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Saturday, October 9, 2010

ब्लॉगरों को अपनी लक्ष्मण रेखा खुद बनानी होगी- विभूति नारायण राय

हिन्दी ब्लॉगिंग पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला और संगोष्ठि का उद्‍घाटन


बाएँ से दाएँ- माइक पर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, मंच पर आलोक धन्वा, डॉ॰ अजित गुप्ता, विभूति नारायण राय, ऋषभ देव शर्मा, अनिल राय 'अंकित' और डॉ. कविता वाचक्नवी

9 अक्टूबर । वर्धा
आज महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में 'हिंदी ब्लॉगिंग की आचार-संहिता' विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला एवं संगोष्ठी उद्‍घाटन हुआ। उद्‍घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने किया। कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत कार्यक्रम के संयोजक सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने किया।

अपने स्वागत भाषण में विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति ए. अरविंदाक्षण ने कहा कि इस कार्यक्रम में यूजीसी और मानव संसाधन विकास के प्रतिनिधियों/अधिकारियों को भी आमंत्रित करना चाहिए, जिससे वे जान सकें कि ये विश्वविद्यालय केवल साहित्यधर्मिता और उत्सव का ही केंद्र नहीं है, बल्कि यह हिंदी को तकनीक से भी जोड़ने को प्रयासरत है।


अपना वक्तव्य देते हुए विभूति नारायण राय

कुलपति विभूति नारायण राय ने अपने उद्‍घाटन वक्तव्य में कहा कि इंटरनेट ने राज्यों की बंदिशों को तोड़ा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में यह जो विस्फोट हुआ है, वो इंटरनेट से ही संभव हो सका है। लेकिन हम यहाँ 2 दिनों के लिए इसलिए भी उपस्थित हुए हैं कि हम इस बात पर बहस कर सकें कि इस माध्यम ने हमें एक खास तरह की स्वच्छंदता तो नहीं दे दी है! अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कहीं हम यह तो नहीं भूल रहे हैं कि हम सारी सीमाएँ तोड़ रहे हैं और दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे हैं। कहीं हम तथ्यों को तोड़-मरोड़कर तो नहीं पेश कर रहे हैं। हमें ऐसा लगता है कि हर एक ब्लॉगर को अपनी लक्ष्मण-रेखा खुद बनानी होगी।


श्रोतागण

विषय-प्रवर्तन जोधपुर, राजस्थान से पधारीं प्रसिद्ध साहित्यकार और ब्लॉगर डॉ. अजित गुप्ता ने किया। अध्यक्षता डॉ. ऋषभ देव शर्मा ने की। इनके अतिरिक्त मंच पर वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा, जनसंचार विभाग-प्रमुख अनिल राय और ब्लॉगर और कवयित्री डॉ. कविता वाचक्नवी उपस्थित थे।

Sunday, October 3, 2010

भावबोध की अपेक्षा मनुष्यबोध व जनबोध कविता की प्राथमिक शर्तें हैं - प्रो. नित्यानंद तिवारी

सत्रः 3 । दिन- प्रथम । केदारनाथ अग्रवाल पर समग्र


खगेन्द्र ठाकुर

1 अक्टूबर । वर्धा
2-3 अक्तूबर 2010 को महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि., वर्धा में आयोजित संगोष्ठी “बीसवीं सदी का अर्थ और जन्मशती का सन्दर्भ” के पहले दिन तीसरे सत्र के रूप में कवि केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित परिचर्चा का आयोजन किया गया। सत्र की अध्यक्षता प्रो. नित्यानन्द तिवारी ने एवं संचालन अरुणेश शुक्ला द्वारा किया गया।

प्रथम वक्ता के रूप में प्रो. खगेन्द्र ठाकुर ने केदार की कविताओं की आलोचना के सन्दर्भ की चर्चा में कलावादी आलोचना की मीमांसा करते हुए कालिदास, भारवि, माघ व दण्डी के साहित्य के टीकाकारों का उल्लेख किया। पिछड़े, वंचित व उपेक्षित वर्ग के प्रति केदार की कविता की पक्षधरता, सामाजिकता व उनकी राजनीतिपरक कविताओं के अनेकानेक उदाहरणों से उन्होंने अपनी बात पुष्ट की।

