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Friday, April 15, 2011

कॉलेज ऑफ़ स्टडीज में दो दिवयीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न



‘जो बीत जाता है उसके पुर्नावलोकन की बाते उठती है और जब हम इनपर चर्चा करते हैं तो नई बातें सामने आती हैं। आवश्यक्ता है इस निरंतर पुर्नावलोकन की। कविता की प्रासंगिकता को समय पाठक और अभिरुचि की दृष्टि से परखा जाना चाहिए। और जब हम अज्ञेय, नागार्जुन, शमेशर बहादुर सिंह, एवं केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशताब्दी के अवसर पर उनके रचनाकर्म को देख रहें तो बहुत आवश्यक हो जाता है कि पहले से ही कठघरे में बांधकर देखने की छवि को तोड़कर पढ़ा जाए।’ यह उद्गार कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज ,दिल्ली विश्वविद्यालय, द्वारा ‘कविता की प्रासंगिकता: संदर्भ अज्ञेय, नागार्जुन, शमेशर बहादुर सिंह, एवं केदारनाथ अग्रवाल’ विषय पर कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से आयोजित, दो दिवयीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते समय प्रसिद्ध आलोचिका निर्मला जैन ने कहे । उन्होंने कहा कि अज्ञेय ने उपन्यास तथा कथा को नयी दिशा दी, छायावाद को उखाड़ा तथा नागार्जुन और केदार ने राजनीति को काव्य का विषय बनाया। शमशेर संवेदना,आत्मसंवाद और आवेग के कवि हैं तथा उनकी राजनीतिक कविताएं स्थूल और सपाट हैं। इन चारों कवियों में से अज्ञेय एकमात्र ऐसे कवि हैं जिन्होने शरणार्थी समस्या पर कविताएं लिखीं। नागार्जुन की राजनीतिक कविताएं गहरी तकलीफ की कविताएं हैं। आलोचकों ने केदार जी को मात्र राजनीतिक कवि कहकर सीमित किया है और उनका अवमूल्यन किया है।’ प्रो0 निर्मला जेन ने केदारनाथ अग्रवाल की अनेक प्रेम कविताओं को उद्धृत भी किया।

अपने अध्यक्षीय भाषण में अशोक वाजपेयी ने कहा-इन चारों कवियों ने यथार्थ और वैकल्पिक यथार्थ की कल्पना की। ये चारों कवि गहरी प्रश्नवाचकता के कवि हैं। इन्होने स्वयं की कविता पर संदेह किया है। जन्म-शताब्दी पर इन चारों को याद करना एक जैविक घटना है। इन चारों कवियों में सौंदर्यबोध, संघर्षबोध है । शब्द की विपुलता से ही जीवन की विपुलता का बोध होता है जो अज्ञेय में सर्वाधिक है। अज्ञेय हिंदी के अंतिम प्रकृतिपरक बौद्धिक कवि हैं। शब्द की विपुलता से ही जीवन की विपुलता का बोध होता है और यह अज्ञेय में सर्वाधिक है। नागार्जुन का शिल्प अभिधात्मक है। वे सामान्य जीवन के कवि हैं। नागार्जुन को पश्चिमी सभ्यता के क्रिटीक के रूप में पढ़ा जा सकता है। चारों कवि बंधे-बंधाए उत्तरों को अस्वीकार करते हैं। इन चारों कवियों में शिल्प की अपार विविधता है जबकि आज की अधिकांश कविता अखबारी है।

विशिष्ट अतिथि विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा - इन कवियों की राजनतिक समझ को स्वातंत्र्य प्रेम की नज़र से भी देखा जाए क्योंकि ये चारो कवि स्वाधीनता काल के कवि हैं। उन्होंने पाब्लो नेरूदा का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन कवियों ने राजनीतिपरक रचनाएं की हैं उन्होंने प्रेम पर भी खूब लिखा है। केदार और नागार्जुन को इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। आज ग्लोबल बाजारवाद के चक्कर में ग्लोबल संवेदना को केंद्र में रखकर लिखा जा रहा है। अज्ञेय की निजता एक ऐतिहासिक जरूरत थी।’
प्राचार्य डॉ0 इंद्रजीत ने अतिथियों का स्वागत एवं धन्यवाद किया और संगोष्ठी को ऐतिहासिक बताते हुए कहा - आज जिस संगोष्ठी का उद्घाटन होने जा रहा है, वह आप सबकी उपस्थिति से एक ऐतिहासिक अवसर बन गया है। अज्ञेय, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और शमशेर बहादुर सिंह का यह शताब्दी वर्ष है। इस वर्ष पूरे भारत में अनेक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं । आज का कार्यक्रम उसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी कहा जा सकता है। उद्घाटन सत्र के आरंभ में संगोष्ठी के संयोजक डॉ0 प्रेम जनमेजय ने प्रस्तावित विषय के संबंध में विस्तार से बताया एवं आज के समय में जब कविता अन्य विधाओं के संदर्भ में छूटती जा रही है, ऐसे में अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन और केदार की कविता हमारे आज के समय को क्या संबल देती है।

