विचार का नाम है। सहजवाला जी ने इस पुस्तक को लिखकर हिन्दी में एक कमी को पूरा किया है। सहजवाला जी ने बहुत से किताबों में बिखरे पड़े तथ्यों और बातों को एक जिल्द में समेटा है।
इसके बाद कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो॰ चमन लाल को संचालक प्रमोद कुमार तिवारी जी ने आवाज़ दी। प्रो॰ चमन लाल ने लगभग 55 मिनटों में अपनी बात रखी। चमन लाल ने कहा कि भगत सिंह के जीवन के अनेक पहलू हैं, जिनपर हम घंटों बात कर सकते हैं। इनके वक्तव्य की कुछ मुख्य बातें-
1)भगत सिंह ने 5 साल से लेकर साढ़े 23 साल की उम्र तक (लगभग 18 वर्ष तक) पूरी तरह से सजग और चैतन्य इंसान की तरह जिया। 2) भगतसिंह का ताल्लुक पूरी तरह से वहाँ से रहा है जो आज पाकिस्तान में है। 3) 1922 में जिस चंद्रशेखर आज़ाद ने 'महात्मा गाँधी की जय' कह-कह कर अपनी पीठ पर 30 बेंत खाये थे और ऊफ तक नहीं की थी, भगत सिंह के साथ सत्याग्रह आंदोलन से इसलिए नाता तोड़ लिया था क्योंकि गाँधी जी ने 22 पुलिस वालों की मौत से अचानक अपना आंदोलन वापिस ले लिया था। 4)भगत सिंह के लिए देश का मतलब देश की मिट्टी से, इसके शहर-गाँव से नहीं था, बल्कि देश की जनता से था। इसीलिए भगत सिंह मानते थे कि देश पर चाहे कालों का राज रहे या गोरों का, जब तक यह व्यवस्था नहीं बदलेगी तब तक भारत की हालत में सुधार नहीं होगा। भगत सिंह पहले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनमें सबसे पहले सामाजिक चेतना जागी थी। इनसे पहले के क्रांतिकारी 'भारत माता की जय' तक सीमित थी। 5) गाँधी जी का रास्ता अंग्रेजों को बहुत अच्छा लगता था, क्योंकि गाँधी जी अंग्रेजों के शोषण को खत्म करने के लिए कोई कोशिश नहीं कर रहे थे। अंग्रेज़ों को मालूम था कि यदि भगत सिंह ज़िंदा रहा, या भगत सिंह का विचार ज़िंदा रहा तो यहाँ की जनता हमसे शोषण का हिसाब माँगेंगी। इसीलिए अंग्रेजों ने भारत को विभाजन का रास्ता का दिखाया। विभाजन का फायदा अंग्रेजों को हुआ, अमेरिका को हुआ। विभाजन का जिम्मेदार जिन्ना नहीं था। विभाजन का जिम्मेदार ब्रिटिश थी। यह अंग्रेज़ों की चाल थी। जिन्ना को अकेले दोष देना एक अंधराष्ट्रभक्त है। नेहरू, पटेल सभी जिम्मेदार थे। गाँधी कुछ हद जिम्मेदार इसलिए भी हैं क्योंकि इन्होंने उस समय कुछ नहीं बोला जब उन्हें बोलना चाहिए था। गाँधी यदि पटेल-नेहरू की सत्तालोलुपता को समझकर विभाजन को रोक लेते तो आज जितने महान हैं, उससे अधिक महान होते। 6) भगत सिंह ने एक महान काम यह भी किया कि सबकुछ अपनी डायरी में लिखकर रखा। जिससे आज भगत सिंह के वास्तविक दस्तावेज और असलियत हमारे सामने है। भगत ने फाँसी से मरने से पहले भी लिखा कि मेरे मरने के बाद क्या करना है। भगत सिंह पहला ऐसा क्रांतिकारी था, जो कहता था कि देश को आज़ाद होने के लिए मेरा मरना ज़रूरी है। भगत सिंह ने अपनी फाँसी खुद चुनी थी। 7) भगत सिंह 'बम-बारूद' के खिलाफ थे। वे कहते थे कि यदि पुलिस जनता पर प्रहार नहीं करेगी, तो जनता पर भी उन पर पत्थर नहीं फेंकेगी, पुलिस-स्टेशन को बम से नहीं उड़ायेगी। वॉयलेंस की शुरूआत हमेशा पुलिस/स्टेट/ब्रिटिश करती थी। 8) गाँधी जी और भगत सिंह की आज़ादी का फर्क यह है कि 1861 में अंग्रेज़ों का बना क़ानून आज भी हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में लागू है। भगत सिंह वाली आज़ादी हमें मिली होती तो कोई भी स्वाभिमानी देश कॉलोनियल क़ानून 1 दिन भी लागू नहीं रहने देता। 15 अगस्त 1947 से 1 दिन भी आगे भी ये कानून नहीं चलते। 9) हिन्दुस्तान में सबसे अधिक किताबें भगत सिंह पर लिखी गई हैं। 350 से अधिक किताबें जिनकी सूची मैं बना रहा हूँ, इनमें से पौने 200 से भी अधिक किताबें हिन्दी में है। भारत की लगभग हर भाषा में भगत सिंह के ऊपर किताबें हैं। हिन्दुस्तान में गाँधी और नेहरू को छोड़कर शायद ही कोई और नेशनल लीडर हो, जिनपर भारत की हर भाषा में किताबें हों। 10) सिंधी के मशहूर कवि शेख़ हयाज़ ने भगत सिंह पर सिंधी में काव्य-नाटक लिखा। 11) अंग्रेज़ों ने सबसे अधिक किताबें भगत सिंह पर बैन की।
