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Wednesday, September 29, 2010

नवोदित रचनाकारों और ब्लॉगरों के लिए कार्यशाला हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित

सृजनात्मक लेखन कार्यशाला हेतु ब्लॉगरों से प्रविष्टि आमंत्रित

रायपुर। रचनाकारों की संस्था, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, रायपुर, छत्तीसगढ़ द्वारा देश के उभरते हुए कवियों/लेखकों/निबंधकारों/कथाकारों/लघुकथाकारों/ब्लॉगरों को देश के विशिष्ट और वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा साहित्य के मूलभूत सिद्धातों, विधागत विशेषताओं, परंपरा, विकास और समकालीन प्रवृत्तियों से परिचित कराने, उनमें संवेदना और अभिव्यक्ति कौशल को विकसित करने, प्रजातांत्रिक और शाश्वत जीवन मूल्यों के प्रति उन्मुखीकरण तथा स्थापित लेखक तथा उनके रचनाधर्मिता से तादात्मय स्थापित कराने के लिए अ.भा.त्रिदिवसीय (13, 14, 15 नवंबर, 2010) सृजनात्मक लेखन कार्यशाला का आयोजन बिलासपुर में किया जा रहा है । इस अखिल भारतीय स्तर के कार्यशाला में देश के 75 नवोदित/युवा रचनाकारों को सम्मिलित किया जायेगा।

संक्षिप्त ब्यौरा निम्नानुसार है-

प्रतिभागियों को 20 अक्टूबर, 2010 तक अनिवार्यतः निःशुल्क पंजीयन कराना होगा। पंजीयन फ़ार्म संलग्न है।
प्रतिभागियों का अंतिम चयन पंजीकरण में प्राप्त आवेदन पत्र के क्रम से होगा।
पंजीकृत एवं कार्यशाला में सम्मिलित किये जाने वाले रचनाकारों का नाम ई-मेल से सूचित किया जायेगा।
प्रतिभागियों की आयु 18 वर्ष से कम एवं 40 वर्ष से अधिक ना हो।
प्रतिभागियों में 5 स्थान हिन्दी के स्तरीय ब्लॉगर के लिए सुरक्षित रखा गया है।
प्रतिभागियों को संस्थान/कार्यशाला में एक स्वयंसेवी रचनाकार की भाँति, समय-सारिणी के अनुसार अनुशासनबद्ध होकर कार्यशाला में भाग लेना अनिवार्य होगा।
प्रतिभागी रचनाकारों को प्रतिदिन दिये गये विषय पर लेखन-अभ्यास करना होगा जिसमें वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा मार्गदर्शन दिया जायेगा।
कार्यशाला के सभी निर्धारित नियमों का आवश्यक रूप से पालन करना होगा।
प्रतिभागियों को सैद्धांतिक विषयों के प्रत्येक सत्र में भाग लेना अनिवार्य होगा। अपनी वांछित विधा विशेष के सत्र में वे अपनी इच्छानुसार भाग ले सकते हैं।
प्रतिभागियों के आवास, भोजन, स्वल्पाहार, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह की व्यवस्था संस्थान द्वारा किया जायेगा।
प्रतिभागियों को कार्यशाला में संदर्भ सामग्री दी जायेगी।
प्रतिभागियों को अपना यात्रा-व्यय स्वयं वहन करना होगा।
प्रतिभागियों को 12 नवंबर, 2010 शाम 5 बजे के पूर्व कार्यशाला स्थल - बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में अनिवार्यतः उपस्थित होना होगा। पंजीकृत/चयनित प्रतिभागी लेखकों को कार्यशाला स्थल (होटल) की जानकारी, संपर्क सूत्र आदि की सम्यक जानकारी पंजीयन पश्चात दी जायेगी।

प्रस्तावित/संभावित विषय एवं विशेषज्ञ लेखक

दिनाँक 13 नवंबर, 2010
रचना की दुनिया – दुनिया की रचना – श्री चंद्रकांत देवताले – विश्वनाथ प्रसाद तिवारी – प्रभाकर श्रोत्रिय
रचना में यथार्थ और कल्पना – श्री राजेन्द्र यादव – नीलाभ – केदारनाथ सिंह
रचना और प्रजातंत्र – श्री अखिलेश – रघुवंशमणि – परमानंद श्रीवास्तव
रचना और भारतीयता – श्री नंदकिशोर आचार्य – श्री अरविंद त्रिपाठी – विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
रचना : महिला, दलित और आदिवासी –– सुश्री अनामिका - कात्यायनी - मोहनदास नैमिशारण्य
रचना और मनुष्यता के नये संकट - श्री विनोद शाही- श्रीप्रकाश मिश्र – सीताकांत महापात्र

दिनाँक 14 नवंबर, 2010
रचना और संप्रेषण – श्री कृष्ण मोहन – ज्योतिष जोशी – मधुरेश
शब्द, समय और संवेदना – श्री नंद भारद्वाज - श्रीभगवान सिंह – ए.अरविंदाक्षन
कविता की अद्यतन यात्रा – श्री वीरेन्द्र डंगवाल – ओम भारती - अशोक बाजपेयी
कविता - छंद और लय – श्री दिनेश शुक्ल – राजेन्द्र गौतम – डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
कैसा गीत कैसे पाठक ? - श्री राजगोपाल सिंह – यश मालवीय – माहेश्वर तिवारी
कहानी-विषयवस्तु, भाषा, शिल्प – श्री शशांक – डॉ. परदेशीराम वर्मा – गोविन्द मिश्र