उद्घाटन सत्र में प्रेम जनमेजय द्वारा संपादित पुस्तक ‘श्रीलाल शुक्लः विचार विश्लेषण एवं जीवन’ का लोकार्पण भी किया गया।

संगोष्ठी का पहला सत्र केदारनाथ अग्रवाल पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता डॉ0 नित्यानंद तिवारी ने की तथा मुख्य अतिथि थे डॉ0 खगेंद्र ठाकुर। इस सत्र में डॉ0 बली सिंह, डॉ0 द्वारिकाप्रसाद चारुमित्र एवं डॉ0 विनय विश्वास ने अपने आलेख पढ़ें। डॉ0 नित्यानंद तिवारी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा- हम इस पूंजीवादी सभ्यता में अनुकूलित हो जाना चाहते हैं या अपनी मानवीय भूमिका निभाना चाहते हैं, यह निर्णय हमें ही करना है। रामविलास शर्मा ने केदार को कामचेतना के आंचलिक कवि कहा है जिसमें उन्होंने स्थानीय तस्वीर पैदा कर दी है। चारों कवियों के पास मनुष्य के रूप हैं चाहे अलग-अलग रूप में हों। आज के युग में मनुष्य सूचनाओं का मात्रा यंत्र हो गया है।’ तिवारी जी ने केदार की दो कविताओं ‘न घटा जो यहां कभी पहले’ और ‘अब’ कविताओं के संदर्भ में कहा कि केदार जी के यहां सही मनुष्य की उपस्थिति है। मुख्य अतिथि खगेंद्र ठाकुर ने कहा - आज के युग में पूंजीवाद को मनुष्य की मनुष्य के रूप में जरूरत नहीं है, उसकी जरूरत है तो खरीददार के रूप में। राजनीति सिर्फ पार्टीबाजी में नहीं अन्य चीजों में भी देखी जा सकती है। केदार की फुटकल कविताओं में मनुष्य के संघर्षों का जो रूप है वह महामानव का रूप दिखाता है। केदार के यहों प्रकृति की अनेक ऐसी कविताएं हैं जो छायावाद से भी अच्छी हैं। आज का समाज यदि हमंे अच्छा नहीं लगता है तो केदार प्रासंगिक कवि हैं। डॉ0 बलीसिंह ने कहा- केदार व्यक्ति को महत्व देते हैं, उसकी आईडेंटीटी को महत्व देते हैं। केदार ने न केवल नदी में सौंदर्य देखा अपितु नाले में भी सौंदर्य देखा और उसे काव्य का विषय बनाया।’ डॉ0 द्वारिकाप्रसाद चारुमित्रा ने कहा - अज्ञेय को छोड़कर सभी कवि जनपद के कवि के परिचायक लेते हैं। नागार्जुन और केदार में विद्यापति की प्रेरणा बोलती है और उनकी कविताओं में सास्कृतिक आवाज बोलती है। केदार की कविता की कविता मानव की कविता है। उनकी कविता अमानवीय संसार में इंसानियत की खोज की कविता है।’ डॉ0 विनय विश्वास ने कहा - अशोक वाजपेयी ने जो कहा कि अज्ञेय प्रकृति के अंतिम कवि है, इससे मैं सहमत नहीं। केदार की कविताएं प्रकृति के हर रंग को उकेरती हैं। केदार की कविताओं में ‘ध्ूप’ पर लिखा बहुत कुछ मिलता है।’ विनय विश्वास ने केदार की अनेक प्रकृतिपरक कविताओं को प्रस्तुत किया। सत्र का संचालन डॉ0 रत्नावली कौशिक ने किया।