इसके बाद आनंदम् संस्था के प्रमुख जगदीश रावतानी ने सभी अतिथियों और श्रोताओं का धन्यवाद किया। मंच का संचालन युवा कवि प्रमोद कुमार तिवारी ने किया।
कार्यक्रम में अल्का सिंहा, युवा कवयित्री सुनीता चोटिया, हिन्द-युग्म के संपादक शैलेश भारतवासी, वरिष्ठ कवि मुनव्वर सरहदी, वरिष्ठ शायर मनमोहन तालिब, परिचय-संस्था की प्रमुख उर्मिल सत्यभूषण, इस कार्यक्रम के संयोजक और युवा कवि रामजी यादव, कवि-लेखक रंजीत वर्मा, कामरेड पीके साही, सपर-प्रमख राकेश कुमार सिंह, कवयित्री ममता किरण इत्यादि उपस्थित थे। जो लोग इस कार्यक्रम में किसी कारणवश उपस्थित नहीं हो पाये थे, वे नीचे के प्लेयर से पूरा कार्यक्रम सुन सकते हैं।
यदि आप उपर्युक्त प्लेयर से ठीक तरह से नहीं सुन पा रहे हैं या अपनी सुविधानुसार सुनना चाहते हैं तो यहाँ से डाउनलोड कर लें। अन्य झलकियाँ-
सभागार के प्रवेश द्वार पर मुख्य अतिथि का स्वागत
दीप प्रज्ज्वलन के वक़्त प्रेमचंद सहजवाला के साथ हिन्द-युग्म के संपादक शैलेश भारतवासी
उपस्थित श्रोतागण
अपने विचार रखते पुस्तक के लेखक प्रेमचंद सहजवाला
मुख्य अतिथि को स्मृति-चिह्न भेंट करते शैलेश भारतवासी
प्रो॰ चमन लाल को स्मृति-चिह्न भेंट करते कार्यक्रम के संयोजक रामजी यादव
हिमांशु जोशी को स्मृति-चिह्न भेंट करतीं अलका सिंहा
भारत भारद्वाज को स्मृति-चिह्न भेंट करतीं अनुराधा शर्मा
श्रोताओं से मुख़ातिब मुख्य अतिथि
अपना वक्तव्य पेश करते प्रो॰ चमन लाल
ईटीवी न्यूज से पुस्तक के बारे में बात करते प्रो॰ चमन लाल
(विवरण देखने के लिए नीचे के चित्र पर भी क्लिक कर सकते हैं)
हिन्दी की बहुचर्चित वेबपत्रिका हिन्द-युग्म प्रेमचंद सहजवाला द्वारा लिखित पुस्तक ‘भगत सिंहः इतिहास के कुछ और पन्ने’ के विमोचन कार्यक्रम और विचार गोष्ठी में आपको आमंत्रित करता है। हिन्दी ब्लॉगिंग में यह पहली बार है कि किसी खास विषय पर क्रमवार प्रकाशित लेखों को पुस्तक की शक्ल दी गई है। इससे भी पहले भी 1-2 बार हिन्दी ब्लॉगों ने अपनी स्मारिका या काव्य-संग्रह, कहानी-संग्रह जैसी पुस्तकें प्रकाशित किये हैं, लेकिन किसी व्यक्तित्व को समर्पित लेखों की शृंखला प्रकाशित करने का यह पहला मौका है। कार्यक्रम में पधारकर हमारा प्रोत्साहन करें। कार्यक्रम का विवरण निम्नवत् है-
‘भगत सिंहः इतिहास के कुछ और पन्ने’ पुस्तक का विमोचन और विचार गोष्ठी
विचार गोष्ठी के विषय- 1॰ बदलते दौर में युवा चेतना और भगत सिंह की परम्परा 2॰ हिन्दी में इंटरनेटीय रचनाकर्म- कितना गंभीर, कितना असरदार
मुख्य अतिथि- विभूति नारायण राय (वरिष्ठ साहित्यकार और महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति) अन्य विशिष्ट अतिथि व वक्ता- प्रो॰ चमन लाल (चर्चित लेखक, भगत सिंह के दुलर्भ दस्तावेजों और चिट्ठियों के संकलनकर्त्ता तथा संपादक, जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय शिक्षा संघ के अध्यक्ष) हिमांशु जोशी (प्रसिद्ध कथाकार) पंकज बिष्ट (प्रसिद्ध कथाकार और 'समयांतर' के संपादक) संचालन- प्रमोद कुमार तिवारी, युवा कवि
स्थानः गाँधी शांति फाउँडेशन (प्रतिष्ठान) सभागार (221/223, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आई टी ओ के पास), नई दिल्ली दिन व समयः शनिवार, 12 दिसम्बर 2009, शाम 5 से 8 बजे तक चाय का समयः शाम 5 से 6 बजे तक
धन्यवाद।
निवेदक- शैलेश भारतवासी (नियंत्रक व प्रधान सम्पादक) रामजी यादव (संयोजक) हिन्द-युग्म (www.hindyugm.com)
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