दिनाँक 15 नवंबर, 2010
कहानी की पहचान – सुश्री उर्मिला शिरीष - सूरज प्रकाश – सतीश जायसवाल
लघुकथा क्या ? लघुकथा क्या नहीं ? – श्री अशोक भाटिया – फ़ज़ल इमाम मल्लिक - बलराम
आलोचना क्यों, आलोचना कैसी? श्री शंभुनाथ – डॉ. रोहिताश्व - विजय बहादुर सिंह
ललित निबंध : कितना ललित-कितना निबंध – श्री नर्मदा प्रसाद उपा.-अष्टभुजा शुक्ल – डॉ.श्रीराम परिहार

(अंतिम नाम निर्धारण स्वीकृति/अस्वीकृति उपरांत)

संपर्क सूत्र

जयप्रकाश मानस

कार्यकारी निदेशक
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ – 492001
ई-मेल-pandulipipatrika@gmail.com
मो.-94241-82664
बिलासपुर
श्री सुरेन्द्र वर्मा, मो.-94255-70751
श्री राजेश सोंथलिया, 9893048220

पंजीयन हेतु आवेदन पत्र फार्म नमूना

01. नाम -
02. जन्म तिथि व स्थान (हायर सेंकेंडरी सर्टिफिकेट के अनुसार) -
03. शैक्षणिक योग्यता –
04. वर्तमान व्यवसाय -
05. प्रकाशन (पत्र-पत्रिकाओं के नाम) –
06. प्रकाशित कृति का नाम –
07. ब्लॉग्स का यूआरएल – (यदि हो तो)
08. अन्य विवरण ( संक्षिप्त में लिखें)
09. पत्र-व्यवहार का संपूर्ण पता (ई-मेल सहित) –
हस्ताक्षर

Thursday, August 5, 2010

पंकज त्रिवेदी के निबंध संग्रह 'झरोखा' का विमोचन संपन्न


पंकज त्रिवेदी के निबंध संग्रह "झरोखा" का विमोचन करते कार्यक्रम अध्यक्ष और आलोचक श्री धनंजय वर्मा, श्री नंदकिशोर आचार्य और कार्यक्रम के मुख्य आयोजक, साहित्यकार व छत्तीसगढ़ के डी.जी.पी. विश्वरंजन। विमोचन करा रहे पंकज त्रिवेदी। साथ हैं जानीमानी पत्रकार और साहित्यकार जया केतकी

रायपुर।
छत्तीसगढ़ की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा प्रेमचंद जयंती के अवसर पर देश के दो मूर्धन्य रचनाकार अज्ञेय और शमशेर पर राष्ट्रीय संगोष्ठि का आयोजन किया। 2 दिन चले इस कार्यक्रम में दुनिया भर के 200 से अधिक साहित्यकारों ने भाग लिया। एक राष्ट्रीय कवि संध्या का भी आयोजन किया।

इसी कार्यक्रम में बहुत सी किताबों का लोकार्पण भी हुआ, जिनमें हिन्द-युग्म द्वारा प्रकाशित पंकज त्रिवेदी के ललित निबंधों के संग्रह 'झरोखा'का विमोचन भी शामिल है। पंकज त्रिवेदी की पुस्तक 'झरोखा' में कुल 25 ललित निबंध हैं। पंकज त्रिवेदी मूल रूप से गुजराती भाषा के लेखक हैं। इस पुस्तक में बहुत से निबंध पहले गुजारती में ही लिखे गये, बाद में पंकज ने खुद ही हिन्दी में अनुवाद किया। पुस्तक के शीर्षक के ही नाम का एक स्तम्भ 'सृजनगाथा' पत्रिका में लगातार प्रकाशित होता है, जिसमें पंकज त्रिवेदी के ललित निबंध प्रकाशित होते हैं। इस पुस्तक में सम्मिलित निबंध सृजनगाथा पर प्रकाशित हैं।




इसी अवसर पर दिनेश कुमार माली द्वारा अनूदित उपन्यास "पक्षी-वास" (मूल उडिया उपन्यास–सरोजिनी साहू) का भी विमोचन हुआ। विमोचन श्री नंदकिशोर आचार्य-जयपुर, डॉ. दिविक रमेश-दिल्ली, डॉ. धनंजय वर्मा-भोपाल, श्री ज्योतिष जोशी-दिल्ली, श्री मधुरेश-कानपुर, श्री त्रिभुवन नाथ शुक्ल-भोपाल, छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक एवं कवि विश्वरंजन के कर कमलों द्वारा हुआ।

Tuesday, July 27, 2010

अज्ञेय और शमशेर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

(द्वितीय प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह-2010 )
मधुरेश, ज्योतिष जोशी और डॉ.शोभाकांत झा का सम्मान