संगोष्ठी का दूसरा सत्र नागार्जुन पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता प्रो0 गोपश्वर सिंह ने की तथा मुख्य अतिथि थे डॉ0 विजय बहादुर सिंह। अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रो0 गोपेश्वर सिंह ने कहा- नागार्जुन मुक्तिकामी कवि हैं। वे बड़े रेंज के कवि हैं। इनकी काव्य विशाल भूमि है तथा इनमें छंदों और काव्य रूपों की बहुलता है। प्रश्नाकुलता यदि आध्ुनिकता का लक्षण है तो नागार्जुन आधुनिकता के कवि हैं। मनुष्य की मानवीयता में विश्वास ही आधुनिकता की सर्वोत्तम कसौटी है। नागार्जुन भावुकता के नहीं आवेग के कवि हैं। नागार्जुन काव्य की बारिकियों के लिए हलकान रहने वाले कवि नहीं हैं। अज्ञेय नागर रुचि के कवि है तो नगार्जुन बोली के कवि हैं। दिनकर और बच्चन के बाद नागार्जुन ऐसे कवि हैं जिनको आनंद से पढ़ा जा सकता है। ‘नई कविता’ के महल में सेंध लगाने वाली कविता नागार्जुन की है।’ मुख्य अतिथि डॉ0 विजय बहादुर सिंह ने कहा - कविता की प्रासंगिकता समाज में मनुष्य के बचे रहने की प्रासंगिकता है। मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के लिए कविता लिखना और चर्चित होने के लिए कविता लिखना दो अलग- अलग बातें हैं। बहुत लोग लिखना जानते हैं पर नहीं जानते कि लिखना क्या है। साहित्य को कला समझने वाले नागार्जुन की कविता को समझ नहीं सकते हैं। प्रेमचंद, नागार्जुन खेतिहर समाज के रचनाकार हैं। नागार्जुन जनता के पक्ष में उसी की भाषा में लिखने वाले कवि हैं। नागार्जुन और निराला समान संवेदना के कवि है। डॉ0 अनामिका ने ‘नागार्जुन के काव्य में स्त्री-पक्ष’ पर बोलते हुए कहा -नागार्जुन ने अपने साक्षात्कारों में कम-से- कम पांच वर्ष के लिए अपने स्त्री बन जाने की इच्छा का जिक्र किया है। बाबा स्त्रियों के दोस्त बन गए थे और उनकी रसोईघर में उनका आना जाना था। नागार्जुन ने प्रतिबद्ध कविताएं लिखीं।राधेश्याम तिवारी ने कहा- नागार्जुन ने ज्ञानात्मक संवेदना वाली कविता का महत्व बताया, न कि ज्ञान से लिखी कविताओं का। नागार्जुन की कविताओं में बौद्धिकता का आतंक नहीं है। जो बौद्धिक कविताएं लिखते हैं वे अपने समय से तो कटते ही हैं, बाद के समय से भी कट जाते हैं। बचे रहेंगे शब्द और बची रहेगी संवेदनाए।’ डॉ0 बागेश्री चक्रधर ने नागार्जुन को बौद्ध धर्म से मिली प्रेरणा की चर्चा करते हुए कहा - नागार्जुन पर सिद्धों-नाथों जैसी जीवन-प्रणाली का प्रभाव था। उन्होंने विचारधाराओं से अनुभव तक की यात्रा की।’ बागेश्री चक्रध्र ने बाबा नागार्जुन से जुड़े अनेक रोचक संस्मरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि बाबा मानते थे कि पेट से बड़ा कोई आंदोलनकारी नही होता और बाबा दूसरी विचारधारा के लोगों से भी संवाद करते थे। डॉ0 हरीश नवल ने नागार्जुन से जुड़े अनेक रोचक संस्मरण सुनाते हुए कहा- वे सही अर्थों में जनकवि थे। उनके साथ गुजरे हुए मेरे और मेरे दादा जी के क्षण मेरे लिए अविस्मरणीय हैं। इस सत्रा का संचालन डॉ0 वीनू भल्ला ने किया ।