प्रो. अजय तिवारी ने प्रगतिशील आलोचना पर पक्षपात के आरोपों का खण्डन करते हुए अज्ञेय व केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित मौलिक पुस्तकों का प्रश्न उठाया। साथ ही रामविलास शर्मा द्वारा दी गई प्रगतिशीलता की ‘जनता की तरफ़दारी’ की परिभाषा को रेखांकित किया। स्त्री की अस्मिता का प्रश्न, परम्परा, परंपरा के पलायनवादी पक्ष आदि को अज्ञेय, नागार्जुन, केदार आदि के सन्दर्भ में उन्होंने व्याख्यायित किया और कहा कि इतिहास में जिसकी जो भूमिका व स्थान है, उसे वही दिया जाना चाहिए। उस से कम देना भी अन्याय होगा व उस से अधिक देना भी अन्याय। साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन में इस यथार्थ का बोध बहुत आवश्यक है। प्रगतिशील आलोचना पर लगाए जाते आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि जिनमें यथोचित बल नहीं वे पंजा लड़ाने क्यों चले। अजय तिवारी ने जोड़ा कि नागार्जुन, केदार व शमशेर प्रतिबद्धता व संघर्ष के कवि हैं। जिस कवि में परम्परा अमरता का रूप पाती है, वही कवि अमर होता है। केदार इस अर्थ में अद्वितीय हैं।


श्रोता

“तद्‍भव” के सम्पादक अखिलेश का वक्तव्य केदार की कविताओं के स्त्री पक्ष, स्वकीय प्रेम, स्त्रीचेतना को आज इक्कीसवीं सदी के स्त्री विमर्श के समक्ष तुलनात्मक दृष्टि से मूल्यांकित करने से प्रारम्भ हुआ। विवाह और परिवार, संयुक्त परिवार का परिवेश, सौभाग्य के चिह्न आदि सन्दर्भों व उनके द्वन्द्व पर केन्द्रित उनके आलेख में केदार जी की कई बहुत सुन्दर कविताओं को आज के परिप्रेक्ष्य में पुनर्मूल्यांकित किया गया। केवल देह के शोषण के विरुद्ध या उसी की मुक्ति के अर्थ-मात्र में नहीं अपितु समग्र स्त्रीचेतना और स्त्री मुक्ति के रचनाकार के रूप में केदार के काव्य के उक्त पक्ष को उन्होंने सुचिन्तित ढंग से उद्‍घाटित किया।


प्रो. नित्यानंद तिवारी

अध्यक्षीय उद्‍बोधन में प्रो. नित्यानन्द तिवारी ने अज्ञेय से सम्बन्धित कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण संस्मरण सुनाते हुए कई ऐतिहासिक तथ्यों का उद्‍घाटन किया। केदार व नागार्जुन के जनकवि होने व जनकवि होने की पक्षधरता के लिए उठाए खतरों का उल्लेख भी उन्होंने किया। उन्होंने कहा कि कविता यदि कवि की कार्यशाला में जाकर रची जाती है व एक रचनात्मक उत्पाद बनती है तो आप जनकवि नहीं हो सकते। भावबोध की अपेक्षा मनुष्यबोध व जनबोध इसकी प्राथमिक शर्तें हैं। जिसमें जितना लोकपक्ष अधिक होगा, वह उतने अर्थों में जनकवि होने की ओर होता है, इन अर्थों में अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल व नागार्जुन की कविताओं को देखा जाए तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है।

धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र को संक्षेप में समेट देना पड़ा। रात्रि में नागार्जुन की कविताओं की नाट्यप्रस्तुति के अत्यन्त्त रोचक व भावन कार्यक्रम के उत्साह व तैयारी को ध्यान में रखते हुए सत्र में होते विलम्ब को टालने की दॄष्टि से केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित सत्र के कुछ अन्य वक्ताओं को आगामी दिन के सत्रों में सम्मिलित करने का निर्णय लेना पड़ा।

2 अक्तूबर के अन्तिम कार्यक्रम के रूप में नागार्जुन की कविताओं के रोमांचक नाट्यमंचन को खचाखच भरे सभागार ने खूब सराहा। देर रात तक चले 2 अक्तूबर के समस्त कार्यक्रमों में दर्शकों, श्रोताओं व अध्येताओं का उत्साह देखते ही बनता था। वैचारिक सत्रों में श्रोताओं की भारी उपस्थिति ने विश्वविद्यालय की गरिमा बढ़ाई। मध्य रात्रि तक खुले प्रांगण में लेखकों की आत्मीय बैठक ने इस द्विदिवसीय संगोष्ठी को पारिवारिकता का-सा संस्पर्श प्रदान किया।