मधुरेश

जयोतिष जोशी
रायपुर। छत्तीसगढ़ की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा प्रेमचंद जयंती के अवसर पर देश के दो मूर्धन्य रचनाकार अज्ञेय और शमशेर की जन्मशताब्दी वर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जा रहा है। यह आयोजन 30-31 जुलाई, 2010 को होटल गोल्डन ट्यूलिप, व्ही.आई.पी.रोड किया जा रहा है जिसमें देश और राज्य के 200 से अधिक साहित्यकार भाग ले रहे हैं। समारोह की शुरूआत 30 जुलाई की शाम 7 बजे राष्ट्रीय कविता पाठ से होगी जिसमें देश के प्रतिष्ठित कवि- सर्वश्री नंदकिशोर आचार्य (जयपुर), दिविक रमेश (दिल्ली), अष्टभुजा शक्ल (बस्ती), बुद्धिनाथ मिश्र (देहरादून), श्रीप्रकाश मिश्र (इलाहाबाद), नरेंद्र पुंडरीक (बांदा), रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति (भोपाल), प्रेमशंकर रघुवंशी (हरदा), अनिल विभाकर(रायपुर), रति सक्सेना (त्रिवेन्द्रम), सुधीर सक्सेना (दिल्ली), राकेश श्रीमाल (वर्धा), श्री अरुण शीतांश (आरा), संतोष श्रेयांश(आरा), शशांक (बक्सर), कुमुद अधिकारी (नेपाल), कुमार नयन (बक्सर), जयशंकर बाबु (आंध्रप्रदेश)आदि अपनी श्रेष्ठ कविताओं का पाठ करेंगे। अध्यक्षता करेंगे जाने माने आलोचक डॉ. धनंजय वर्मा। मुख्य अतिथि होंगे - डॉ. गंगा प्रसाद विमल और विशिष्ट अतिथि के तौर पर मौजूद रहेंगे श्री मधुरेश, प्रभुनाथ आजमी आदि।

संस्थान के कार्यकारी निदेशक जयप्रकाश मानस ने बताया है कि 31 जुलाई, 2010 9 बजे प्रातः द्वितीय प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान-2010 से प्रमुख कथाआलोचक श्री मधुरेश और युवा आलोचक ज्योतिष जोशी को सम्मानित किया किया जायेगा । इसके पूर्व गत वर्ष श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन जैसे आलोचकों को इस सम्मान से नवाजा जा चुका है । इस सम्मान के अंतर्गत 21, 11 व 7 हजार रुपये, प्रतीक चिन्ह, सम्मान पत्र आदि से सम्मानित किया जाता है। इस अवसर पर राज्य स्तरीय प्रमोद वर्मा रचना सम्मान से हिन्दी के पूर्णकालिक ललित निबंध लेखन के लिए डॉ. शोभाकांत झा को भी अंलकृत किया जायेगा। इस अवसर पर राज्य से प्रकाशित होने वाली संपूर्ण त्रैमासिक पत्रिका पांडुलपि के प्रवेशांक (प्रधान संपादक- अशोक सिंघई), कठिन प्रस्तर में अगिन सुराख (विश्वरंजन), ठंडी धुली सुनहरी धूप (विश्वरंजन), शिलाओं पर तराशे मज़मून (डॉ. धनंजय वर्मा पर एकाग्र) छत्तीसगढ़ की कविता(डॉ. बलदेव), मीडिया : नये दौर, नयी चुनौतियाँ (संजय द्विवेदी, भोपाल) चाँदनी थी द्वार पर ( सुरेश पंड़ा), पक्षी-वास (मूल उडिया उपन्यास–सरोजिनी साहू, अनुवाद– दिनेश माली, उड़ीसा), झरोखा (पंकज त्रिवेदी, अहमदाबाद),विष्णु की पाती – राम के नाम (विष्णु प्रभाकर के पत्र- जयप्रकाश मानस), कहानी जो मैं नहीं लिख पायी ( श्री कुमुद अधिकारी, नेपाल), 11 किताबें (डॉ. के. के. झा, बस्तर), पत्रिका देशज (अरुण शीतांश, बिहार), ये है इंडिया मेरी जान (युक्ता राजश्री) आदि का विमोचन भी किया जायेगा।

31 जुलाई को 11 बजे ‘अज्ञेय की शास्त्रीयता’ विषय पर राष्ट्रीय विमर्श होगा जिसमें डॉ. कमल कुमार-दिल्ली डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी-सागर, श्री बजरंग बिहारी-दिल्ली, डॉ.देवेन्द्र दीपक-भोपाल, डॉ. रति सक्सेना-त्रिवेन्द्रम, डॉ. सुशील त्रिवेदी-रायपुर, श्री बुद्धिनाथ मिश्र-देहरादून, श्री महेन्द्र गगन-भोपाल, श्री प्रकाश त्रिपाठी-इलाहाबाद, श्री माताचरण मिश्र-भोपाल, श्री संतोष श्रेयांस-आरा अपना वक्तव्य देंगे। अध्यक्ष मंडल में होगें- श्री नंदकिशोर आचार्य-जयपुर, श्री गंगाप्रसाद विमल-दिल्ली, डॉ. दिविक रमेश-दिल्ली, डॉ. धनंजय वर्मा-भोपाल आदि। इसी तरह उसी दिन 3 बजे शमशेर का कविता संसार पर विमर्श में वक्ता के रूप में डॉ. रोहिताश्व-गोवा, श्री राकेश श्रीमाल-वर्धा, श्री प्रभुनाथ आजमी-भोपाल, श्री ज्योतिष जोशी-दिल्ली, श्री नरेन्द्र पुंडरीक-बांदा, डॉ. शिवनारायण-पटना, संतोष श्रीवास्तव-मुंबई श्री दिवाकर भट्ट-हलद्वानी,श्री मुकेश वर्मा-उज्जैन, श्री कुमार नयन-बक्सर, श्री राजेन्द्र उपाध्याय-दिल्ली, श्री रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति-भोपाल, डॉ. कमलेश-इलाहाबाद, डॉ. सुधीर सक्सेना-दिल्ली, अध्यक्ष मंडल में होंगे- डॉ. धंनजय वर्मा-भोपाल, श्री मधुरेश-कानपुर, श्री खगेन्द्र ठाकुर-पटना, श्री त्रिभुवन नाथ शुक्ल-भोपाल आदि। इस अवसर पर टैगोर, शमशेर, अज्ञेय, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एवं प्रमोद वर्मा की कविताओं की प्रदर्शनी भी आयोजित की जा रही है।