संगोष्ठी का तीसरा सत्र अज्ञेय पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता श्री ओम थानवी ने की तथा मुख्य अतिथि थे डॉ0 कृष्णदत्त पालीवाल । अपने अध्यक्षीय भाषण में ओम थानवी नेकहा- अज्ञेय एक बड़े कवि थे जिनका मूल्यांकन करते समय अक्सर उनके व्यक्तित्व से जुड़े हुए संदर्भों को आधर बना लिया जाता है। प्रेम जनमेजय ने सही सवाल उठाया है कि रचनाकार के व्यक्तित्व को क्या साहित्यकार के रचनाकर्म की कसौटी माना जाए। अब अज्ञेय पर सी आई ए का एजेंट होने से लेकर उनके दंभी व्यक्तित्व को लेकर अनेक आरोप लगाए जाते है। इस आधर पर क्या अज्ञेय के साहित्य को खारिज कर दिया जाए। आप जितनी देर शेक्सपीयर की रचना को पढ़ते हैं उतनी देर शेक्सपीयर के रचना संसार में खो जाते हैं, न कि उनके व्यक्तिगत जीवन में खोते हैं। साहित्य की आलोचना करने का अपना ये ‘व्यक्तिवादी ’ दृष्टिकोण हम न जाने कब बदलेंगे?’ मुख्य अतिथि डॉ0 कृष्णदत्त पालीवाल ने कहा - अज्ञेय की अब तक सही आलोचना नहीं हुई है। नददुलारे वाजपेयी ने जो आक्षेप लगाए वे तर्क की विकृति कहे जाएंगे। डॉ0 नगेंद्र ने रस सिद्धांत के आधर पर आलोचन की जो कि विडंबनापूर्ण था। रामविलास शर्मा ने अज्ञेय की कविता को जड़ाउफ, कड़ाउफ आदि बताया जो कि निराधर था। नामवर सिंह ने अज्ञेय को व्यक्तिवादी और कलावादी कहा, ‘कविता के प्रतिमान’ के द्वारा अज्ञेय की नाक पर घूसंा जड़ा। अज्ञेय को टी एस इ।लियट, डी एच लॉरेंस आदि से तुलना करने वाले झूठे हैं। अज्ञेय की तुलना यदि किसी से हो सकती है तो वे हैं प्रसाद। हिंदी आलोचना ने अज्ञेय के साथ न्याय नहीं किया है। अज्ञेय पर नए ढंग से सोचा जाना चाहिए।’ डॉ0 प्रेम जनमेजय ने अज्ञेय की व्यंग्य चेतना पर बोलते हुए कहा- नागार्जुन, केदार और अज्ञेय पर हुई बातचीत में हम देख रहे हैं कि व्यक्तित्व को कवियों के रचनाकर्म की कसौटी माना जा रहा है। क्या रचनाकार के व्यक्तित्व को उसकी कसौटी माना जा सकता है? अज्ञेय विसंगतियों पर प्रखर प्रहार करने वाले रचनाकार हैं। आधुनिक व्यंग्य का चेहरा अज्ञेय के व्यक्तित्व जैसा-- सौम्य,धीर -गंभीर और स्मित हास्य वाला होना चाहिए जिसमें हंसी आए तो अनावश्यक न लगे।’ रमेश मेहता ने अज्ञेय पर बनी डाक्यूमेंटरी का प्रदर्शन करते हुए कहा -अज्ञेय मौन के कवि थे। वे बहुत ही व्यवस्थित व्यक्तित्व के स्वामी थे। पर जिस दंभ की उनके संबंध् में चर्चा होती है, वह मुझे उनमें कभी नहीं मिला।1983 में जम्मू में युवा कवियों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था कि जिसे छंद का ज्ञान होगा वही तो मुक्त छंद की कविता लिख पाएगा। डॉ0 अवनिजेश अवस्थी ने कहा- अज्ञेय के संबंध् में अध्ूरी आलोचनाएं की जा रही हैं। अज्ञेय को आजतक एक ही चश्मे से देखा गया है। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य को ऐतिहासिक योगदान दिया है। डॉ0 अर्चना वर्मा ने ‘अज्ञेय के भाषिक रहस्यवाद’ पर अपना आलेख पढ़ा। डॉ0 वीनू भल्ला ने अज्ञेय से जुड़े संस्मरण के साथ-साथ अज्ञेय के साहित्यिक अवदान की भी चर्चा की। कार्यक्रम का संचालन विनय विश्वास ने किया।