रिपोर्ट- डॉ. कविता वाचक्नवी

Saturday, October 2, 2010

अज्ञेय स्वयं चुप क्यों रहे


द्वितीय सत्र में मंचासीन- (दाएँ से) राजकिशोर, कृपाशंकर चौबे, सुरेंद्र वर्मा, गंगा प्रसाद विमल, बलराम प्रसाद त्रिपाठी, शम्भू गुप्त

1 अक्टूबर । वर्धा
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. में 2 व 3 अक्टूबर 2010 को आयोजित संगोष्ठी (बीसवीं सदी का अर्थ और जन्मशती का सन्दर्भ) के उद्घाटन सत्र के पश्चात आयोजित प्रथम सत्र दोपहर 3 बजे से "अज्ञेय पर एकाग्र" के रूप में संपन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता गंगा प्रसाद विमल ने व संचालन डॉ शम्भु गुप्त ने किया।

पटना से आए प्रो. बलराम तिवारी ने अज्ञेय पर केन्द्रित अपने संबोधन में जिन तथ्यों को रेखांकित किया, वे हैं- "अज्ञेय जिस रोमांटिक प्रवृत्ति के लिए बदनाम हैं, वह वस्तुतः उन में है ही नहीं उलटे वे तो एंटी रोमांटिक प्रवृत्ति से ग्रस्त हैं। अपनी बात की पुष्टि के लिए उन्होंने कुछ उद्धरण भी दिए
- "यथास्थिति के प्रति विद्रोह ही अज्ञेय को अमर बनाता है।"
- "हमारे समाज में भाई बहन सम्बन्ध को लेकर जो टैबूज़ हैं शेखर भी उन टैबूज़ को तोड़ नहीं पाते..यह नैतिकतामूलक ग्रंथि का ही अवबोध है"
- "अगर शिल्प व शास्त्र पर मार्क्सवादी विचारक ध्यान देते हैं तो यह अज्ञेय की देन है"

आगामी वक्ता के रूप में युवा कथाकार शशिभूषण ने अपने वक्तव्य में कहा कि लेखक अपने कृतित्व द्वारा समाज को कितना आगे ले जाने का साहस रखता है यह उस लेखक की प्रतिबद्धता से ही प्रकट होता है। प्रश्न यह उठता है कि अज्ञेय अपनी प्रतिबद्धता पर अंतिम समय तक स्थिर क्यों नहीं रह पाए। ओम थानवी को उद्‍धृत करते हुए शशि ने अज्ञेय पर हर समय लगाए जाते आरोपों का उल्लेख किया व एक पुत्र के पिता होने के आरोप को भी उद्‍धृत करते हुए समाज व आलोचना की विसंगतियों पर प्रहार किए। वक्तव्य के अंत में शशि ने खरे शब्दों में कहा कि सीमाएँ अज्ञेय में हैं, उस मार्क्सवादी आलोचना में भी हैं, जो अज्ञेय को देखती हैं।

आगामी वक्तव्य मनोज कुमार पाण्डेय ने दिया। जमशेदपुर से पधारीं विजय शर्मा ने प्रारम्भ में ही यह स्पष्ट किया कि मैं अज्ञेय को सबसे महान रचनाकार के रूप में स्थापित करने के लिए नहीं खडी हूँ- "अज्ञेय कान्तिकारी थे, जो बहुत प्रभावित करने वाला तथ्य था किन्तु स्वयं अज्ञेय ने इस पर बहुत चुप्पी बनाए रखी है। एक समकालीन लेखक के सद्य : प्रकाशित लेख में उनकी क्रांतिकारिता के अनेक विस्तार जानकर अज्ञेय पर बहुत गुस्सा आया कि वे स्वयं चुप क्यों रहे।"

गाँधीवादी चिन्तक राजकिशोर ने अज्ञेय की पत्रकारिता वाले पक्ष पर अब तक हिन्दी में किसी महत्वपूर्ण कार्य के न होने पर अत्यंत खेद प्रकट किया। उन्होंने व्यंग्यपूर्ण ढंग से चुटकी लेते हुए कहा कि हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है। दूसरी ओर इस पर क्षोभ जताया कि हमारे पत्रकारिता क्षेत्र में काम करने वालों से स्वयं जाकर पूछ लीजिए उनमें से बहुमत अज्ञेय को जानता तक न होगा। स्थिति इतनी सोचनीय है कि कोई अज्ञेय के पत्रकारितावंश को आगे बढ़ाने वाला तक नहीं है।
-"अज्ञेय जी की विचारधारा में अन्तर्विरोध सदा बने रहे किन्तु ये अन्तर्विरोध विचारधारा के अभाव में नहीं थे".