Sunday, January 17, 2010

आधुनिक व दार्शनिक दृष्टि से हिन्द स्वराज अधिक प्रासंगिक- आचार्य नंदकिशोर

हिन्द स्वराज की प्रासंगिकता पर व्याख्यान सम्पन्न



रायपुर, 16 जनवरी।

ख्यातिनाम गांधीवादी, चिंतक और लेखक जयपुर के नंदकिशोर आचार्य ने कहा है गांधी जी की किताब हिन्द स्वराज्य आधुनिक एवं दार्शनिक दृष्टि से आज अधिक प्रासंगिक है। उन्होंने हिन्द स्वराज्य का विश्लेषण करते हुए कहा कि स्वदेशी, स्थानीय जरूरतों के, लिए स्थानीय संस्थानों से स्थानीय लोगों के लिए विकसित टेक्नालाजी है। यह विचार आचार्य ने महात्मा गांधी द्वारा रचित विश्व प्रसिद्ध कृति हिन्द स्वराज की 100 वीं वर्षगांठ के अवसर पर रायपुर प्रेस क्लब के सभागार में हिन्द स्वराज्य की प्रासंगिकता विषय पर आयोजित व्याख्यान के दौरान व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा किया गया। उक्त अवसर पर प्रख्यात आलोचक श्री भगवान सिंह की नाट्यकृति बिन पानी बिन सुन का विमोचन भी श्री नंदकिशोर आचार्य के हाथों संपन्न हुआ।

नंदकिशोर आचार्य ने हिन्द स्वराज्य की प्रासंगिकता पर कहा कि इस पर देश में गंभीर, चिन्तन नहीं हुआ। यह अपने आप में एक सनातन प्रासंगिकता है। प्राणियों में मनुष्य में चेतना का विकास हुआ और बाद में उसमें हस्तक्षेप करने की क्षमता विकसित हुई। वर्तमान मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह उसका उपयोग विकास के लिए करें या विनाश के लिए। उन्होंने तीन महान विचारकों की पुस्तकों का जिक्र करते हुए कहा कि एडम स्मिथ ने उत्पादन पर जोर दिया उससे बाजार की समस्या उत्पन्न हो गई परिणाम स्वरूप यह सिद्धांत समस्या सुलझाने में असमर्थ हो गया। इसी तरह कार्ल माक्र्स ने उत्पादन पर समाज के अधिकार का सिद्धांत दिया जिससे कार्पोरेट सेक्टर के पास स्वामित्व चला गया और नतीजा यह हुआ कि रूस में एकाएक आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया। जबकि गांधी जी के हिन्द स्वराज में ऐसी टेक्नालाजी पर बल दिया गया है जो समतामूलक एवं अहिंसात्मक हो। उन्होंने कहा कि प्रकृति और मनुष्य के बीच का संबंध ही आपसी रिश्तों को बढ़ाएगा। उन्होंने कहा कि हिन्द स्वराज्य सनातन सिद्धांतों पर आधारित है और आज के इस वैज्ञानिक युग में यह हम सब पर निर्भर करता है कि विकास अथवा विनाश में से कौन सी स्वतंत्रता चाहते हैं।

इसके पूर्व व्याख्यान कार्यक्रम के आरंभ में भागलपुर से आए चर्चित आलोचक श्रीभगवान ने कहा कि गांधी जी उपनिवेशवाद के विरोधी थे और सर्व समाज एवं सभी देशों के आगे बढऩे की बात करते थे। उन्होंने कहा कि विज्ञान का मतलब ज्ञान का सोच समझकर उपयोग करना है। गांधी जी भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल आचरण, नीतियों और श्रुतियों के अनुसार विकास की बात करते थे। गांधी जी स्वावलंबन और स्वायतता की बात करते थे क्योंकि उससे ही देश में सबको रोजगार मिलने के साथ ही आत्मनिर्भर बढ़ सकती थी। कालान्तर से देश में ही उनके हिन्द स्वराज की कल्पना की उपेक्षा कर दी गई मगर आज उसकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है। श्री भगवान ने कहा कि गांधी जी के सिद्धांतों में ग्रामीण स्वावलंबन की भावना छुपी हुई है। पश्चिमी दौड़ के कारण अपव्यय तथा धन का दुरूपयोग बढ़ा है जिस पर किसी का ध्यान नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि गांधी जी के सिद्धांतों को याद नहीं किया गया तो हम सब पर भारी संकट आने वाला है।