संगोष्ठी का चौथ सत्र शमशेर बहादुर सिंह पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता डॉ0 हरिमोहन शर्मा ने की । सत्र के अध्यक्ष डॉ0 हरिमोहन शर्मा ने कहा - शमशेर में एक जैनुअन आदमी बनने की चाहत थी। आलोचक किसी रचनाकार को एक कठघरे में बांधकर सरल मार्ग अपना लेते हैं। इससे कवि की विचारधरा जानकर उसी फ्रेम में कवि के काव्य-कर्म की व्याख्या कर ली जाती है। शमशेर ने न केवल कविता की भाषा सीखी अपितु अपने मामा से रंगों की भाषा भी सीखी। वे खूब पढ़ने वाले रचनाकार थे जो साहित्य के माध््यम से जीवन की लय को स्वयं में जब्त कर लिया करते थे।’ डॉ0 हरिमोहन ने शमशेर की ‘बैल’ कविता के माध्यम से उनके का्रपफट और विचार को व्याख्यायित किया। डॉ0 दिविक रमेश ने कहा- शमशेर प्रेम के पीछे पड़ने वाले नही, उसपर रीझने वाले कवि हैं। शमशेर जनता के हित में काम करने वाले कवि हैं। शमशेर का क्रापफट सबसे अलग है। डॉ0 अजय नावरिया ने कहा - शमशेर काल से होड़ की शक्ति रखते हैं, जबकि सुविधसंपन्न लोग कतरा कर निकल जाते है। शमशेर ने कहा था कि मुझे अमेरिका का स्टेच्यू ऑपफ लिबर्टी भी उतना ही प्यारा है जितना रूस का लालतारा। यानि शमशेर आजादी को स्पेस देते हैं। कला का संघर्ष समाज के संघर्ष से अलग की चीज नहीं हो सकता है। शमशेर और नागार्जुन, दोनो ने, बात को हथियाद माना है।’ भारत भारद्वाज ने कहा- शमशेर का साहित्यिक व्यक्तित्व एक कवि का है पर उन्होने ‘चांद का मुह टेढ़ा’ है की भूमिका के रूप में जो गद्य लिख है वह अद्भुत है। शमशेर की काव्य-पंक्तियां अपने समय में ही मुहावरा बन गई थंी। अज्ञेय ही नहीं शमशेर की कविता में भी सन्नाटा और मौन है। डॉ0 हेमंत कुकरेती ने कहा - आज प्रेम कामकाजी कुटीर उद्योग बन गया है जिसमें निजीपन नहीं रह गया है किंतु शमशेर में यह निजीपन मिलता है। उनके यहां प्रेम निरा शरीरिक नहीं है।’
अंत में प्रेम जनमेजय ने चारों सत्रों में चर्चित मुद्दों की संक्षिप्त रिपोर्ट प्रस्तुत की तथा प्रचार्य डॉ0 इंदजीत ने सभी का आभार व्यक्त किया।


प्रस्तुति: शशिभूषण
114 ई, ब्रह्मपुत्र छात्रावास, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली।

Thursday, January 27, 2011

जनवरी 2011 की 'डॉयलॉग' गोष्ठी का आमंत्रण

आगामी 29 जनवरी 2011 की शाम 5 बजे से "अकेदमी ऑफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर" के 'म्यूजियम हॉल' में 'डॉयलॉग' (काव्यगोष्ठी) में आप सादर आमंत्रित हैं। काव्यसंध्या का यह कार्यक्रम महीने के आखिरी शनिवार को पिछले छत्तीस वर्षों से आयोजित हो रहा है। जनवरी माह के 'डॉयलॉग' में हिन्द-युग्म के कवियों को काव्यपाठ करने के लिए आमंत्रित किया गया है।

कार्यक्रम की रूपरेखा इस प्रकार है-

यह कार्यक्रम प्रसिद्ध कवि शमशेर बहादुर सिंह को समर्पित है। इनकी चुनी हुई कविताओं का पाठ कवि कृष्ण कल्पित करेंगे।

आमंत्रित कवि-

अवनीश गौतम, निखिल आनंद गिरि, मनु बेतखल्लुस, मुकुल उपाध्याय, सजीव सारथी, मनुज मेहता, प्रमोद कुमार तिवारी, आकांक्षा पारे और श्याम सुशील।

प्रसिद्ध कवि कुबेर दत्त कवियों के काव्यपाठ पर अपने विचार देंगे।

कार्यक्रम का संयोजन मिथिलेश श्रीवास्तव करेंगे।

दिन व समयः शनिवार, 29 जनवरी 2011, शाम 5 बजे।
स्थानः Academy of Fine Arts And Literature, 4/6 SIRI Fort Institutional Area, New Delhi-49

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें- मिथिलेश श्रीवास्तव, संयोजक, डॉयलॉग, मो. 9868628602, ईमेल- mithil_shri1@yahoo.co.in

कार्यक्रम में ज़रूर पधारें।

Friday, October 1, 2010

अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर व फैज़ अहमद फैज़ की जन्‍मशती पर 2 दिवसीय विमर्श कार्यक्रम कल से वर्धा में



1 अक्टूबर। वर्धा

म‍हात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में हिंदी के ऐतिहासिक महत्‍व के बड़े कवियों- अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर तथा उर्दू के विश्‍व विख्‍यात रचनाकार फैज़ अहमद फैज़ की जन्‍म शताब्‍दी तथा कवि रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की डेढ़ सौवीं जयंती के अवसर पर उनके साहित्‍य पर चिंतन मनन करने तथा उनके शताब्‍दीपरक मूल्‍यांकन के सन्दर्भ में गंभीर व दूरगामी विमर्श हेतु आयोजित शताब्‍दीसमारोह-शृंखला का उद्ट‍घाटन 2 अक्टूबर 2010 को हिंदी के मूर्धन्‍य साहित्‍यकार व विश्‍वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. नामवर सिं‍ह करेंगे।

कल पूर्वाह्न 11 बजे प्रारंभ होने वाले उद्ट‍घाटन सत्र की अध्‍यक्षता प्रो. निर्मला जैन करेंगी। कुलपति विभूति नारायण राय स्‍वागत वक्‍तव्‍य देंगे तथा प्रतिकुलपति प्रो.ए. अरविंदाक्षन धन्‍यवाद ज्ञापित करेंगे। साहित्‍य विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो. सूरज पालीवाल समारोह का संचालन करेंगे। इस अवसर पर विश्‍वविद्यालय के संग्रहालय की वेबसाइट http://archive.hindivishwa.org, जिसकी संकल्‍पना स्‍वयं कुलपति विभूति नारायण राय ने तैयार की है, का लोकार्पण प्रो. नामवर सिंह द्वारा किया जाएगा।

कल 2 अक्टूबर सायं अज्ञेय एवं केदारनाथ अग्रवाल के साहि‍त्यिक अवदान पर दो संगोष्ठियाँ आयोजित होंगी, जिनकी अध्‍यक्षता क्रमश: प्रो.गंगा प्रसाद विमल एवं प्रो. नित्‍यानन्‍द तिवारी करेंगे तथा प्रो. शंभुनाथ एवं प्रो. खगेन्‍द्र ठाकुर मुख्‍य वक्‍ता होंगे। इन संगोष्ठियों में वक्‍ताओं के रूप में अखिलेश, धीरेन्द्र अस्थाना, प्रो. बलराम तिवारी, राजकिशोर, प्रो. अजय तिवारी, बोधिसत्‍व, विमल कुमार, डॉ. कृपाशंकर चौबे, डॉ. रति सक्‍सेना, डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ. मीता शर्मा, विजय शर्मा, डॉ. कृपाशंकर चौबे, वसंत त्रिपाठी, नरेन्‍द्र पुण्‍डरीक, डॉ. वीणा दाढे, मनोज कुमार पाण्‍डेय तथा शशिभूषण भागीदारी करेंगे। इन सत्रों का संचालन डॉ. शंभु गुप्‍त तथा प्रो. संतोष भदौरिया करेंगे।

03 अक्‍टूबर को आयोजित तीन सत्रों में नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह तथा फैज़ अहमद फैज़ के कृतित्‍व एवं शताब्‍दीपरक महत्‍व पर अलग-अलग चर्चा होगी।