अज्ञेय की पत्रकारिता की भाषा पर केन्द्रित अपने सम्बोधन में कृपाशंकर चौबे ने राजकिशोर के वक्तव्य के कई तथ्यों का विरोध करते हुए पत्रकारिता के कुछ स्तम्भों के उल्लेख के साथ अज्ञेय की परम्परा के जीवित रहने के प्रमाण दिए। भाषा व लिपि सम्बन्धी कई नियमों को उन्होंने क्रमवार दोहराया।

अन्तिम वक्ता के रूप में प्रो. सुरेन्द्र वर्मा की उपस्थिति ने सभा को गरिमा प्रदान की।

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में गंगाप्रसाद विमल ने कहा कि अज्ञेय के समक्ष हिन्दी आलोचना बौनी रही,आलोचना के पास वे औजार नहीं थे जो अज्ञेय की रचनाधर्मिता को माप सकती। अज्ञेय अपने समय के सबसे विरल व प्रतिभाशाली रचनाकार थे. हिन्दी आलोचना उनके बिना आगे बढ़ ही नहीं सकती। अज्ञेय ने पश्चिम के समक्ष भारतीय मनीषा व भाषा को अत्यन्त सम्मानजनक स्थान दिलाया।

धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र समाप्त हुआ।

रिपोर्ट- डॉ॰ कविता वाचक्नवी

फादर कामिल बुल्के की प्रतिमा का अनावरण

2 अक्टूबर । वर्धा

विश्व प्रसिद्ध हिंदीसेवी व रामकथा के विशेषज्ञ और शब्दकोश-निर्माता फादर कामिल बुल्के के जन्मशताब्दी वर्ष में उनकी प्रतिमा का आज यहाँ अनावरण किया गया तथा उनके नाम पर एक अंतरराष्ट्रीय छात्रावास का उद्‍घाटन भी किया गया। महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी वि. वि. के कुलाधिपति एवं प्रख्यात आलोचक डॉ नामवर सिंह ने वि.वि. परिसर में निर्मित फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास का उद्‍घाटन किया और उनकी आवक्ष प्रतिमा का भी अनावरण किया।

1 सितम्बर 1909 को बेल्जियम के रामस्कापले गाँव में जन्मे कामिल बुल्के ने इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद कोलकाता से संस्कृत में एम ए किया तथा इलाहाबाद से हिन्दी में एम ए किया और रामकथा उत्पत्ति एवं विकास पर इलाहाबाद वि. वि .से पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की और राँची में रहकर अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दी की सेवा में लगा दिया। 1974 में पद्मभूषण से अलंकृत श्री बुल्के भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में रामकथा के विषय-विशेषज्ञ के रूप में जाने गए और कामिल बुल्के हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश निर्माता के रूप में वे अमर हो गए।

प्रो. नामवर सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि यीशु के महान उपासक होने के बावजूद कामिल बुल्के ने रामकथा की सारी परम्पराओं के ज़रिए भारत की आत्मा को पहचाना था, उनके लिए राम का अर्थ किसी मंदिर-मस्जिद का विध्वंस या निर्माण नहीं, अपितु ज्ञान की सृजनात्मकता को रेखांकित करना था। पूरे भारत में पहली बार कामिल बुल्के की स्मृति में किसी भवन का उद्‍घाटन किया गया।

कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय वि. वि. में विदेशों से आने वाले छात्रों के लिए छात्रावास का नामकरण कामिलबुल्के के नाम पर होना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

वि. वि. में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा का अनावरण पिछले दिनों सिक्किम के राज्यपाल महामहिम बीपी सिंह के द्वारा किया गया था। इसी क्रम में समाजसेविका सावित्रीबाई फुले व प्रसिद्ध कवि गोरख पांडे की प्रतिमा का भी अनावरण होना है। इसके अतिरिक्त मुशी प्रेमचंद, भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाम पर सड़कों का नामकरण भी किया गया और वि.वि. की पाँच पहाड़ियों में से दो का नामकरण गाँधी हिल तथा कबीर हिल के नाम से रखा गया।