व्याख्यान के अध्यक्षीय उद्बोधन में कवि विश्वरंजन ने कहा कि एडम स्मिथ कार्ल मार्क्स एवं समतावादी समाज की संरचना से ज्यादा वैज्ञानिक व्यवहारिक, सोच गांधी जी की थी। गांधी जी नए युग के मनुष्य के लिए सबसे बड़े प्रकाशपुंज की तरह हैं। आज हम उनकी बुनियाद को अपने अंदर कितना गहरे में उतार पाते हैं यह आज की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है। उन्होंने कहा कि बस्तर में पहले सामंतवादी माहौल था उसके बाद वन संरक्षण अधिनियम, पर्यावरण अधिनियम के कारण आदिवासियों को काफी दिक्कतें आई। इन्हीं सबके चलते नक्सलवादी जैसी ताकतों को पैर पसारने के लिए अवसर मिल गया। उन्होंने कहा कि नक्सली सिद्धांत हिंसा पर केन्द्रित है और आखिर में वह टूटेगी पर बहुत नुकसान के बाद। उन्होंने कहा कि बस्तर की परिस्थिति अलग है कितने भी तथाकथित गांधीवादी हों वे नक्सली सुरंग के बीच जाकर बताएं। विश्वरंजन ने कहा कि सोच वाला व्यक्ति निडर होता है। गांधी जी बड़े सत्यान्वेषी थे। उनकी सोच समतावादी थी। जो लोक के लिए सुविधाजनक है वह प्रासंगिक है।
कार्यक्रम के अंत में प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की ओर से संस्थान के अध्यक्ष विश्वरंजन ने नंदकिशोर आचार्य और श्रीभगवान को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। आरंभ में अतिथियों का पुष्पहार से स्वागत किया गया। इस अवसर पर श्रीमती इंदिरा मिश्र, विनोद कुमार शुक्ल, नंदकिशोर तिवारी, राजेन्द्र मिश्र, बसंत तिवारी, संस्कृति आयुक्त राजीव श्रीवास्तव, प्रभाकर चौबे, रवि भोई, अशोक सिंघई, केयूर भूषण, गुलाब सिंह, प्रभाकर चौबे, विनोद शंकर शुक्ल, सुभाष मिश्र, जयप्रकाश मानस, डी.एस.अहलुवालिया, डॉ. प्रेम दुबे, डॉ. वंदना केंगरानी, एच.एस.ठाकुर, एस. अहमद, संजीव ठाकुर, डॉ,सुधीर शर्मा, राम पटवा, हसन खान, अलीम रजा, नईम रजा, विनोद मिश्र, रवि श्रीवास्तव, विनोद साव, कमलेश्वर, बी. एल. पॉल, चित्रकार सुश्री सुधा वर्मा, एवं बड़ी संख्या में दुर्ग, भिलाई, बिलासपुर और रायपुर के लेखक, पत्रकार, एवं प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे।

राम पटवा

Monday, September 7, 2009

श्रीभगवान सिंह एवं कृष्ण मोहन को प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़ का दो दिवसीय आयोजन



रायपुर। महानगरों में रहने वाले ज्ञात और प्रसिद्ध आलोचकों की जगह छोटे कस्बों के योग्य आलोचकों को प्रथम प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान दिया जाना बौद्धिक रूप से बहुकेन्द्रीयता की ओर लौटने की प्रवृत्ति है जो साहित्य का शुभ संकेत है । वास्तव में यह दिल्ली दर्प दमन है। यह इस प्रवृत्ति को ख़ारिज़ करता है कि सफल होने के लिए महानगरों का निवासी होना ज़रूरी है। उक्त विचार हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक, कवि श्री अशोक वाजपेयी ने 10 एवं 11 जुलाई 2009 को आयोजित दो दिवसीय आलोचना संगोष्ठी एवं प्रथम प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान समारोह के दौरान व्यक्त किए।

संस्थान की ओर से प्रत्येक वर्ष प्रमोद वर्मा की स्मृति में दिये जाने वाले राष्ट्रीय आलोचना सम्मान का शुभारंभ करते हुए वर्ष 2009 के लिए भागलपुर के आलोचक श्री भगवान सिंह तथा वाराणसी के श्री कृष्ण मोहन को सम्मानित किया गया। उक्त सम्मान में पुरस्कृत आलोचक द्वय को क्रमशः 21 हज़ार एवं 11 हज़ार रूपये देने के साथ ही प्रमोद वर्मा समग्र, प्रशस्ति पत्र एवं प्रतीक चिह्न, शॉल एवं श्रीफल भेंट कर अलंकृत किया गया। उक्त सम्मान के निर्णायकों में थे श्री केदारनाथ सिंह, डॉ. धनंजय वर्मा, डॉ. विजय बहादुर सिंह, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, श्री विश्वरंजन एवं संयोजक जयप्रकाश मानस।

पुरस्कारों की विश्वसनीयता फिर स्थापित – श्रीभगवान सिंह

सम्मानित आलोचक श्री भगवान सिंह ने कहा कि उन्होंने कभी पुरस्कार प्राप्त करने के लिए नहीं लिखा था और न ही वे पुरस्कारों में विश्वास रखते हैं, लेकिन वे छत्तीसगढ़ के आभारी हैं कि यहाँ पर उनके द्वारा जिस विचार को लेकर लिखा जा रहा है उसे पुरस्कार दिया गया । पुरस्कार की विश्वसनीयता एक बार फिर स्थापित हुई। दिल्ली दर्प दमन जिसकी आवश्यकता संगोष्ठी में अशोक वाजपेयी द्वारा जताई गई, वह रायपुर में हुआ है।

दो दिवसीय आलोचना संगोष्ठी का उद्घाटन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह ने किया। उन्होंने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि सुप्रसिद्ध कवि, नाट्य लेखक, शिक्षाविद् और साहित्य समीक्षक स्वर्गीय डॉ. प्रमोद वर्मा की महत्वपूर्ण रचनाओं के संकलन प्रमोद वर्मा साहित्य समग्र जो कि राजकमल प्रकाशन से चार खण्डों में प्रकाशित हुआ है के विमोचन एवं तीन सत्रों में आलोचना पर विचार-विमर्श करने के साथ ही छत्तीसगढ़ का नाम एक बार पुन: साहित्य के आकाश पर छा गया है। देश के कई राज्यों के मूर्धन्य साहित्यकारों के बीच सिर्फ़ गजानंद माधव मुक्तिबोध और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ही नहीं, बल्कि साहित्य मनीषी स्वर्गीय राहुल सांकृत्यायन की कालजयी किताबों के साथ प्रमोद वर्मा की आलोचना दृष्टि को भी याद किया जायेगा।