प्रात: 10 बजे नागार्जुन पर एकाग्र संगोष्‍ठी की अध्‍यक्षता प्रो. खगेन्द्र ठाकुर करेंगे तथा प्रो. विजेन्‍द्र नारायण सिंह मुख्‍य वक्‍ता होंगे। प्रो. गोपेश्‍वर सिंह, डॉ. नीरज सिंह, डॉ. राम आह्लाद चौधरी, प्रो.के.के. सिंह तथा अवधेश मिश्र वक्‍ता के रूप में अपने विचार रखेंगे। इस सत्र का संचालन प्रो. कृष्‍ण कुमार सिंह करेंगे। अपराह्न 12 बजे प्रारंभ होने वाले सत्र में शमशेर की रचना पर विमर्श होगा जिसकी अध्‍यक्षता अरूण कमल करेंगे। प्रो. रंजना अरगडे मुख्‍य वक्‍ता होंगी। उषा किरण खान, प्रो. माधव सोनटक्‍के, दिनेश कुमार शुक्‍ल, डॉ.विनोद तिवारी व डॉ. मीनाक्षी जोशी, वक्‍ता के रूप में उपस्थित रहेंगे। इस सत्र का संचालन राकेश मिश्र करेंगे।

अपराह्न 3 बजे फैज़ अहमद फैज़ पर केंद्रित सत्र का आगाज़ होगा जिसकी अध्‍यक्षता कवि आलोक धन्‍वा करेंगे। मुख्‍य वक्‍ता अली जावेद होंगे। दिनेश कुशवाह तथा कुछ अन्‍य साहित्‍यकार वक्‍ता होंगे। विश्‍वविद्यालय के विशेष कर्तव्‍या‍धिकारी राकेश सत्र का संचालन करेंगे।

2 अक्टूबर सायं गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित शताब्‍दी श्रृंखला के दौरान सांस्‍कृतिक संध्‍या कार्यक्रम में आमं‍त्रित कवियों का कविता पाठ तथा नागार्जुन की कविताओं पर बसंत त्रिपाठी के निर्देशन में नागपुर के कलाकार अपनी नाट्य प्रस्‍तुति देंगे।

प्रस्तुति- सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

Tuesday, July 27, 2010

अज्ञेय और शमशेर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

(द्वितीय प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह-2010 )
मधुरेश, ज्योतिष जोशी और डॉ.शोभाकांत झा का सम्मान


मधुरेश

जयोतिष जोशी
रायपुर। छत्तीसगढ़ की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा प्रेमचंद जयंती के अवसर पर देश के दो मूर्धन्य रचनाकार अज्ञेय और शमशेर की जन्मशताब्दी वर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जा रहा है। यह आयोजन 30-31 जुलाई, 2010 को होटल गोल्डन ट्यूलिप, व्ही.आई.पी.रोड किया जा रहा है जिसमें देश और राज्य के 200 से अधिक साहित्यकार भाग ले रहे हैं। समारोह की शुरूआत 30 जुलाई की शाम 7 बजे राष्ट्रीय कविता पाठ से होगी जिसमें देश के प्रतिष्ठित कवि- सर्वश्री नंदकिशोर आचार्य (जयपुर), दिविक रमेश (दिल्ली), अष्टभुजा शक्ल (बस्ती), बुद्धिनाथ मिश्र (देहरादून), श्रीप्रकाश मिश्र (इलाहाबाद), नरेंद्र पुंडरीक (बांदा), रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति (भोपाल), प्रेमशंकर रघुवंशी (हरदा), अनिल विभाकर(रायपुर), रति सक्सेना (त्रिवेन्द्रम), सुधीर सक्सेना (दिल्ली), राकेश श्रीमाल (वर्धा), श्री अरुण शीतांश (आरा), संतोष श्रेयांश(आरा), शशांक (बक्सर), कुमुद अधिकारी (नेपाल), कुमार नयन (बक्सर), जयशंकर बाबु (आंध्रप्रदेश)आदि अपनी श्रेष्ठ कविताओं का पाठ करेंगे। अध्यक्षता करेंगे जाने माने आलोचक डॉ. धनंजय वर्मा। मुख्य अतिथि होंगे - डॉ. गंगा प्रसाद विमल और विशिष्ट अतिथि के तौर पर मौजूद रहेंगे श्री मधुरेश, प्रभुनाथ आजमी आदि।

संस्थान के कार्यकारी निदेशक जयप्रकाश मानस ने बताया है कि 31 जुलाई, 2010 9 बजे प्रातः द्वितीय प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान-2010 से प्रमुख कथाआलोचक श्री मधुरेश और युवा आलोचक ज्योतिष जोशी को सम्मानित किया किया जायेगा । इसके पूर्व गत वर्ष श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन जैसे आलोचकों को इस सम्मान से नवाजा जा चुका है । इस सम्मान के अंतर्गत 21, 11 व 7 हजार रुपये, प्रतीक चिन्ह, सम्मान पत्र आदि से सम्मानित किया जाता है। इस अवसर पर राज्य स्तरीय प्रमोद वर्मा रचना सम्मान से हिन्दी के पूर्णकालिक ललित निबंध लेखन के लिए डॉ. शोभाकांत झा को भी अंलकृत किया जायेगा। इस अवसर पर राज्य से प्रकाशित होने वाली संपूर्ण त्रैमासिक पत्रिका पांडुलपि के प्रवेशांक (प्रधान संपादक- अशोक सिंघई), कठिन प्रस्तर में अगिन सुराख (विश्वरंजन), ठंडी धुली सुनहरी धूप (विश्वरंजन), शिलाओं पर तराशे मज़मून (डॉ. धनंजय वर्मा पर एकाग्र) छत्तीसगढ़ की कविता(डॉ. बलदेव), मीडिया : नये दौर, नयी चुनौतियाँ (संजय द्विवेदी, भोपाल) चाँदनी थी द्वार पर ( सुरेश पंड़ा), पक्षी-वास (मूल उडिया उपन्यास–सरोजिनी साहू, अनुवाद– दिनेश माली, उड़ीसा), झरोखा (पंकज त्रिवेदी, अहमदाबाद),विष्णु की पाती – राम के नाम (विष्णु प्रभाकर के पत्र- जयप्रकाश मानस), कहानी जो मैं नहीं लिख पायी ( श्री कुमुद अधिकारी, नेपाल), 11 किताबें (डॉ. के. के. झा, बस्तर), पत्रिका देशज (अरुण शीतांश, बिहार), ये है इंडिया मेरी जान (युक्ता राजश्री) आदि का विमोचन भी किया जायेगा।

31 जुलाई को 11 बजे ‘अज्ञेय की शास्त्रीयता’ विषय पर राष्ट्रीय विमर्श होगा जिसमें डॉ. कमल कुमार-दिल्ली डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी-सागर, श्री बजरंग बिहारी-दिल्ली, डॉ.देवेन्द्र दीपक-भोपाल, डॉ. रति सक्सेना-त्रिवेन्द्रम, डॉ. सुशील त्रिवेदी-रायपुर, श्री बुद्धिनाथ मिश्र-देहरादून, श्री महेन्द्र गगन-भोपाल, श्री प्रकाश त्रिपाठी-इलाहाबाद, श्री माताचरण मिश्र-भोपाल, श्री संतोष श्रेयांस-आरा अपना वक्तव्य देंगे। अध्यक्ष मंडल में होगें- श्री नंदकिशोर आचार्य-जयपुर, श्री गंगाप्रसाद विमल-दिल्ली, डॉ. दिविक रमेश-दिल्ली, डॉ. धनंजय वर्मा-भोपाल आदि। इसी तरह उसी दिन 3 बजे शमशेर का कविता संसार पर विमर्श में वक्ता के रूप में डॉ. रोहिताश्व-गोवा, श्री राकेश श्रीमाल-वर्धा, श्री प्रभुनाथ आजमी-भोपाल, श्री ज्योतिष जोशी-दिल्ली, श्री नरेन्द्र पुंडरीक-बांदा, डॉ. शिवनारायण-पटना, संतोष श्रीवास्तव-मुंबई श्री दिवाकर भट्ट-हलद्वानी,श्री मुकेश वर्मा-उज्जैन, श्री कुमार नयन-बक्सर, श्री राजेन्द्र उपाध्याय-दिल्ली, श्री रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति-भोपाल, डॉ. कमलेश-इलाहाबाद, डॉ. सुधीर सक्सेना-दिल्ली, अध्यक्ष मंडल में होंगे- डॉ. धंनजय वर्मा-भोपाल, श्री मधुरेश-कानपुर, श्री खगेन्द्र ठाकुर-पटना, श्री त्रिभुवन नाथ शुक्ल-भोपाल आदि। इस अवसर पर टैगोर, शमशेर, अज्ञेय, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एवं प्रमोद वर्मा की कविताओं की प्रदर्शनी भी आयोजित की जा रही है।