फादर कामिल बुल्के के स्मृति समारोह में वि. वि. के कुलपति विभूति नारायण राय, प्रतिकुलपति प्रो. ए अरविन्दाक्षन, कुलसचिव कैलाश खामारे, प्रो. निर्मला जैन, प्रो. नित्यानंद तिवारी, प्रो. खगेन्द्र ठाकुर, प्रो. विजेंद्र नारायण सिंह, प्रो. सुरेन्द्र वर्मा, कवि आलोक धन्वा, अरुण कमल, प्रो.गंगाप्रसाद विमल, उषाकिरण खान, राजकिशोर, प्रो. सूरज पालीवाल, प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव, डॉ. शम्भू गुप्त व डॉ.अनिल पांडे सहित अन्य अनेकानेक गण्यमान्य लेखक विचारक व साहित्यकार उपस्थित थे।

रिपोर्ट- डॉ. कविता वाचक्नवी (अपराह्न 12‍ः45 बजे)

बीसवीं सदी हाशिए के लोगों की शताब्दी हैं- वी एन राय

2 अक्टूबर । वर्धा

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी के चार महान कवियों की जन्मशती वर्ष के अवसर पर उनकी रचनाओं पर चर्चा के बहाने बीसवीं शताब्दी के अर्थ को समझने के लिए देश भर से बड़े साहित्यकारों को आमंत्रित कर सेमिनार का आयोजन किया है। गांधी जयन्ती के दिन प्रारम्भ हुए इस कार्यक्रम का उद्‌घाटन प्रसिद्ध समालोचक नामवर सिंह द्वारा किया गया। यह रिपोर्ट लिखते समय नामवर जी का उद्‍घाटन भाषण चल रहा था। वे नागार्जुन की चर्चा करते हुए उनका दोहा सुना रहे थे।

खड़ी हो गयी चाँपकर कंकालों की हूक।
नभ में विपुल विराट सी शासन की बंदूक॥

जली ठूँठ पर बैठ कर गयी कोकिला कूक
बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक
-----------------------------(नागार्जुन)

इससे पहले कुलपति वी.एन.राय ने अपने विषय प्रवर्तन भाषण में बीसवीं सदी को हाशिए के लोगों की शताब्दी बताया। स्त्रियों, दलितों और गुलाम देश के नागरिकों को मनुष्य के रूप में जीने का हक मिला। जन्मशती के चार कवि हैं- 1-सच्चिदानन्द हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’ 2-शमशेर, 3- केदारनाथ अग्रवाल, 4-नागार्जुन ।

निर्मला जैन-
(12:05 अपराह्न)

प्रख्यात आलोचक निर्मला जैन ने अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया। समय की छाप हर एक रचना पर पड़ती है। इन चारों कवियों में बहुत मूल्य चिंता दिखती है।

शमशेर को कवियों का कवि क्यों कहा जाता है? इसकी व्याख्या जरूर होनी चाहिए।

“बात बोलेगी हम नहीं। भेद खोलेगी बात ही” लेकिन शमशेर ने कविता के अलावा भी बहुत कुछ कहा है।

रिपोर्ट- सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी (दोपहर 12‍ः10 बजे तक की कवरिंग)

Friday, October 1, 2010

अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर व फैज़ अहमद फैज़ की जन्‍मशती पर 2 दिवसीय विमर्श कार्यक्रम कल से वर्धा में



1 अक्टूबर। वर्धा

म‍हात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में हिंदी के ऐतिहासिक महत्‍व के बड़े कवियों- अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर तथा उर्दू के विश्‍व विख्‍यात रचनाकार फैज़ अहमद फैज़ की जन्‍म शताब्‍दी तथा कवि रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की डेढ़ सौवीं जयंती के अवसर पर उनके साहित्‍य पर चिंतन मनन करने तथा उनके शताब्‍दीपरक मूल्‍यांकन के सन्दर्भ में गंभीर व दूरगामी विमर्श हेतु आयोजित शताब्‍दीसमारोह-शृंखला का उद्ट‍घाटन 2 अक्टूबर 2010 को हिंदी के मूर्धन्‍य साहित्‍यकार व विश्‍वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. नामवर सिं‍ह करेंगे।