साहित्य रसिक मुख्यमंत्री ने समारोह का शुभारंभ करते हुए कहा कि कालजयी कवियों और साहित्यकारों के रूप में सूर्य और चंद्रमा पैदा करने की ताक़त केवल हिन्दुस्तान की माटी में ही है, जिसने सूरदास जैसे साहित्य के सूर्य और तुलसीदास जैसे चंद्रमा को जन्म दिया। छत्तीसगढ़ सहित देश के कुछ राज्यों में व्याप्त नक्सल हिंसा और आतंक की तीखी आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति और समाज की आज़ादी का हनन करनेवाले किसी भी हिंसक विचार के लिए साहित्य में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। उन्होंने इस अवसर पर प्रमोद वर्मा की महत्वपूर्ण रचनाओं के संकलन साहित्य समग्र तथा समारोह की स्मारिका का विमोचन करते हुए उनकी साहित्यिक जीवन यात्रा और रचनाओं पर केन्द्रित व संस्थान के कार्यकारी निदेशक श्री जयप्रकाश मानस द्वारा निर्मित (www.pramodverma.com) नामक पोर्टल का उद्घाटन भी किया। माओवादी हिंसक गतिविधियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी वाद अथवा विचार को मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन का अधिकार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि प्रमोद वर्मा जैसे वरिष्ठ दिवंगत साहित्यकार को श्रद्धांजलि देने का इससे अच्छा माध्यम और कुछ नहीं हो सकता। कार्यक्रम में पर्यटन और संस्कृति मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल, आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास मंत्री श्री केदार कश्यप और पूर्व मंत्री श्री सत्यनारायण शर्मा के सहित छत्तीसगढ़ और देश के विभिन्न राज्यों के अनेक साहित्यकार और स्थानीय प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे।

समारोह तीन सत्रों में विभाजित था। प्रथम सत्र “समकालीन आलोचना का हाव भाव” में अध्यक्षीय दीर्घा से बोलते हुए श्री नदंकिशोर आचार्य ने कहा कि रचना को समग्रता में देखना आलोचना है, लेकिन हिन्दी काव्य में साहित्य चिंतन की रूचि समाप्त हो गई है। उन्होंने कहा कि आलोचना आत्महीनता की शिकार हो गई है। शिव कुमार मिश्र ने कहा कि विदेशियों को उद्धृत करना बुरा नहीं है, उन्होंने मेहनत की है और हिन्दी के लोगों को भी वैश्विक सापेक्ष में साहित्य को देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिन्दी आलोचना का कोई चरित्र नहीं है। डॉ. श्यामसुंदर दुबे ने कहा कि आलोचना में न्यायिक और सम-सामयिक संतुलन नहीं है। ये कबीर से लेकर नागार्जुन तक को एक खाने में रखते हैं। आलोचनात्मक हाव-भाव में या तो प्रशंसा कर रहे होते हैं या फिर विरोध। उक्त सत्र में संवाद में हिस्सा लेते हुए डॉ. कल्याणी वर्मा, डॉ. वंदना केंगरानी, डॉ. उर्मिला शुक्ल, डॉ. श्री सुशील त्रिवेदी और श्री गिरीश पंकज ने अपने विचार रखे।

दूसरा सत्र आलोचना का प्रजातंत्र विषय पर केन्द्रित था जिसमें अध्यक्षीय आसंदी से बोलते हुए श्री खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आलोचना को यथार्थ की धरती पर खड़ा किया। उन्होंने कहा कि आजकल आलोचना में असहिष्णुता का भाव बढ़ गया है। डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय ने कहा कि प्रजातंत्र का अर्थ वरण की स्वतंत्रता से है। आलोचक को विषय चुनने तथा उस पर दृष्टिकोण रखने की आशावादी होनी चाहिए। वरिष्ठ कवि श्री चंद्रकांत देवताले ने बहुत ही विचारोत्तेजक वक्तव्य देते हुए कहा कि रचनाकारों को ज़्यादा आलोचकों की चिंता नहीं करनी चाहिए। हमारा साहित्य समीक्षक का मोहताज़ नहीं है। उन्होंने कहा कि हमारी विचारधारा को कोई चुनौती नहीं दे सकता। कवि का कोई देश नहीं होता उसी तरह विचारधारा का कोई देश नहीं होता, भूख का कोई देश नहीं होता। उन्होंने ज़ोर देकर इस बात की ओर इशारा किया कि रचना की विचारधारा, आलोचक की विचारधारा की जो बातें की जाती हैं, वह मिथ्या धंधा है `अकादमिक´ धंधा है। मुक्तिबोध को याद करते हुए उन्होंने कहा कि आज आलोचक और रचनाकार को अपनी पॉलिटिक्स साफ़ करनी चाहिए। हमें अपनी जातीय, देशज संस्कृति की रक्षा करते हुए वैश्विक होना है। उक्त सत्र में संवाद में भाग लेते हुए श्री एकांत श्रीवास्तव, सुश्री रंजना अरगड़े, सुश्री मुक्ता सिंह, श्री कृष्ण मोहन, श्री अरूण शीतांश और श्री बसंत त्रिपाठी ने भी अपने विचार रखे।

तृतीय सत्र “आलोचना के परिसर में प्रमोद वर्मा” पर केन्द्रित था। सत्र अध्यक्ष श्री अशोक वाजपेयी ने कहा कि एक आलोचक अपने दूसरे मित्र रचनाकारों के निर्माण में सहचर की भूमिका निबाह सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण प्रमोद वर्मा थे। वर्मा ने अपनी आलोचनाओं से गजानंद माधव मुक्तिबोध तथा हरिशंकर परसाई के लेखन को प्रोत्साहित किया है और उनके विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। अध्यक्ष मंडल की आसंदी से श्री कमला प्रसाद ने बोलते हुए कहा कि आलोचना के क्षेत्र में श्री प्रमोद वर्मा का अपना स्थान है। वे लेखक की स्वतंत्रता के हिमायती थे। उन्होंने कहा कि प्रमोद वर्मा समाजवाद में लोकतंत्र चाहते थे। श्री रमाकांत श्रीवास्तव ने कहा कि प्रमोद वर्मा किसी विचारधारा के प्रति कट्टर नहीं हुए, क्योंकि विचारधारा की कट्टरता अहितकर होती है। उन्होंने कहा कि जब मार्क्सवाद कट्टर होता है तो नक्सलवाद और जब इस्लाम कट्टर होता है तो तालिबान के रूप में सामने आता है। श्री देवेन्द्र दीपक ने कहा कि मुक्तिबोध के शब्दों में जो है उससे बेहतर चाहिए दुनिया के लिए एक मेहत्तर चाहिए कुछ इन्हीं पंक्तियों को ध्येय बनाकर श्री प्रमोद वर्मा जीवन भर समाज की गंदगी दूर करने का प्रयास अपने लेखन से करते रहे। संवाद सत्र में श्री प्रभात त्रिपाठी, डॉ.बलदेव, श्री रवि श्रीवास्तव, श्री विनोद साव, श्री नंद किशोर तिवारी, डॉ. बृजबाला सिंह, आदि ने भी अपने विचार रखे।


कल़मकारों की ताक़त असीम - राज्यपाल

अलंकरण समारोह में छत्तीसगढ़ के राज्यपाल श्री ई.एस.एल. नरसिम्हन ने कहा कि कलम की ताक़त असीमित होती है। कलाकारों, साहित्यकारों को अपनी इस ताक़त का इस्तेमाल सकारात्मक कार्यों में करना चाहिए। उन्होंने कहा कि साहित्य की ताक़त से समाज व उसका परिवेश बदला जा सकता है। साहित्यकार वर्तमान समाज को अपने नवीनतम विचारों से अवगत कराकर युवा वर्ग को दिशा प्रदान करें। साहित्य केवल पठन-पाठन तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज के परिवेश में सशक्त एवं मार्गदर्शी साहित्य की सख़्त ज़रूरत है, जिसके प्रकाश में भावी पीढ़ी अपनी परंपरा, संस्कृति, नैतिक मूल्यों से भली-भांति परिचित हो सके और उन्हें सही राह मिल सके। श्री नरसिम्हन ने कहा कि विकास को केवल भौतिक अर्थों में नहीं बल्कि मानसिक विकास के साथ आंका जाना चाहिए और इसीलिए हमारे मनीषियों ने सांस्कृतिक प्रोत्साहन को विशेष बल दिया है। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान करते हुए कहा कि वे अपनी सशक्त लेखनी से आने वाले समय की चुनौतियों का सामना इसी तरह प्रतिबद्ध होकर करते रहें। राज्यपाल ने कहा कि साहित्यकार एवं सुरक्षा बल के अधिकारियों के साथ यह एक तरह का अनोखा तालमेल है और सुरक्षा कर्मचारियों का दायित्व भी समाज के हित में ही काम करना है। उन्होंने संस्थान के अध्यक्ष विश्वरंजन को खासतौर पर बधाई दी और कहा कि उनका यह साहित्यिक कार्य समाज के सामने संदेश प्रस्तुत करता है कि पुलिस संस्थान समाज के हित में काम करने वाला एक महान् और सृजनात्मक बल है तथा इसी मार्गदर्शन को सुरक्षा बल के अधिकारियों को अपनाना चाहिए। उन्होंने आलोचक द्वय को प्रथम प्रमोद वर्मा स्मृति आलोचना सम्मान से अलंकृत भी किया।

अशोक बाजपेयी ने कहा उन्हें छत्तीसगढ़ी होने का गर्व है और यह अच्छी बात है कि छत्तीसगढ़ ने हिन्दी साहित्य आलोचना के सम्मान का मान रखा है। वर्तमान पीढ़ी को साहित्य के प्राप्त अपने उत्तराधिकार के लिए सजग करने का दायित्व साहित्यकारों का है। उन्होंने कहा कि आलोचना केवल बौद्धिक ज़िम्मेदारी है। साहित्यकार की आलोचना से कोई सहमत हो या नहीं उसे हर हालत में अपनी बात रखने से पीछे नहीं हटना चाहिए। यह भी कहा कि साहित्य ही एक रणभूमि, रंगभूमि या रंगमंच है, जहाँ अभी तक मूल्य की राजनीति एवं लोकतंत्र बचा है। उन्होंने कहा कि आलोचना वह नैतिक कार्य है जो सत्य का यथार्थ चित्रण करती है।

संस्था के अध्यक्ष श्री विश्वरंजन ने संस्थान की आगामी कार्य योजनाओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी देते हुए कहा कि संस्थान द्वारा भविष्य में महिला, आदिवासी, और दलित समाज के लेखकों के लिए विशेष तौर पर राष्ट्रीय लेखन शिविरों का आयोजन सहित राजधानी में हिन्दी भवन निर्माण का कार्य भी किया जायेगा।

नाट्य मंचन एवं राष्ट्रीय कविता पाठ

कार्यक्रम के पहले दिन श्री प्रमोद वर्मा की कविताओं पर आधारित कविताओं का नाट्य मंचन श्री कुंज बिहारी शर्मा के निर्देशन में प्रसिद्ध नाट्य संस्था “रूपक” द्वारा किया गया। इस अवसर पर काव्य गोष्ठी का आयोजन भी किया गया, जिसमें देश के नामी-गिरामी कवियों यथा-श्री नंदकिशोर आचार्य,श्री चंद्रकांत देवताले, श्री विनोद कुमार शुक्ल, श्री प्रभात त्रिपाठी, श्री एकांत श्रीवास्तव, श्री विश्वरंजन, डॉ. वंदना केंगरानी, श्री अशोक सिंघई, श्री शरद कोकास, श्री कमलेश्वर साहू, श्री अरूण शीतांश, डॉ. बलदेव एवं श्रीमती पुष्पा तिवारी ने अपनी कविताओं का काव्य पाठ किया। काव्य पाठ का संचालन श्री रवि श्रीवास्तव ने किया ।

कार्यक्रम में राजकमल प्रकाशन दिल्ली के प्रमुख अशोक माहेश्वरी, डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया, डॉ. कल्याणी वर्मा, बसंत त्रिपाठी, राजेन्द्र मिश्र, कनक तिवारी, डॉ. बलदेव, राजुरकर राज, कैलाश आदमी, रमेश नैयर, डॉ. प्रेम दुबे, विनोद शंकर शुक्ल, सुभाष मिश्र, संतोष रंजन, श्री राम पटवा, अशोक सिंघई, मुमताज, एस. अहमद, बी.एल पॉल, तपेश जैन एवं राज्य भर के प्रबुद्ध साहित्य रसिक गण उपस्थित थे।

रपट- जयप्रकाश मानस

Friday, November 28, 2008

प्रमोद वर्मा पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन

1800 पृष्ठीय प्रमोद वर्मा समग्र का संपादन विश्वरंजन द्वारा

रायपुर। हिंदी के प्रखर आलोचक और कवि प्रमोद वर्मा पर अभिकेंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन आगामी फरवरी-मार्च माह में किया जायेगा, जिसमें देश के प्रमुख आलोचकों, संपादकों, साहित्यकारों के अलावा विदेश के साहित्यकारों को आमंत्रित किया जा रहा है । यह महती आयोजन छत्तीसगढ़ के बहुमुखी प्रतिभा के धनी एवं राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का नाम उजागर करने वाले विभूतियों की स्मृति को चिरस्थायी बनाने की दिशा में सतत् क्रियाशील एवं राज्य की बहुआयामी सांस्कृतिक संस्था सृजन-सम्मान की राज्य इकाई और नव गठित प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के बैनर तले किया जायेगा । उक्त अवसर पर प्रमोद वर्मा समग्र साहित्य एवं उन पर केंद्रित ग्रंथ का विमोचन भी किया जायेगा। इसके अलावा उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए देश के एक वरिष्ठ कवि आलोचक को प्रतिवर्ष दिये जाने वाला प्रमोद वर्मा स्मृति राष्ट्रीय सम्मान भी प्रारंभ किया जा रहा है।

प्रमोद वर्मा समग्र का संपादन उनके मित्र और वरिष्ठ कवि (पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़) श्री विश्वरंजन कर रहे हैं। इस संकलन में श्री प्रमोद वर्मा द्वारा लिखित सभी 17 काव्य संग्रह, निबंध, आलोचना, मोनोग्राफ, यात्रा-संस्मरण, डायरी, नाटक सहित अप्रकाशित कृतियों का प्रकाशन भी किया जा रहा है। इसमें साहित्य रूप और सृजन-प्रक्रिया के संदर्भ, अँगरेज़ी की स्वच्छंद कविता, रोमान की वापसी, हलफ़नामा, कविता दोस्तों में बुलाने से नहीं आती नदी, मुक्तिबोध पर मोनोग्राफ़, कल और आज के बीच, लंबा मारग दूरी घर, कदाचित् संदर्शन प्रकाशित संग्रह हैं और यूरोप प्रवास पर एक डायरी, सामारुमा एवं अन्य कविता, समालोचना तथा नाटक की एक-एक अप्रकाशित कृतियाँ समादृत की जा रही हैं । यह समग्र कुल 1800 पृष्ठों का होगा जिसमें 4 खंड होंगे। इसमें उनकी 4 अप्रकाशित पांडुलिपियाँ भी सम्मिलित हैं जिसे उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कल्याणी वर्मा सौजन्यवश उपलब्ध करा रही हैं।

इसके अलावा स्व. प्रमोद वर्मा पर केंद्रित एक किताब भी 'न होना प्रमोद वर्मा का' के नाम से से प्रकाशित की जा रही है । इसका संपादन युवा साहित्यकार जयप्रकाश मानस एवं सुरेन्द्र वर्मा कर रहे हैं । इस कृति में श्री वर्मा जी के समकालीन रचनाकारों के मध्य हुए पत्राचारों, उन्हें लेकर रचनाकारों के संस्मरणों, आलोचनात्मक लेखों, फ़ोटोग्राफ आदि समादृत की जा रही है।

सृजन-सम्मान के महासचिव राम पटवा द्वारा जारी विज्ञप्ति में रचनाकारों से आग्रह किया गया है कि श्री प्रमोद वर्मा से जुड़े संस्मरण, तस्वीरें, आलोचनात्मक लेख, प्रकाशित या अप्रकाशित सामग्री आदि जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान, एफ-3, छग माध्यमिक शिक्षा आवासीय कॉलोनी, पेंशनवाड़ा, रायपुर के पते पर या srijan2samman@gmail.com से भेज सकते हैं।