कल पूर्वाह्न 11 बजे प्रारंभ होने वाले उद्ट‍घाटन सत्र की अध्‍यक्षता प्रो. निर्मला जैन करेंगी। कुलपति विभूति नारायण राय स्‍वागत वक्‍तव्‍य देंगे तथा प्रतिकुलपति प्रो.ए. अरविंदाक्षन धन्‍यवाद ज्ञापित करेंगे। साहित्‍य विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो. सूरज पालीवाल समारोह का संचालन करेंगे। इस अवसर पर विश्‍वविद्यालय के संग्रहालय की वेबसाइट http://archive.hindivishwa.org, जिसकी संकल्‍पना स्‍वयं कुलपति विभूति नारायण राय ने तैयार की है, का लोकार्पण प्रो. नामवर सिंह द्वारा किया जाएगा।

कल 2 अक्टूबर सायं अज्ञेय एवं केदारनाथ अग्रवाल के साहि‍त्यिक अवदान पर दो संगोष्ठियाँ आयोजित होंगी, जिनकी अध्‍यक्षता क्रमश: प्रो.गंगा प्रसाद विमल एवं प्रो. नित्‍यानन्‍द तिवारी करेंगे तथा प्रो. शंभुनाथ एवं प्रो. खगेन्‍द्र ठाकुर मुख्‍य वक्‍ता होंगे। इन संगोष्ठियों में वक्‍ताओं के रूप में अखिलेश, धीरेन्द्र अस्थाना, प्रो. बलराम तिवारी, राजकिशोर, प्रो. अजय तिवारी, बोधिसत्‍व, विमल कुमार, डॉ. कृपाशंकर चौबे, डॉ. रति सक्‍सेना, डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ. मीता शर्मा, विजय शर्मा, डॉ. कृपाशंकर चौबे, वसंत त्रिपाठी, नरेन्‍द्र पुण्‍डरीक, डॉ. वीणा दाढे, मनोज कुमार पाण्‍डेय तथा शशिभूषण भागीदारी करेंगे। इन सत्रों का संचालन डॉ. शंभु गुप्‍त तथा प्रो. संतोष भदौरिया करेंगे।

03 अक्‍टूबर को आयोजित तीन सत्रों में नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह तथा फैज़ अहमद फैज़ के कृतित्‍व एवं शताब्‍दीपरक महत्‍व पर अलग-अलग चर्चा होगी।

प्रात: 10 बजे नागार्जुन पर एकाग्र संगोष्‍ठी की अध्‍यक्षता प्रो. खगेन्द्र ठाकुर करेंगे तथा प्रो. विजेन्‍द्र नारायण सिंह मुख्‍य वक्‍ता होंगे। प्रो. गोपेश्‍वर सिंह, डॉ. नीरज सिंह, डॉ. राम आह्लाद चौधरी, प्रो.के.के. सिंह तथा अवधेश मिश्र वक्‍ता के रूप में अपने विचार रखेंगे। इस सत्र का संचालन प्रो. कृष्‍ण कुमार सिंह करेंगे। अपराह्न 12 बजे प्रारंभ होने वाले सत्र में शमशेर की रचना पर विमर्श होगा जिसकी अध्‍यक्षता अरूण कमल करेंगे। प्रो. रंजना अरगडे मुख्‍य वक्‍ता होंगी। उषा किरण खान, प्रो. माधव सोनटक्‍के, दिनेश कुमार शुक्‍ल, डॉ.विनोद तिवारी व डॉ. मीनाक्षी जोशी, वक्‍ता के रूप में उपस्थित रहेंगे। इस सत्र का संचालन राकेश मिश्र करेंगे।

अपराह्न 3 बजे फैज़ अहमद फैज़ पर केंद्रित सत्र का आगाज़ होगा जिसकी अध्‍यक्षता कवि आलोक धन्‍वा करेंगे। मुख्‍य वक्‍ता अली जावेद होंगे। दिनेश कुशवाह तथा कुछ अन्‍य साहित्‍यकार वक्‍ता होंगे। विश्‍वविद्यालय के विशेष कर्तव्‍या‍धिकारी राकेश सत्र का संचालन करेंगे।

2 अक्टूबर सायं गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित शताब्‍दी श्रृंखला के दौरान सांस्‍कृतिक संध्‍या कार्यक्रम में आमं‍त्रित कवियों का कविता पाठ तथा नागार्जुन की कविताओं पर बसंत त्रिपाठी के निर्देशन में नागपुर के कलाकार अपनी नाट्य प्रस्‍तुति देंगे।

प्रस्तुति- सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी