Saturday, February 27, 2010

हिंदी दिवस की महत्ता में एक नया मोर पंख - "नवतरंग" का लोकार्पण एवं काव्यगोष्ठी

दिनांक रविवार, २१ फरवरी २०१० अंतराष्ट्रीय हिंदीं समिति, न्यू जर्सी शाखा के अध्यक्ष श्री रामबाबू गौतम जी द्वारा संपादित प्रवासी साहित्यकारों का संग्रह "नवतरंग" साहित्य के कैनवास पर एक नया अयाम प्रदान करता रहा. अंतर्राष्ट्रीय. हिन्दी दिवस के उपलक्ष में एक इन्द्र-धनुषी कवि सम्मलेन का सफ़ल आयोजन हुआ जिसमें मुख्य अतिथि सम्माननीय डॉ. विजय कुमार मेहता, न्यूयार्क (अखिल विश्व समिति) ने अध्यक्षता की. अन्य मुख्य महमान रहे, श्री देवेन्द्र सिंह, रचयिता सिंह, एस.मलिक, श्री अनूप भार्गव, श्री शेरबहादुर सिंह एवं डा. रेखा रस्तोगी.



डॉ. मेहता तथा श्री रामबाबू गौतम ने माँ सरस्वती के चरणों में दीप प्रज्ज्वलित करके इस आयोजन की शुरूवात स्वागत स्वरूप यह कहते हुए किया -

"निज भाषा उन्नति अहे, करता हूँ प्रणाम
न्यू जर्सी में सरस्वती बढी, ले कविता की शाम
कोटि- कोटि हिंदी अहे, दे प्रवासी सम्मान,
रूख- रूख उभरी यहाँ, कर कवियों का सम्मान

इसके बाद अमेरिका में जन्में दो भारतीय बच्चे प्राची व् उसके भाई सूर्य ने अपने साज़ और आवाज़ के संगम से सुर लय ताल में मधुर राष्ट्रीय गान "वन्दे मातरम" गाकर श्रोताओं का मन मोह लिया.

शुरुवाती वक्तव्य में श्री शेरबहादुर सिंह जी.. अंतराष्ट्रीय हिंदीं समिति.के पूर्व अध्यक्ष... ने कहा कि 'यह एक स्वर्ण युग है हिंदी भाषा के लिए. इतने हिंदी सेवी निष्टा से इस प्रचार प्रसार के आन्दोलन में जुटे हुए हैं, अब हिंदी के प्रवाह को कोई नहीं रोक सकता. अब अपने संगठित प्रयासों से भाषा जी जड़ों को और मज़बूत करना है.



हिंदी USA के संस्थापक श्री देवेन्द्र सिंह एवं रचिता सिंह भी इस अवसर पर मौजूद रहे. अपने विचारों को व्यक्त करते हुए रचयिता जी ने कहा "जब तक हम मिलकर हिंदी भाषा के लिए काम नहीं करेंगे, तब तक आने वाली पीढ़ियों को उनकी विरासत देने का प्रयास सफल नहीं होगा" श्री देवेन्द्र सिंह ने हिंदी के कार्यों का विवरण देते हुए उनमें और सक्रियता की आशा की. इससे साफ़ ज़ाहिर होता है की वे हिंदी को प्रवास में स्थापित करने के स्वप्न को लेकर कितने सक्रिय रूप से जुटे हुए हैं. जोश भरी इस रचना से उन्होंने श्रोताओं, कविओं में जोश का संचार किया...

हिन्दू जागो हिंदी सीखो हिन्दोस्तान बचाना है/

भारत मान की आन बाण का डंका हमें बजाना है.

भावों के आदान प्रदान के पश्चात् काव्य गोष्टी प्रारंभ हुई. कवि- सम्मेलन के प्रथम सत्र के शामिल कवि इस प्रकार थे -



श्री अशोक सिंह, डॉ. सरिता मेहता, श्रीमती पूर्णिमा देसाई, श्री हिमांशु ओम पाठक, श्रीमती शशी पाधा, श्रीमती सुषमा मल्होत्रा. राम बाबू गौतम जी के संचालन में पाठ का आगाज़ किया श्री अशोक व्यास जी ने अपने वतन के प्रति एक निष्टावान पंक्तियों से " मेरा भारत महान" और पाठ करने वाले वरिष्ठ रचनाकार, शायर, अपनी अपनी अनुभूतियों से महफ़िल को सजीव व् रुचिकर करने में सफल रहे. डा. सरिता मेहता ने इस दौर में बचपन की हंसी की कमी की ओर विशेष ध्यानर देते हुए सुंदर रचना से माहौल को रौनक प्रदान की. कवियित्री शशि पाधा एक सैनिक की पत्नि है, जिन्होंने एक मार्मिक, हृदयस्पर्शी रचना उन सैनिकों की ओर से पढ़ी जो जी-जान से भारत माँ की शान पर अपनी निष्टा के सुमन चढ़ा कर वहीँ सरहदों पर शहादत का परचम फहरा गए. अंत की ओर आते आते सुश्री सुषमा मल्होत्रा ने इन्द्रधनुषी रचना से रंगों के बिम्ब खींचते हुए होली के त्यौहार को सजीव व् सकारात्मक स्वरुप प्रदान किया.



दूसरे सत्र के पहले "नवतरंग" का लोकार्पण डा. विजय मेहता, अथवा अन्य मुख़्य महमान के हाथों

संपूर्ण हुआ. उस संकलन में शामिल रचनाकार रहे श्रीमती अनंत कौर, डॉ. बबीता श्रीवास्तव , श्रीमती देवी नागरानी, श्रीमती बिंदु भट्ट , श्री रामबाबू गौतम, डॉ. रेखा रस्तोगी 'कल्प' , स्व. श्रीमती सीमा अरोरा , लेखक डॉ. हेमंत शर्मा. नवतंरंग के साहित्यकारों का सन्मान सुमन शाल और हिंदी दिवस प्रमाण पत्र से किया गया..



दुसरे सत्र में काव्य गोष्टी का संचालन किया डॉ.सरिता मेहता ने किया . इस सूत्र के कवि रहे डॉ. रानी नगिंदर, श्रीमती अनंत कौर, डॉ. बबीता श्रीवास्तव , श्रीमती देवी नागरानी, अनुराधा चंदर, वीरेन्द्र कुमार चौधरी, डॉ. रेखा रस्तोगी, रामबाबू गौतम, ललित अहुलवालिया, डॉ. हेमंत कुमार शर्मा, वी.के चौधरी, जिन्होंने अपने अपने गीत ग़ज़ल की सरिता से महफिल में रंग भरा.

अंत में अपने अध्यक्षता के दौर में डॉ. विजय मेहता ने अनेकों शेर' का पाठ करते हुए अच्छा समां बांधा . अन्य कई श्रोता मौजूद रहे जिनमें खास रहे अर्चना जी, अशोक ओझा जी, श्री देव मक्कड़, रश्मी मक्कड, राकेश जी अपने परिवार, साहित और सरिता मेहता ने इस आयोजन में सक्रिय भागीदारी के साथ इसे सफ़ल बनाया. रामबाबू गौतम ने सभी उपस्थित गण का अभार प्रकट किया. कार्यक्रम की समाप्ति भोजन के साथ हुई.

देवी नागरानी

एक यादगार सूफियाना मुशायरा



आज हिंदोस्तान में जिस गंगा-जमुनी तहजीब की रवायत है और पूरा आलम इसकी इस रवायत पर रश्क करता है, उसकी बुनियाद आज से सदियों पूर्व महान शायर-सूफी हजरत अमीर खुसरो ने डाली थी. राष्ट्र की कौमी एकता का राज उन्हीं के बुनियादी वसूलों पर पडा है जो दुनिया के किसी भी मुल्क से ज्यादा मत-मतांतरों के लोग यहां रहते हुए भी बेमिसाल कौमी एकता के सूत्र में बंधे हुए हैं. इस महान हस्ती के ऐजाज में भारतीय सांसकृतिक संबंध परिषद और उमराओ जान जैसी महान क्लासिकल फिल्मों के महान निर्माता और निर्देशक तथा बुद्धजीवी जनाब मुजफ्फर अली साहब की संस्था रूमी के संयुक्त तत्वाधान में बज़मे जहान खुसरो का आयोजन भारतीय सांसकृतिक संबंध परिषद के आडिटोरियम में किया गया.मुल्क की आजादी के बाद यह पहला मौका था जब खानकाहों, मजारों, सूफी संस्थाओं और अमीर खुसरो से जुडी जमीन के सूफी शायरों को एक मंच पर इकट्ठा कर खुसरो के प्रति अकीदत पेश करते हुए सूफियाना कलाम पेश किए गए. दिल्ली की सर जमीन पर कलाम सेमाअत फरमाने वालों में पुर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. बलराम जाखड़,आई.सी.सी.आर.के महानिदेशक श्री वीरेंद्र गुप्ता, जामिया के पूर्व वाइस चांस्लर जनाब शाहिद मेंहदी साहब, डॉ. अजय गुप्ता,निदेशक आई.सी.सी.आर.,योजना उर्दू के संपादक जनाब आबिद करहानी, विदेशी दूतावासों के राजनयिक ,अनेक गणमान्य शख्सियात मौजूद थीं.
इस सूफियाना मुशाएरे में अपना कलाम पेश करने वाले शायरों में जनाब मेहताब हैदर, लखनउ,जनाब ऊमर फारूक, लहर पुर,इंतजार सीतापुरी,आज़िम कोहिली,दिल्ली,अफ़जल मंगलौरी, कलियर शरीफ, राम प्रकाश बेखुद,लखनऊ, सय्यद जिया अलवी,दिल्ली,फसीह मुजीबी,फरुखाबाद, मतीन अमरोहवी,दिल्ली,डॉ. अजीज़ खैराबादी, खैराबाद, जिया कादरी,अजमेर शरीफ,अजम शाकरी,पटियालवी,मुन्ना खान राही,अजमेर शरीफ,डॉ. नसीम निकहत,लखनऊ,फसीह अकमल,दिल्ली और शहरयार,अलीगढ़ जैसे अज़ीम शायरों ने इस मुशायरे को अपने कलाम से रौनक बख्शी.
सबसे पहले जनाब जाखड़ साहब,जनाब वीरेन्द्र गुप्ता जी,शाहिद मेंहदी साहब,्जनाब मुजफ्फर अली साहब, शहरयार साहब ने मुशायरे के शमा को रोशन किया. इसके बाद जनाब बलराम जाखड़ साहब ने सभी शायरों को शाल भेंट कर उनकी हौसला अफजाई की.
कौन कहता है कि सियासातदानों को अदब और तह्जीब की तमीज नहीं होती.इस मुशायरे में शुरू से आखिर तक उनकी मौजूदगी इस बात का गवाह थी कि आज भी पुराने सियासतदानों में अपनी तहजीब से उतना ही गहरा लगाव है, यह दूसरी बात हैकि आज के सियासतदानों को अपने बडों से सीख और प्रेरणा लें.इसी में मुल्क की बहबूदी है.



इस मुशायरे का लुत्फ लोगों ने बहुत ही मोहज्जिबाना तरीके से उठाया.मुशायरे की सदारत आलमी सतह के शायर जनाब शहरयार ने की और निजामत सय्यद जिया अलवी ने किया.
खुसरो के एजाज में पेश किए गए शेर उन्हीं के गजलों और शेरों की छाया इस सूफियाने मुशायरे में दिखाई दे रही थी जो हकीकत में उन्हीं को समर्पित था और उन्हीं की रंगों में रंगा हुआ था.

रिपोर्ट-
शमशेर अहमद खान
2-सी, प्रैस ब्लॉक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस ,दिल्ली—110054
मो. 09818112411/ 01123811363

Friday, February 26, 2010

वर्ष 2010 का प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार सीहोर के पंकज सुबीर को

सीहोर। वर्ष 2010 के लिये भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार की घोषणा कर दी गई है । इस वर्ष के लिये ये पुरस्कार रूप से सीहोर के पंकज सुबीर को उनके उपन्यास 'ये वो सहर तो नहीं' के लिये दिया जा रहा है ।

सीहोर के युवा कहानीकार को पंकज सुबीर को उनके उपन्यास के लिये इस वर्ष का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार दिया जा रहा है । भारतीय ज्ञानपीठ ने 2009 को उपन्यास वर्ष मनाते हुए नवलेखन पुरस्कार को उपन्यास के लिये दिये जाने की घोषणा की थी । इसके लिये एक चयन समिति शीर्ष आलोचक डॉ. नामवर सिंह की अध्यक्षता में बनाई गई थी । जिसमें डॉ. गंगा प्रसाद विमल, शीर्ष कथाकार नया ज्ञानोदय के संपादक तथा भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया, आलोचक डॉ. विजय मोहन सिंह, कथाकार चित्रा मुद्गल, कथाकार अखिलेश सम्मिलित थे । देश भर ये प्राप्त पांडुलिपियों में से चयन करके ये पुरस्कार प्रदान किया जाना था । भारतीय ज्ञानपीठ ने इस नवलेखन के देश के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिये इकसठ हजार रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान किये जाने का निर्णय लिया था । तथा चयनित पांडुलिपि को भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित करके का भी फैसला लिया गया था । गत दिवस चयन समिति की बैठक में वर्ष 2010 के ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार के लिये सीहोर के युवा कथाकार पंकज सुबीर तथा दिल्ली के कथाकार कुणाल सिंह को संयुक्त रूप से ये पुरस्कार प्रदान करने का निर्णय लिया गया । चयन समिति के अध्यक्ष डॉ. नामवर सिंह ने स्वयं फोन कर समिति के निर्णय की जानकारी पंकज सुबीर को दी । भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा शीघ्र ही नई दिल्ली में एक भव्य आयोजन में ये पुरस्कार प्रदान किया जायेगा । दोनों संयुक्त विजेताओं को पुरस्कार की राशि का आधा आधा प्रदान किया जायेगा । उल्लेखनीय है कि गत वर्ष भी पंकज सुबीर का एक कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार योजना के अंतर्गत प्रकाशित होकर आया था, जो साहित्यिक हलकों में काफी चर्चित रहा था । मध्य प्रदेश के जिला मुख्यालय सीहोर के युवा कथाकार पंकज सुबीर की पचास से भी अधिक कहानियां देश भर की साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं । पेशे से स्वतंत्र पत्रकार पंकज सुबीर अपनी विशिष्ट शैली तथा शिल्प के लिये जाने जाते हैं । युवा पीढी क़े नये कथाकारों में अपनी व्यंग्य निहित भाषा से वे अपनी अलग ही पहचान बन चुके हैं । उनको जिस उपन्यास ये वो सहर तो नहीं के लिये ये पुरस्कार दिया जा रहा है उसमें उन्होंने 1857 से लेकर 2008 तक की कथा को व्यंग्य निहित भाषा में समेटा है । निर्णायकों के अनुसार इस उपन्यास में व्यंग्य का जो भाव है वह राग दरबारी की याद दिला देता है । इस उपन्यास में दो समानांतर कथाओं को समेटने की कोशिश की गई है।

इदार इंबिको के छाया चित्रों की प्रदर्शनी

18 फरवरी 2010 से 24 फरवरी 2010 तक नई दिल्ली, लोदी रोड स्थित इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर में रूसी छायाकार इदार इंबिको के छाया चित्रों की प्रदर्शनी का आयोजन रूसी साइंस और कल्चर सेंटर और इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर के संयुक्त तत्वाधान में किया गया जिसका उद्घाटन भारत सरकार के केंद्रीय मंत्री माननीय डॉ. फारूक अब्दुल्लाह,रूसी संघ के भारत स्थित राजदूत महामहिम एलेक्सजेंडर एम.कदाकिन और आल इंडिया मस्जिदों के इमामों के महासचिव इमाम उमर अहमद इलियासी ने किया.इस छाया चित्र प्रदर्शनी का मूल विषय था—रूस में इस्लाम--.

रूसी छाया चित्रकार का जन्म 1955 में मास्को के आस-पास हुआ. उनका बचपन से ही फोटोग्राफी का शौक था. सेना की सेवा से निवृत होने के बाद बाल्यकाल का शौक उनके व्यवसाय से जुड़ गया.उनकी कला परवान चढ़्ने लगी जिसमें अनेक विषय अंतर्निहित होते थे. उनके चित्रों की प्रदर्शनियां रूस के साथट्यूनीसिया,मोरक्को,मिष्र और कांगो में हो चुकी हैं.उनके चित्रों की झलक आप भी लीजिए-















Thursday, February 25, 2010

चम्बल के लेखक का उपन्यास मुखबिर

ग्वालियर। पुस्तक मेला में पिछले दिनों चम्बल के लेखक राजनारायण बोहरे के उपन्यास ‘ मुखबिर’ का लोकार्पण हुआ। चम्बल घाटी हमेशा से इस बात के लिए कुख्यात रही है कि यहां डाकू ओैर पुलिस के बीच लुकाछिपी का खेल चलता रहता है। इस खेल को अंजाम देने का काम करते हैं मुखबिर! मुखबिर यानी कि खबर देने वाला-खबरिया। पुलिस हो या डाकू दोनों ही मुखबिर की बदौलत सफल या असफल होते हैं। चम्बल के कथाकार राजनारायण बोहरे का नया उपन्यास इन्ही मुखबिरों पर केन्द्रित है।

पिछले एक लम्बे अरसे से पुलिस को छकाता रहा डाकू रामबाबू गड़रिया और उसका नाटकीय अन्त ही इस कहानी की पृष्ठभूमि में मौजूद है, जिसमें जातिवादी राजनीति और पुलिसिया मानसिकता के साथ असली नकली मुठभेड़ों का पर्दाफास किया गया है।

पुस्तक ’गुंजन’ का विमोचन समारोह



कवि कुलवंत सिंह, मुंबई एवं श्रीमती सी. आर. राजश्री कोयंबतूर द्वारा संपादित पुस्तक ’गुंजन’ का विमोचन समारोह मुंबई में श्री कीर्तन केंद्र, जुहू में प्रसिद्ध उद्योगपति एवं समाजसेवी श्री महावीर सराफ जी के कर कमलों द्वारा 2 फरवरी की संध्या को संपन्न हुआ. कार्यक्रम का प्रारंभ मां सरस्वती का आवाहन करते हुए नमन कर, दीप प्रज्ज्वलन एवं माल्यार्पण के साथ हुआ. कार्यक्रम का संचालन देश की सुप्रसिद्ध बुद्धिजीवी, लेखिका, अध्यापक, चिंतक, संपादक (कुतुबनुमा - त्रैमासिक पत्रिका) डा. राजम नटराजम पिल्लई ने किया. कार्यक्रम की अध्यक्षता की - प्रसिद्ध स्क्रिप्ट लेखक, कहानीकार श्री जगमोहन कपूर ने, जिनकी कई फिल्में सिल्वर जुबली रही हैं (नागिन, नगीना, निगाहें इत्यादि). मंच पर उपस्थित अन्य विशिष्ट सम्माननीय व्यक्तित्व थे डा. गिरिजाशंकर त्रिवेदी (पूर्व मुख्य संपादक नवनीत), शायर एवं कवि श्री खन्ना मुजफ्फरपुरी, श्री कपिल कुमार (अभिनेता, कुंडलियों के सम्राट, उनका एक गीत हंसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है, जिसे मन्ना डे ने गाया था, बहुत प्रसिद्ध हुआ था).

गुंजन पुस्तक की खास विशेषता यह है कि यह दक्षिण भारत के एक शहर कोयंबतूर के एक विद्यालय में पढ़ रहे विद्यार्थियों द्वारा लिखी रचनाओं का संकलन है. हिंदी को एक विषय के रूप में पढ़ रहे इन छात्रों की रचनात्मक प्रतिभा को बढ़ावा देने वाली और कोई नही एक दक्षिण भारतीय हिंदी अध्यापिका ही हैं. जिनका नाम है श्रीमती सी आर राजश्री; जिनकी जितनी प्रशंसा की जाये, कम है. छात्रों की रचनात्मक प्रतिभा को बढ़ावा देने के लिये एवं उनमें संवेदनशीलता को उभारने के लिये उन्होंने कालेज में एक रचनात्मक कार्यशाला आयोजित की और उनके सभी छात्रों ने इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. साथ ही कालेज के प्रिंसिपल, सलाहकार (संस्थापक) एवं विभागाध्यक्ष भी अनुशंसा के पात्र हैं जिन्होंने इस कार्यशाला के आयोजन के लिये न ही केवल राजश्री को प्रोत्साहन ही दिया अपितु सभी सुविधायें भी प्रदान कीं.

इन छात्रों की रचनात्मकता देखते ही बनती है. उनमें कई त्रुटियां होंगी पर उन्हें नज़रअंदाज करके ही हमें देखना होगा. छात्रों की संवेदनशीलता देखते ही बनती है. 66 छात्रों की रचनओं में से लगभग 13 कविताएं माँ पर हैं. माँ एक विषय नही अपितु संसार है जिसमें सभी कुछ समाहित होता है. इससे सिद्ध होता है कि हम भारतीय अपनी संस्कृति के ह्रास को लेकर दिनरात जो रोना रोते हैं वह कितना खोखला है. जब तक भारतीय माँ जिंदा है, हमारी संस्कृति बहुत ही अच्छे तरीके से सहेजी हुई है, सुरक्षित है.



विमोचन कार्यक्रम के उपरांत काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसका सुंदर संचालन विख्यात श्री कुमार जैन ने अपने निराले अंदाज में किया. कवियों ने अपनी मधुर वाणी एवं विचारों से उपस्थित श्रोताओं का मन मोह लिया. उपस्थित प्रमुख कवि एवं विचारक थे - सर्वश्री त्रिलोचन अरोडा, नंदलाल थापर, रवि यादव, कुलदीप दीप, हरि राम चौधरी, सुरेश जैन, जयंतीलाल जैन, जवाहरलाल निर्झर, गिरीश जोशी, भजन गायक हरिश्चंद्र जी, राजेश्वर उनियाल, डा. जमील, लोचन सक्सेना, मुरलीधर पाण्डेय, डा. तारा सिंह, श्रीमती शुभकीर्ति माहेश्वरी, श्रीमती मंजू गुप्ता, श्रीमती नीलिमा पाण्डे, श्रीमती शकुंतला शर्मा, डा. सुषमा सेनगुप्ता.

कार्यक्रम के उपरांत कुलवंत सिंह ने माँ शारदा के साथ साथ सभी अतिथियों, श्रोताओं, संचालक एवं महानुभावों का तहे दिल से शुक्रिया अदा किया.

प्रस्तुति-
कवि कुलवंत सिंह
2 डी, बद्रीनाथ बिल्डिंग, अणुशक्तिनगर, मुंबई - 94
फोन : 022-25595378 / 09819173477

विदेशों में भी हो रहा ठाकरे का विरोध, 100 पत्र दुबई से भेजे



जय भोजपुरी परिवार के द्वारा चलाये गए ठाकरे के खिलाफ विरोध पत्र अभियान जिसकी खबर हिन्दयुग्म पर प्रकाशित हुई थी, लागातार सफलता के नए नए आयाम गढ़ रहा है। खबर का असर कुछ इस तरह रहा की पत्र अभियान में लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया है। जय भोजपुरी परिवार के सदस्यों ने जिस अभियान की शुरुआत १४ जनवरी के मिलन समारोह से की थी उसका असर सिर्फ भारत ही नहीं वरन दुनिया के अलग अलग देशों में रह रहे अप्रवासी भारतीयों पर भी हो रहा है। तत्कालीन सूचना के मुताबिक़ हाल हीं में संयुक्त अरब अमीरात से लगभग १०० पत्र प्रधान मंत्री कार्यालय में पोस्ट किये गएँ हैं। जिसमें केवल उत्तर भारतीय ही नहीं वरन देश के हर क्षेत्र के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है। जय भोजपुरी के दुबई में स्थानीय प्रतिनिधि जीतेन्दर जी चौहान के मुताबिक़ बहुत जल्दी ही और भी लोग पत्र अभियान में हिसा लेंगे। जय भोजपुरी ने विदेशों में भी अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से विरोध पत्र अभियान को तीव्र एवं प्रभावी करने के लिए नयी मुहीम छेड़ रखी है ! इसके पूर्व भी ठाकरे विरोधी तमाम अभियान चला चुका जय भोजपुरी परिवार अब इस काम के लिए आम जन मानस तक अपनी मुहीम तेज़ कर रखी है। इस मुहीम की सबसे ख़ास बात यह है कि इसमें न सिर्फ उत्तर भारतीय बल्कि देश के एनी हिस्सों जैसे कर्नाटक, तमिलनाडु, केरला, यहाँ तक कि महाराष्ट्र से भी इस मुहीम में शामिल हो रहे हैं। हालांकि इस तरह के मुहीम चलाने के लिए जय भोजपुरी परिवार को फोन एवं मेल के जरिये धमकियां भी मिल चुकी है। इन तमाम धमकियों से बेपरवाह जय भोजपुरी परिवार इस अभियान को राष्ट्रीय अभियान के तौर पर देख रहा है। चूँकि यह बताने कि जरुरत नहीं है कि आज ठाकरे परिवार राष्ट्रीय अखण्डता में कितना बड़ा खतरा है। आप सभी पाठकों से गुजारिश है कि इस पत्र अभियान का हिस्सा बनते हुए एक सजग राष्ट्र प्रहरी के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन करें। आपका एक पत्र उन गैर राष्ट्रीय सोच रखने वाले तत्वों के मुँह पर करारा तमाचा होगा ! बहुत जल्द ही आप सबके सहयोग से जय भोजपुरी परिवार के समर्थन में देश विदेश से लोग भारी संख्या में आगे आयेंगे और इन दूषित एवं राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्वों के खिलाफ मुहीम छेड़ेंगे। यह मुद्दा सिर्फ जय भोजपुरी परिवार का ही नहीं वरन सम्पूर्ण राष्ट्र का है जिसमे सम्पूर्ण राष्ट्र को सजग होने कि जरूरत है। अगर आज राष्ट्र सजग नहीं हुआ तो ये असामाजिक एवं ओछी राजनीति चमकाने वाले तत्व देश को दीमक कि तरह चाट जायेंगे और फिर हमारे पास कहने सुनाने को कुछ नहीं बचेगा। केंद्र में एवं राज्य में सता में होते हुए भी सत्ताधारी दल के कान पर जू नहीं रेंग रहा है। अत: हम इस विरोध पत्र के माध्यम से सिर्फ ठाकरे परिवार ही नहीं वरन पुरे राष्ट्र के मतदान से सता के गलियारे तक पहुंचे लोगों को भी चेतावनी देना चाहते हैं कि अगर अब भी कोई कदम नहीं उठाया गया तो शायद लोगों का सता से विशवास ही न उठ जाए। अत: आप सबसे निवेदन है कि इस पत्र अभियान का हिस्सा बनते हुए राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को बरकरार रखने हेतु आगे आयें।

शिवानंद द्विवेदी "सहर" saharkavi111@gmail.com

Wednesday, February 24, 2010

बाल कल्याण संस्थान खटीमा द्वारा आयोजित इण्डो नेपाल बाल साहित्यकार सम्मेलन



मां पूर्णागिरि की छांव में, नेपाल की सरहद के पास, हिमालय की तराई, खटीमा, उत्तराखण्ड ...खटीमा फाइबर्स की रिसाइकल्ड पेपर फैक्ट्री का मनमोहक परिवेश ... आयोजकों का प्रेमिल आत्मीय व्यवहार ...बाल कल्याण संस्थान खटीमा द्वारा आयोजित इण्डो नेपाल बाल साहित्यकार सम्मेलन, दिनांक २०, २१ फरवरी २०१० को संपन्न हुआ।

कानपुर में एक बच्चे ने स्कूल में अपने साथी को गोली मार दी... बच्चों को हम क्या संस्कार दे पा रहे हैं ? क्या दिये जाने चाहिये ? बाल साहित्य की क्या भूमिका है , क्या चुनौतियां है ? इन सब विषयो पर गहन संवाद हुआ.
दो देशों, १४ राज्यों के ६० से अधिक साहित्यकार जुटें और काव्य गोष्ठी न हो, ऐसा भला कैसे संभव है ... रात्रि में २ बजे तक कविता पाठ हुआ .. जो दूसरे दिन के कार्यक्रमों में भी जारी रहा .. बाल पत्रिकाओ के संपादक, कवि, लेखक, बाल साहित्य मनीषी, विवेचक, स्थानीय बुद्धिजीवियों ने, व बच्चों ने कार्यक्रम में अपनी अपनी हिस्सेदारी निभाई.

९४ वर्षीय बाल कल्याण संस्थान खटीमा के अध्यक्ष आनन्द प्रकाश रस्तोगी की सतत सक्रियता, साहित्य प्रेम , व आवाभगत से हम सब प्रभावित रहे .. ईश्वर उन्हें चिरायु , स्वस्थ रखे . अन्त में आगत रचनाकारो को सम्मानित भी किया गया .जबलपुर से प्रतिनिढ़ित्व कर रहे हिन्द युग्म के पुराने सहयोगी विवेक रंजन श्रीवास्तव को भी उनके सक्रिय लेखन हेतु अंगवस्त्र स्मृति चिन्ह से सम्मानित किया गया. .उत्तराखण्ड के मुख्य सूचना आयुक्त डा॰ आर एस टोलिया जी ने कार्यक्रम का मुख्य आतिथ्य स्वीकार किया।



रचनाकारों ने परस्पर किताबों, पत्रिकाओ , रचनाओ ,विचारो का आदान प्रदान किया। कुमायनी होली.. का आगाज ..स्थानीय डा. जोशी के निवास पर ..हम रचनाकारो के साथ ..गीत संगीत के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ.

रंग अबीर उत्सव , काव्य गोष्ठी सह सम्मान समारोह आयोजित

नई दिल्ली



दिल्ली के बदरपुर इलाके में सांस्कृतिक ,साहित्यिक एवं सामाजिक संस्था लाल,कला सांस्कृतिक एवं सामाजिक चेतना मंच के तत्वावधान में पावन पर्व होली के शुभ अवसर पर रंग अबीर उत्सव, काब्यागोस्ठी सह सम्मान समारोह का आयोजन हिंदी अकादमी दिल्ली के सहयोग से किया गया .
समारोह का उदघाटन निगम पार्षद महेश अवाना, वरिष्ठ समाजसेवी भवानी प्रसद शर्मा एवं सिम्पैथी के निदेशक डॉ. आर. कान्त ने संयुक्त रूप से किया .रंगअबीर उत्सव का प्रारंभ सिम्पैथी की अध्यक्षा सीमा तिवारी के सरस्वती बंदना से आगाज हुआ .इस समारोह का संयोजन दिल्ली रत्न लाल बिहारी लाल ने किया.

कवियों का सम्मान निगम पार्षद महेश अवाना एवं वरिष्ठ चिकित्सक व् समाजसेवी डॉ.के.के तिवारी द्वारा साल और सम्मान पत्र द्वारा किया गया .कवियों में अब्दुल रहमान ,राकेश कनौजी , रसीद सैदपुरी, के. पी. सिंह. कुंवर, दिल्ली रत्न लाल बिहारी लाल, पूर्णिमा अग्रवाल, मोहमद उम्र हनीफ , आदि थे.
मंच सञ्चालन सीमा तिवारी ने किया. अतिथियों का स्वागत सिम्पैथी के निदेशक डॉ. आर. कान्त. एवं लाल कला की अध्यक्षा सोनू गुप्ता ने स्मृति चिन्ह, साल एवं सम्मान पत्र द्वारा किया.




इस अवसर पर समाज सेवी जगदीश चन्द्र ,धुरेंदर राय,पत्रकार मुन्ना पाठक,ब्रजेश तिवारी आदि कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे. अंत में लाल कला मंच के सचिव लालबिहारी लाल ने सबका धन्यबाद ज्ञापित किया.

Tuesday, February 23, 2010

हैबीटैट सेंटर में ममता किरण का काव्य पाठ



दिल्ली में ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ तथा ‘इंडिया हैबीटैट सेंटर’ बौद्धिक सांस्कृतिक गतिविधियों के महाकेंद्र माने जाते हैं। मुख्य फाटक से भीतर जाते ही एक विशाल हाल में एक से बढ़ कर एक चित्र-प्रदर्शनियाँ देखने को मिलती हैं तो किसी किसी सभागार में कविता के बहुत सुन्दर आयोजन हो रहे होते हैं। समीर कक्कड़ द्वारा स्थापित ‘यूनिवर्सल पोइट्री’ पिछले वर्ष स्थापित कविता से जुड़ी एक संस्था है जो प्रति माह काव्य गोष्ठियों में किसी एक विशिष्ट कवि की कविताओं के अतिरिक्त हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी के कई कवियों के कविता पाठ का आयोजन करती है। यह बहुत सुखद अनुभूति है कि लगभग डेढ़ घंटे में तीन चार भाषाओं में कविता के असंख्य रंग दिखने लगें। यहाँ अनुभवी कवि भी आते हैं तो युवा कवि अपनी नई वैचारिकता व उत्साह के साथ अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करते हैं। कभी-कभी विदेशों के विशिष्ट कवि भी अपनी काव्य-प्रस्तुति करते हैं।

दि. 10 फरवरी 2010 को ‘गुलमोहर हाल’ की काव्य गोष्ठी में ममता किरण ने विशिष्ट कवि के रूप में अपनी कुछ ताज़ा रचनाएँ प्रस्तुत की तथा एक बार फिर यह प्रमाणित किया कि वे छंद-मुक्त कविता तथा गज़ल, दोनों में महारत-हासिल कवयित्री हैं। मानवीय संबंधों में किसी भी प्रकार की गिलगिली संवेदना से मुक्त, उनकी पंक्तियाँ स्वाभाविक रूप से एक निर्झरिणी सी प्रवाहित होती हैं. कई पंक्तियाँ बहुत प्यारापन सा लिए रहती हैं। जैसे:

तारों भरे आसमान के साथ/ चाँद का साथ साथ चलना/ सफर में अच्छा लगता है/ कितना अच्छा होता/ इस सफर में चाँद की जगह तुम साथ होते!

या-

एक दूजे में खोना है,
चाँद-गगन सा होना है।

जहां मिलन से जुडी ये प्यारी पंक्तियाँ हैं, वहीं विरह की वेदना, जो शायद विश्व भर की कवयित्रियों की चिरपरिचित काव्य-भूमि है, पर भी ममता की कलम निर्बाध चलती है-

कभी इक पेड़ सायादार था जो,
वही अब तनहा तनहा ढल रहा है।

पर अक्सर मुझे यह लगता है कि ममता कभी कभी दार्शनिक भी हो जाती हैं या भक्ति-भाव से जुड जाती हैं। नीचे जो पंक्तियाँ उद्धृत हैं, उन्हें भगवन से भी जोड़ा जा सकता है और सांसारिक प्रेम से भी, या फिर प्रेम स्वाभावतः अलौकिक होता है, चाहे वह मनुष्य से हो या रचेता से-

ये रख अहसास तू तनहा नहीं है,
कि तेरे साथ कोई चल रहा है.

प्रेम और भक्ति मिल कर एक ही तत्व बन जाते होंगे शायद।

विरह के भाव ममता की एक तरही गज़ल में भी आते हैं। (तरही गज़ल का मिसरा है: तुझे ए जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं) -

जो राहों में तेरी यादें बहुत टकराती हैं मुझ से
तो रुक कर ख़ाक तेरे कूचे की हम छान लेते हैं.



गज़ल की परिभाषा यह कि सभी शेर अलग-अलग विषयों पर और परस्पर स्वतंत्र रहते हैं। इसी स्वतंत्रता के तहत इस तरही गज़ल का यह सामाजिक शेर-

छुपा है दिल में क्या उनके ये सब हम जान लेते हैं,
मुखौटा ओढ़ने वालों को हम पहचान लेते हैं

ममता किरण का एक प्रिय विषय है ‘माँ’। मेरा व्यक्तिगत आकलन है कि जितनी मर्म-स्पर्शी पहचान वे माँ की रखती हैं, शायद किसी अन्य विषय की नहीं. नीचे दी हुई काव्य-पंक्तियाँ अपना वक्तव्य खुद प्रस्तुर करती हैं-

बीमार जर्जर बूढ़ी माँ/याद करती है अपने बेटे को/लिखवाती है चिट्ठी पड़ोस की लड़की से/ अब ज़रूरत नहीं है तुम्हारे भेजे पैसे और दवाओं की/ सिर्फ तुम आ जाओ/ बैठो मेरे पास/ तुम्हारे बचपन की स्मृतियों में तलाशूँ अपना अतीत/ अपने जीवन की संतुष्टि।

इस गोष्ठी में कई अन्य कवियों यथा लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, सीमाब सुल्तानपुरी, ममता अग्रवाल आदि ने अपनी सशक्त कवितायें पढ़ी। इस के अतिरिक्त कजाखस्तान की कवयित्री अक्बोता महमूदिया ने कई सशक्त रूसी कवितायें पढ़ी। समीर कक्कड़ द्वारा सभी कवियां के धन्यवाद के साथ गोष्ठी संपन्न हुई।

रिपोर्ट– प्रेमचंद सहजवाला।

Monday, February 22, 2010

भूमण्डलीकरण के दौर में हिन्दी पर चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी



इन दिनों जब देश में महाकुंभ का आयोजन हो रहा है, जिसमें देश-विदेश के लोग भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव और जिज्ञासा रखते हुए भारत में आ रहे हैं। इसी तरह से चौ॰ चरण सिंह विश्वविद्यालय के ‘बृहस्पति भवन’ में हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी में देश-विदेश से आए हुए हिन्दी विद्वानों का समागम हुआ। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो॰ एस॰के॰ काक ने कहा कि भाषा सिर्फ एक माध्यम है, एक दूसरे से जुड़ने का, उसे आपस में बाँटने का माध्यम न बनाया जाए। हर भाषा को अपना विकास करने की स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए। उनका कहना था कि भाषा का प्रयोग हमें विश्व स्तर पर निजी पहचान और अस्मिता को प्रमाणित करने के लिए करना चाहिए और हिन्दी की अभिवृद्धि के लिए प्रयास की ओर अग्रसर होना होगा, यदि हम सरकार के भरोसे रहे तो हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में 62 साल तो बीत गए और भी कई साल ओर लगेंगे।

कार्यक्रम में उद्घाटन वक्तव्य देते हुए हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार श्री हिमांशु जोशी ने कहा कि आज हिन्दी दुनिया के 157 विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है और आँकड़े बताते है कि आज हिन्दी ने अंग्रेजी भाषा को बहुत पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि भारत आज एक अजीब संक्रमण काल के दौर से गुजर रहा है। एक ओर हम विकास के नए आँकड़ों को तो छू रहे हैं लेकिन नैतिकता के स्तर पर पिछड़ते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी जो आज विश्व के 132 देशों में फैली हुई है और 3 करोड़ अप्रवासी जिसे बोलते हैं, उस बोली का विकास मेरठ के गली कूचों में हुआ है। उन्होंने आँकड़े प्रस्तुत करते हुए बताया कि फीजी, मॉरीशस, गयाना, सूरीनाम, इंग्लैण्ड, नेपाल, थाईलैण्ड जैसे देशों में हिन्दी का व्यापक प्रचार-प्रसार हो रहा है। उन्होंने कहा कि हिन्दी का सोया हुआ शेर अब जाग रहा है और इसकी दहाड़ पूरी दुनियाँ सुन रही है। उन्होंने कहा कि हिन्दी का व्याकरण सर्वाधिक वैज्ञानिक है और हिन्दी की शब्द संख्या भी अंग्रेजी के मुकाबले कहीं ज्यादा है। अंग्रेजी में केवल 10 हजार शब्द है जबकि हिन्दी की शब्द सम्पदा 2.50 लाख है। उन्होंने कहा कि अतीत हमारा था, वर्तमान हमारा है और भविष्य भी हमारा होगा। इजरायल का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी समाज को अपनी आत्मालोचना करनी चाहिए कि हम आज तक हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचारित नहीं कर पाए हैं। आज वक्त आ गया है कि सरकारों के भरोसे न रहकर अपने भरोसे हिन्दी का दीपक जलाएं। काका कालेलकर का उद्धरण देते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘जो जितना अ-सरकारी वो उतना असरकारी’’। इस अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी के आयोजन के लिए मेरठ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग को धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि कैंची वालों के शहर ने वो किया है जो दिल वालों का शहर दिल्ली नही कर पाया।

विशिष्ट अतिथि इजरायल से आए हिन्दी विभागाध्यक्ष, प्रो॰ गेनाडी स्लाम्पोर ने आर्थिक उदारीकरण के दौर में हिन्दी की ताकत के बारे में बताते हुए कहा कि हिन्दी के कारण बहुत से लोगों को रोजगार मिलने लगा। हिन्दी पढ़ाते हुए मुझे काफी उपलब्धि हुई। अक्षरम् और भारत सरकार द्वारा भी पुरस्कृत किया गया लेकिन मैं उन सभी पुरस्कारों को मिलने के पश्चात् न तो अक्षरम् और न भारत सरकार के प्रति कृतज्ञ हूँ बल्कि मैं तो अपने छात्रों के प्रति कृतज्ञ हूँ जिनकी वजह से मुझे रोजगार मिला हुआ है और इस काम से मुझे आत्मसंतुष्टी मिलती है। उनका यह भी कहना था कि अंग्रेजी में हम दिमाग की बात तो कह सकते हैं लेकिन दिल की बात नहीं। हिन्दी के अनेक रूपों की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान शिव की तरह हिन्दी के भी कई सारे रूप हैं। मेरे जैसे विदेशी की समझ में नहीं आता कि मैं अपने बच्चों को मानक हिन्दी पढाऊँ या बोलचाल की हिन्दी। इन दोनों में इतना अधिक अन्तर है कि मानो यह दो भाषाएं हो। भारतीयों के सामने ये चुनौती है कि वह इन दोनों के बीच की कोई भाषा हमें बताएं जिसे हम दुनियाँ भर में पढ़ा सके।

मेरठ के सांसद और संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य श्री राजेन्द्र अग्रवाल ने कहा कि अभिव्यक्ति, सामर्थ्य और साहित्य की दृष्टि से हिन्दी विश्व की सर्वाधिक समर्थ भाषा है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है आज भी इस देश के कार्यालयों में राजभाषा की स्थिति की समीक्षा करने के लिए किसी समिति की आवश्यकता पड़ती है यह हमारे देश के राजनैतिक नेतृत्व की कमजोरी की ओर संकेत करता है। हमारे नेतृत्व में इच्छा शक्ति का अभाव है। अंग्रेजी में भाषण देने वाले सांसदों को चुनौती देते हुए उन्होंने कहा कि जो सांसद संसद में भाषण देते हैं वे अपने चुनाव क्षेत्र में अंग्रेजी में भाषण देकर दिखाए। आज तन्त्र की भाषा गण की भाषा से अलग हो गई है। इससे जनता और सरकार के बीच संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न हो गई है। मैं हिन्दी के विश्व भाषा बनने के प्रति शत-प्रतिशत आश्वस्त हूँ। बाजार के साथ-साथ हिन्दी का भी निरन्तर विकास होगा। उन्होंने कहा कि हिन्दी देश की तो माँ है लेकिन मेरठ की बेटी है इसलिए हिन्दी को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए मेरठ के लोगों को विशेष प्रयास करना होगा।

लंदन से आए वरिष्ठ हिन्दी लेखक श्री नरेश भारतीय ने कहा कि मैं 1964 से विदेश में रह रहा हूँ और 46 वर्षों से पश्चिम के झरोखे से भारत को देखने का अभ्यस्त हो चुका हूँ। अंग्रेजों की नजर में आज भी भारत सपेरों और जादूगरों का देश है। भूमण्डलीकरण का श्रेय भी अंग्रेज खुद को ही लेते है जबकि वे भूल जाते हैं कि भारतीय संस्कृति सदा से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के आदर्श का पालन करती आई है। जिसका एक संक्षिप्त स्वरूप आज का वैश्वीकरण है। उन्होंने हिन्दी को अंग्रेजी की दासी बनाने की आलोचना करते हुए कहा कि हिन्दी भाषा को अंग्रेजी का पल्लू छोड़कर स्वावलम्बी रूप से विकसित होना होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा निश्चित रूप से हिन्दी को होना चाहिए लेकिन क्या उससे पहले हिन्दी को सच्चे अर्थों में राष्ट्र भाषा नहीं बनना चाहिए। मैं जब युवाओं से हिन्दी के अध्ययन के बारे में पूछता हूँ तो वो कहते हैं कि इससे ज्ञानार्जन तो कर सकते है किन्तु धनार्जन नहीं। आज हिन्दी को अपने ही देश में परायेपन का शिकार होना पड़ रहा है। पहले हमें स्वयं स्वाभिमानपूर्वक हिन्दी का सम्मान करना होगा। फिर देश के बाहर विदेशों में हिन्दी को स्थापित करने का प्रयास स्वतः ही सफल होता चला जायेगा। उन्होंने प्रवासी, अप्रवासी और अनिवासी शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति जताते हुए कहा कि हम आज भी हृदय से भारतवासी है। इन शब्दों के प्रयोग से हमें पराया करने की जगह हमें भारतवंशी कहकर अपनी जड़ों से जुड़े रहने का सौभाग्य प्रदान करना चाहिए। आज हिन्दी भारतीय संस्कृति की संवाहिका बन चुकी है। अगर हम अपने देश में ही संस्कृति की दुर्गति दिखाई देगी तो अपने देश में हम क्या संदेश लेकर जायेंगे और अपनी युवा पीढ़ी को क्या आदर्श प्रदान करेंगे?



कनाडा से प्रकाशित होने वाली ‘वसुधा’ पत्रिका की सम्पादक श्रीमती स्नेह ठाकुर ने श्री नरेश भारतीय की बात का समर्थन करते हुए कहा कि हम भारतवंशी लोगों को वनवास दे दिया गया है। राजा रामचन्द्र तो 14 वर्ष बाद वनवास से लौट आये थे लेकिन हमें आज तक लौटने का मौका नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के समय महात्मा गाँधी से लेकर सुभाषचन्द्र बोस तक सब ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मानने का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अब हम सभी को अपनी कथनी को अपनी करनी बनाने का दायित्व निभाना है। अगर हम अकेले-अकेले भी चले तो अनेक ऐसे लोग जुड़ जायेंगे कि उनका एक समुदाय बन जायेगा। हिन्दी के उत्थान का दायित्व हम सभी का है और सभी को इसे आगे बढ़ाना होगा, भारतवंशियों को भी और भारतीयों को भी। अगर अपने देश में हिन्दी आगे नहीं बढ़ेगी तो हम बाहर इसका प्रचार-प्रसार कैसे करेंगे, हम एकदिन शिखर अवश्य छू लेंगे। कर्म पर डटे रहकर ही हम संशय को दूर कर सकते हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार श्री से.रा. यात्री ने हिन्दी के विश्व भाषा बनने के मार्ग की बाधाओं का जिक्र करते हुए कहा कि मेरठ खड़ीबोली का गढ़ है और इसी गढ़ के विश्वविद्यालय में 36 वषों तक हिन्दी का पाठ्यक्रम प्रारम्भ नहीं हुआ। हमें इसके कारणों की पड़ताल करनी होगी। बात दरअसल यह है कि हमनें राजनीतिक स्वतन्त्रता तो प्राप्त कर ली लेकिन सांस्कृतिक स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं की। हम अपनी संस्कृति की अच्छी बातों को बाहर के देशों द्वारा पहचानी जाने के बाद ही स्वीकार करते हैं। आज हमारे देश में आदमी क्षेत्र भाषा और अपने स्वार्थों में बंटा हुआ है। जिसके कारण हिन्दी सही मायनों में राष्ट्रभाषा नहीं बन पा रही है। उन्होंने कहा कि हिन्दीभाषी लोगों में भी किसी अन्य भारतीय भाषा को सीखने के प्रति उत्सुकता नहीं है। इसका परिणाम यह होता है कि थर्डग्रेड भाषा होने के बाद भी हिन्दी आज राज्य के कार्यों की भाषा बनी हुई है। हिन्दी वालों को स्वयं को बदलना चाहिए। अंग्रेजी को अन्य प्रदेश इसलिए स्वीकार करते हैं कि हिन्दी वाले उनके परिवेश, उनकी भाषा को उस तरह से स्वीकार नहीं करते हैं। आज स्थिति यह है कि हिन्दी के अध्यापक भी अपने बच्चों को ऊँचे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाते हैं। हमें यह मानसिकता बदलनी होगी।

ब्रिटेन में पूर्व हिन्दी अताशे तथा वर्तमान में राजभाषा में सहायक निदेशक श्री राकेश दुबे ने प्रोजेक्टर प्रजेन्टेशन के माध्यम से हिन्दी की निरन्तर होती वृद्धि को दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत किया। श्री दुबे ने हिन्दी की दुनिया के व्यापक परिप्रेक्ष्य को दर्शाते हुए लगभग 150 देशों में हिन्दी प्रयोग पर तथ्यात्मक प्रस्तुती दी। देश में हिन्दी भाषी राज्यों तथा पत्रकारिता एवं मीडिया जगत् में हिन्दी की स्थिति पर भी उन्होंने विस्तृत विवरण प्रस्तुत किए।

उद्घाटन सत्र के अन्त में चौ॰ चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो॰ नवीन चन्द्र लोहनी ने समस्त अतिथियों और आगंतुकों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

‘गैर हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी’ नामक द्वितीय सत्र की अध्यक्षता प्रो॰ गंगाप्रसाद ‘विमल’ ने की। विशिष्ट वक्ताओं और अतिथियों में प्रो॰ ललितम्बा, अखिल कर्नाटक साहित्य अकादमी, बंगलौर, प्रो॰ वी॰ के॰ मिश्रा, अध्यक्ष हिन्दी विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, अगरतला, डॉ॰ नजमा मलिक, हिन्दी विभाग, गुजरात विश्वविद्यालय, गुजरात, डॉ॰ गुरमीत, डॉ॰ अशोक कुमार, हिन्दी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंड़ीगढ़, प्रो॰ देवराज, अध्यक्ष हिन्दी विभाग, मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फाल तथा डॉ॰ प्रवीणा, हिन्दी विभाग, चेन्नई विश्वविद्यालय, हैदराबाद ने सहभागिता की।



प्रो॰ देवराज ने हिन्दी भाषा और भूमण्डलीकरण के अखिल भारतीय स्वरूप को लेकर कहा कि जिस नवजागरण के दम पर हम आजादी पाने का दम्भ भरते हैं उसमें सम्पूर्ण भारत की अवधारणा थी और हमें उसे स्वीकार करना होगा। हिन्दी के जिस विकास पर हम गर्व कर रहे हैं। उसको बनाने में देशीय भाषाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। कोई भी भारतीय परम्परा तब तक भारतीय नहीं है जब तक उसमें असम और कन्याकुमारी नहीं हैं। गैर हिन्दी प्रदेशों में हिन्दी की स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि हम उन लोगों के बारे में क्या धारणा रखते हैं? भूमण्डलीकरण की अवधारणा को लेकर उनका कहना था कि भूमण्डलीकरण एक आर्थिक अवधारणा है, मूलतः बाजार की अवधारणा। वैश्वीकरण का अर्थ एक मायने में अमेरिकी बाजार का प्रसार है। हिन्दुस्तान में तो वैश्वीकरण एक मायने में पहले ही आ चुका था। एक समग्रता की कल्पना भारत में पहले ही रही है। यदि हम भक्ति आन्दोलन को भी देखे तो पूर्वोत्तर को समझे बिना हम भक्ति आन्दोलन को नहीं समझ सकते। अगर हिन्दी के विकास को आप आगे बढ़ाना चाहते हैं तो तुलनात्मक अध्ययन पद्धति को अपनाना होगा। इस अवसर पर प्रो0 देवराज ने कहा कि भूमण्डलीकरण के दौर में भाषाओं की स्थिति को लेकर हिन्दी भाषा के सामने चुनौतियाँ तो हैं पर संकट नहीं। प्रौद्योगिकी और बाजार के साथ हिन्दी जितना सामंजस्य स्थापित करेगी उतनी ही तीव्र गति से वृद्धि करेगी। उन्होंने कहा कि हिन्दी के मठाधीश पूर्वोत्तर क्षेत्रों की पूर्ण रूप से उपेक्षा करते हैं और जब तक पूर्वोत्तर में हिन्दी की स्थिति का सम्यक् विश्लेषण नहीं किया जाएगा तब तक हिन्दी के प्रति सम्पूर्ण समझ विकसित नहीं हो सकती।

गुजरात विश्वविद्यालय से आयी हुई डॉ॰ नजमा मलिक ने गुजरात में हिन्दी की भूमिका और संत काव्य परम्परा में गुजरात के योगदान की ओर इंगित किया। उनका मानना था कि गुजरात का भक्ति आन्दोलन में बहुत बड़ा योगदान है और हमें इसे समझना होगा, नहीं तो हमारी समझ हिन्दी को लेकर अधूरी रह जाएगी। चीजों को सम्पूर्णता में समझने की आवश्यकता है।
डॉ॰ गुरमीत, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्ड़ीगढ का कहना था कि आज वैश्वीकरण के युग में हम अंग्रेजी के बिना अपना जीवन नहीं चला सकते। अंग्रेजी को भी भारतीय भाषाओं के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। अंग्रेजी के लडने के बहाने हम क्षेत्रीय भाषाओं से भी दूर हो गए हैं। भारतीय भाषाओं के लेखकों को भी हिन्दी में शामिल किया जाए। पंजाबी और हिन्दी को भी हमें एक साथ समझना होगा। हिन्दी को परंपरागत आधारों से आगे बढ़ना होगा अर्थात सूर, कबीर, तुलसी पर हम ज्यादा दिन तक टिके नहीं रह सकते। आज हिन्दी तब बढ़ेगी जब वह बाजार की भाषा बनेगी। बहुविविधता और बहुलता की आज अत्यन्त आवश्यकता है। हमें हिन्दी के आकाश को अनिवार्य रूप से विस्तार देना होगा। नहीं तो हिन्दी दायरों में सिमट कर रह जाएगी। मुक्तिबोध के साथ अवतार सिंह पास को भी पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता है और दक्षिण से भी नए कवियों को शामिल कर हम हिन्दी को महत्वपूर्ण रूप दे सकते हैं। उनका कहना था कि भाषाओं में अखिल भारतीयता का पुट होना अत्यंत आवश्यक है। वक्त की जरूरत के अनुसार भाषा को बाजार से भी जोड़ना होगा। हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में अखिल भारतीय भाषाओं के उत्कृष्ट अनुवाद को भी शामिल किया जाना चाहिए।

डॉ॰ अशोक कुमार, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ ने कहा कि आज जो हिन्दी का अस्तित्व है वह इस बात पर निर्भर करता है कि उसको आगे तक ले जाने वाले लोग कितने हैं? हमें दायरों से बाहर निकलना होगा। आज जो हिन्दुस्तान एशिया का नेतृत्व कर रहा है उसमें हिन्दी का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने आधुनिक युग में कबीर की जरूरत की ओर ध्यान दिलाया। अन्त में वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ग्लोबलाइजेशन के युग में हिन्दी बनी रहेगी यदि प्राणपन से लगे रहें।

अन्य विशिष्ट वक्ताओं में प्रो॰ वी॰ के॰ मिश्रा, (हिन्दी विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, अगरतला) ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति उत्साहजनक है। अरूणाचल प्रदेश में हिन्दी में काफी काम हो रहा है। यदि हमें अखण्ड भारत की कल्पना करनी है तो हम किसी एक प्रदेश के दायरों से बाहर निकलकर सम्पूर्ण भारत को एक नजरिये से देखना होगा और हमें एक यात्री की तरह होना होगा। हिन्दी सरकारी मशीनरी से आगे न बढ़ी है और न बढ़ पाएगी बल्कि यह तो श्रमवीरों की भाषा है और श्रम से ही आगे बढ़ पाएगी। उन्होंने कहा कि हिन्दी भाषा इस वजह से आगे नहीं बढ़ रही है कि सरकार इसके प्रचार-प्रसार में योगदान दे रही है बल्कि यह तो दूरदराज के क्षेत्रों में फैले हुए मनीषियों की साधना का परिणाम है।



विशिष्ट वक्ता प्रो॰ ललितम्बा (अखिल कर्नाटक हिन्दी साहित्य अकादमी, बेंगलुरू) का कहना था कि मैं हिन्दी की पक्षधर इसलिए हूँ कि भारतीय संस्कृति को हिन्दी ने जोड़ा है। एक अखिल भारतीय समाज हिन्दी में व्याप्त है। अंग्रेजी का इतिहास गुलामी के इतिहास से जुड़ा हुआ है और यह एक दूरागत भाषा है। दक्षिण में हिन्दी की स्थिति बेहतर है और तमिलनाडु आदि को भी इसी नजरिए से समझ सकते हैं। दक्षिण की हिन्दी बिल्कुल वक्त के साथ चल रही है। आधुनिक विषयों पर साहित्य में शोध हो रहा है। कोई रचना यदि इस वर्ष प्रकाशित होती है तो अगले वर्ष हिन्दी में उस पर शोध करा दिया जाता है। लेकिन हमें इस बात को भी समझना होगा कि रामचन्द्र शुक्ल के बाद कोई बड़ा इतिहास ग्रन्थ हिन्दी में नहीं लिखा गया, जिसमें समग्रता हो। हमें हिन्दी को आधुनिक दृष्टिकोण से देखना होगा।

डॉ॰ प्रवीणा (हिन्दी विभाग, चेन्नई विश्वविद्यालय, हैदराबाद) का मानना था कि हिन्दी पट्टी से अलग हिन्दी में काम करने वाले लोगों को कई समस्याओं से जूझना पड़ता है। मेरा मानना है कि हिन्दी से बैर मत करो हिन्दी अपनी भाषा है यदि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच बैर मिटाना है तो जोड़ने वाली भाषा का प्रयोग करो और यह कनेक्टिंग भाषा हिन्दी हो सकती है।
सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध कहानीकार (भूतपूर्व प्राध्यापक, जे॰एन॰यू॰, दिल्ली) का मानना था हिन्दी को हिन्दी पट्टी की संकीर्णता से मुक्त करना होगा। हमें भाषा को लचीला रखना होगा और यह भी ध्यान रखना होगा कि अन्य देशों की हिन्दी को भी उनकी निज पहचान के साथ स्वीकार करें क्योंकि सूरीनामी हिन्दी और मॉरीशस की मॉरीशसी हिन्दी को मेरठ की हिन्दी के पैमानों से नहीं समझा जा सकता।
हमें तुलनात्मक साहित्य और तुलनात्मक अध्ययन को बढ़ावा देना होगा। अनुवाद इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। ग्लोबल आधार पर अनुवाद रोजगार का बड़ा माध्यम है और हम अंग्रेजी का भी विरोध नहीं कर सकते। अंग्रेजी आज यंत्र माध्यम और विश्व की भाषा है। हमें अंग्रेजी के मैकनिज्म को समझना होगा। भाषाओं का अपना मिजाज होता है और भाषाएं दबाव के द्वारा नहीं फैलती बल्कि जनभावनाओं के द्वारा आगे बढ़ती है और हमें हिन्दी पट्टी के बाहर उन जनभावनाओं को उत्पन्न करना होगा जो हिन्दी की स्वीकार्यता को संभव बना सके।

धन्यवाद ज्ञापन देते हुए इस संगोष्ठी के संयोजक और हिन्दी विभागाध्यक्ष, चौ॰ चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ प्रो॰ नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि मेरठ विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में हिन्दी के अखिल भारतीय स्वरूप का ध्यान रखा है और संत गंगादास जैसे कवियों को भी शामिल किया है जो अपने स्वरूप में अखिल भारतीय है। न केवल क्षेत्रीय साहित्य बल्कि प्रवासी साहित्य को भी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में समाहित किया गया है और ग्लोबलाइजेशन के दौर में रोजगार की दृष्टि से जनसंचार के पाठ्यक्रम को भी चलाने की योजना है। उन्होंने सभी देश-विदेश से आयें अतिथियों का आभार व्यक्त किया।
सत्र का संचालन डॉ॰ अशोक मिश्र ने किया। सत्र का संचालन करते हुए उन्होंने वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी की स्थिति को उत्साहवर्धक बताया क्योंकि हिन्दी आज बाजार की भाषा है और हिन्दी को बाजार बहुत आगे लेकर जाएगा।

इस सत्र में लगभग 250 प्रतिभागी और विभिन्न छात्रों और शोधार्थियों ने हिस्सा लिया। जिनमें विपिन शर्मा, अजय, मोनू, राजेश, अंचल, अन्जू, गजेन्द्र, ललित, अमित आदि विद्यार्थी शामिल थे।

इसी दिन सायं 6‍ः00 बजे ‘बृहस्पति भवन’ में ‘कवि गोष्ठी’ का आयोजन किया गया। जिसमें श्रीमती जय वर्मा, स्नेह ठाकुर, प्रो॰ ललितम्बा, प्रो॰ देवराज, डॉ॰ सिद्धेश्वर तथा मेरठ के कवियों में श्री ओंकार ‘गुलशन’, डॉ॰ रामगोपाल ‘भारतीय’, शिवकुमार शुक्ल, डॉ॰ मौ॰ असलम सिद्दीकी आदि ने अपना काव्य-पाठ कर श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध कर दिया। कवि गोष्ठी का संचालन ‘अमित भारतीय’ ने किया।

13 फरवरी 2010 को अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन प्रातः 09‍ः30 बजे तृतीय सत्र ‘वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिन्दी’ विषय पर केन्द्रित रहा। सत्र की अध्यक्षता अमेरिका से आए कहानीकार और मीडिया विशेषज्ञ श्री उमेश अग्निहोत्री ने की। बीज वक्तव्य देते हुए सर्जनात्मक लेखन महात्मा गांधी केन्द्र मोकान, मॉरीशस के अध्यक्ष श्री हेमराज सुन्दर ने कहा की मॉरीशस में प्रकाशन गृहों के अभाव के कारण हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बाधा उत्पन्न हो रही है। यद्यपि वहाँ के विद्यार्थी भारतीय संस्कृति और हिन्दी भाषा में अत्यंत रूचि लेते हैं। वहाँ विश्वविद्यालय स्तर पर हिन्दी में शोध की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।
लंदन से आई कवयित्री और ब्लॉग संपादक सुश्री कविता वाक्चनवी ने कहा की भूमण्डलीकरण के दौर में हिन्दी में विकास की अपार संभावनाएं हैं। भारत के बाहर हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक लेखन गुण की दृष्टि से मॉरीशस में तथा संख्या की दृष्टि से यू0के0 में हो रहा है। आज जिस वैश्वीकरण की बात हो रही है वह बाजर से प्रेरित है। जबकि भारतीय परंपरा में भी सदियों से ‘वसुधैव कुटूम्बकम’ के रूप में यह प्रक्रिया जारी रही है। लेकिन हमारी परंपरा एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य को जोड़ने वाली है, व्यक्ति को अलगाव में डालने वाली नहीं है।

ब्रिटेन से पधारे कवि श्रीराम शर्मा ‘मीत’ ने कहा की इंग्लैड में आबादी का 4 प्रतिशत हिस्सा अप्रवासियों का है जिनमें भारतीयों की सबसे ज्यादा संख्या है। हिन्दी की स्थिति पर विचार करते हुए उन्होंने कहा की विदेशों में रहने वाले भारतीय खुद की मातृभाषा पंजाबी, बंगाली आदि बताते हैं; हिन्दी नहीं। हिन्दी को विश्व भाषा बनाने से पहले हमें सच्चे अर्थोे में पहले उसे राष्ट्रभाषा बनाना होगा।

ब्रिटेन से आई कवयित्री श्रीमती जया वर्मा ने भी ब्रिटेन में हिन्दी की स्थिति पर प्रकाश डाला उन्होंने आशा प्रकट की कि अपने प्राण एवं जीवन शक्ति के बल पर हिन्दी शीघ्र ही विश्वभाषा के स्थान पर आसीन होगी।
श्री हरजेन्द्र चौधरी ने कहा कि यदि देश ऊपर उठेगा तो भाषा भी ताकतवर होगी। ‘अक्षरम्’ संस्था के अध्यक्ष श्री अनिल जोशी ने कहा कि आज विश्व की बड़ी भाषाएं व्यावसायिक होती जा रही हैं। आज हिन्दी के क्षेत्र में सबसे बड़ी क्रान्ति यह होगी कि हिन्दी को इन्टरनेट की भाषा बनाया जाए।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए अमेरिका से आए श्री उमेश अग्निहोत्री ने कहा की हिन्दी ऐसी भाषा है जो कभी मर नहीं सकती। उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी ने कहा था कि यदि अंग्रेजी न होती तो हिन्दी संपर्क भाषा होती।

चतुर्थ सत्र ‘सूचना प्रौद्योगिकी एवं हिन्दी’ की अध्यक्षता बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झाँसी के कुलपति प्रो॰ एस॰वी॰एस॰ राणा ने की। बीज वक्तव्य देते हुए इग्नू के हिन्दी एवं मानविकी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो॰ वी॰रा॰ जगन्नाथन ने कहा की मशीन आधुनिक समय में काफी परिवर्तन और क्रांतिकारी अवधारणाओं को संभव बना सकती है। इसका उपयोग हम हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए कर सकते हैं। हिन्दी को हमें सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़ना होगा। आज भारत में अनेक ऐसी संस्थाएं कार्यरत हैं जो इस कार्य को अत्यंत निष्काम भाव से संपन्न कर रही हैं।

प्रसिद्ध प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ श्री विजय कुमार मल्होत्रा ने कहा की आज कम्प्यूटर के व्यापक प्रयोग के बावजूद हिन्दी वाले उससे वंचित हैं। हिन्दी में साहित्य से इतर अन्य विधाओं तथा पत्रकारिता, विज्ञान आदि का जिक्र न के बराबर होता है। उन्होंने बताया कि आज ऐसे अनेक कम्प्यूटर प्रोग्राम एवं कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर माजूद हैं जो हिन्दी में कार्य करने में पूर्णतः सक्षम हैं। उन्होंने अपने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से लोगों की ऑंखे खोल दी।

ब्रिटेन में भारत के पूर्व संस्कृति एवं हिन्दी अताशे श्री राकेश दुबे ने कहा कि संस्कृत का तिरस्कार करके हमने उसे पीछे डाल दिया है जबकि वह कम्प्यूटर के लिए उपर्युक्त भाषा है। इसको भविष्य में अपनाना ही होगा जिससे कि पूरे भारतीय भाषाओं के लिए हमें एक विशिष्ट भाषा रूप मिल सकेगा ।

सत्र के अध्यक्ष प्रो॰ एस॰वी॰एस॰ राणा ने उम्मीद जताई की जैसी सुविधाएं कम्प्यूटर आदि सूचना तंत्र में अंग्रेजी में मौजूद हैं शीघ्र ही हिन्दी में भी यही स्थिति होगी।

पंचम सत्र ‘अनुवाद और हिन्दी’ की अध्यक्षता प्रसिद्ध भाषाशास्त्री एवं एम॰डी॰यू॰, रोहतक से पधारे के प्रो॰ नरेश मिश्र ने की। बीज वक्तक्य देते हुए कुमायूं विश्वविविद्यालय से पधारे डॉ॰ सिद्धेश्वर ने कहा कि हिन्दी में अनुवाद और अनुवादक को वह महत्व नहीं मिलता जो एक मूल रचनाकार को मिलता है। जबकि अनुवाद भी एक रचनात्मक कार्य हैं। दूसरी भाषाओं के साहित्य से हम अनुवाद के माध्यम से ही परिचित हो पाते हैं। उन्होंने अनुवादक की पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहा की यदि हिन्दी की अनुवादित पुस्तकों में कहीं अनुवाद का नाम दिया भी जाता है तो वह अत्यंत छोटे शब्दों में होता है।
महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के साहित्य संकायाध्यक्ष प्रो॰ सूरज पालीवाल ने अनुवाद साहित्य में किए गए कार्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज हिन्दी साहित्य में एक लाख पृष्ठों का साहित्य इन्टरनेट पर उपलब्ध करा दिया गया है। हम अनुवाद को दोयम दर्जे का कार्य मानते हैं जिसके कारण विस्तृत पैमाने पर अनुवाद नहीं हो पा रहा है।
लेखिका एवं प्रख्यात लेखक खुशवन्त सिंह की रचनाओं का अनुवादक श्रीमती उषा महाजन ने कहा कि बिना संवेदनाओं को पकडे़ किसी भी साहित्यिक कृति का सच्चे अर्थों में अनुवाद नहीं हो सकता। अनुवादक को मूल भाषा और स्रोत्र भाषा की छोटी-छोटी बारीकियों का ज्ञान होना चाहिए। उन्होंने अपने अनुवाद संबंधी संस्मरणों को साझा किया तथा भाषा एवं भाव के अनुवाद पर प्रभावों की भी विस्तृत चर्चा की।

महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक की हिन्दी के आचार्य एवं सत्र के अध्यक्ष प्रो॰ नरेश मिश्र ने कहा की यदि अनुवादक में उस विधा को पकड़ने की सहृदयता नहीं है तो अनुवाद व्यर्थ हो जाता है। अनुवाद दो भाषाओं का संगम और समागम है। अनुवाद का कार्य एक तपस्या का कार्य है उसे दो भषाओं में डूबना पड़ता है। जो अनुवादक दोनों भाषाओं में जीकर अनुवाद करता है वही श्रेष्ठ अनुवादक होता है।
संगोष्ठी में देश विदेश से आए अनेक विद्वान/शिक्षक/विषय विशेषज्ञों/शोधार्थियों/छात्र-छात्राओं की सहभागिता रही।



14 फरवरी 2010 को अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम दिन षष्ठ सत्र ‘हिन्दी में विधाओं का विकास’ को लेकर अलग-अलग विधाओं को लेकर वक्ताओं ने अपने विचार रखें। सत्र में बीज व्याख्यान देते हुए पटना विश्वविद्वालय में हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो0 महेन्द्र मधुकर ने हिन्दी में कविता के विकास को लेकर अपना वक्तव्य दिया। उन्होंने श्री अटल बिहारी वाजपेयी के एक समारोह का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘‘हिन्दी की बात तो हम करते हैं किन्तु हिन्दी में बात नहीं करते।’’ भूण्डलीकरण को उन्होंने अमेरिका जैसे कुछ देशों के द्वारा मुनाफे के लिए बनाया गया एक तंत्र बताया जो पूंजीवादियों के लिए मुनाफे का माध्यम है। उन्होंने भूमण्डलीकरण को ही उत्तर आधुनिकता के जन्म का कारण बताया। जिसने उपभोक्तावाद को जन्म दिया। उन्होंने बताया कि भूमण्डलीकरण उत्तर आधुनिकता का एक बौद्धिक कक्ष हैं। उन्होंने कविता को मानव समाज की देन कहा जो समाज की कोख से पैदा होती है। भूमण्डलीकरण की जड़ें उन्होंने प्राचीन भारतीय संस्कृति में खोजी और कहा की हमारी संस्कृति ‘वसुधैव कुटम्बकम’ को अपने अन्दर समाहित करके ही सदा से चली है इसलिए भूमण्डलीकरण भारत में कोई नहीं संकल्पना नई है अपितु यह बहुत प्राचीन पद्धति है। उन्होंने उत्तर आधुनिकाता का जन्म भी प्राचीन काव्य सिद्धांतों में खोजने की बात कही। अन्त में उन्होंने कविता पर वक्तव्य देते हुए कहा कि कविता सर्वकाल से समकाल की ओर जाती है तथा आज की कविता व्यंजनात्मक है।

महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ॰ रोहिणी अग्रवाल ने उपन्यास विधा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मैं अपनी बात वहाँ से शुरू करूंगी जहाँ पर इतिहास की किताबें रूक जाती हैं। उपन्यास विधा में उन्होंने कथ्य के स्तर को जोड़ते हुए उपन्यास में परिवर्तन बिन्दुओं को रेखांकित किया। उन्होंने कमलेश्वर के उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ को संर्दभित करते हुए कहा कि उपन्यास में पुराने वर्णनात्मक और किस्सागो शैली तनाव संघर्ष को अभिव्यक्त करने में नाकाफी है। इसीलिए कमलेश्वर ने अपने उपन्यास में फैंटैसी, कल्पना, पटकथा, रिपोर्ट का एक अद्भुत प्रयोग करते हुए इतिहास को विश्लेषित किया। उन्होंने आज के उपन्यासकारों को रेंखांकित करते हुए कहा कि अब उपन्यासकार केवल वक्त पर ही टिप्पणी नहीं करते अपितु उन्हें निर्मित करने वाले कारकों और उनके पीछे छिपे तथ्यों की भी पड़ताल करते हैं।
कमलेश भट्ट ‘कमल’ ने ‘हाइकू’ पर अपने विचार रखते हुए कहा कि ‘हाइकू’ दुनिया की सबसे छोटी कविता है। जिसका जिक्र 1916 ई0 में गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार ‘हिन्दुस्तान’ पत्र में किया। हिन्दी में ‘हाइकू’ की शुरूआत करने वाले अज्ञेय हैं। जिन्होंने ‘अरी ओ करूणा प्रभामय’ में 1959 में ‘हाइकू’ के नूतन प्रयोग किए। आज ‘हाइकू’ दुनिया की हर भाषा में लिखे जा रहे हैं तथा इन्टरनेट पर इसकी हजारों वेबसाइटें मौजूद हैं। उन्होंने ‘हाइकू’ और ‘गजल’ के समानान्तर विकास की बात भी कही। हिन्दी में दो सौ पचास संकलन ‘हाइकू’ को लेकर आ चुके हैं। ‘हाइकू’ सत्रह शब्दों में जीवन की किसी गंभीर या शाश्वत सत्य को रेखांकित करने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने ‘हाइकू’ के अनेक उदाहरण देकर इस विधा की गंभीरता को भी रेखांकित किया यथा:

समुद्र नहीं/परछाई खुद की/लांघों तो जाने
कौन मानेगा/सबसे कठिन है/सरल होना


यह विधा केवल साहित्यिक विधा तक ही सीमित नहीं है अपितु यह व्यावसायिक, श्रमिक उद्योग, कांच उद्योग आदि को भी सटीक ढंग से अभिव्यक्त करने में सक्षम है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के आचार्य प्रो॰ गोपेश्वर सिंह ने आलोचना पर अपना वक्तव्य केन्द्रित करते हुए कहा कि आलोचना का संबंध विश्वविद्यालय से घनिष्ठ रूप से जुड़ा होता है क्योंकि इसका जन्म यहीं से होता है किन्तु हिन्दी साहित्य के विद्वानों ने आलोचना को उपेक्षित दृष्टि से देखा। राजेन्द्र यादव, वाजपेयी आदि लेखकों ने इसे प्राध्यापकीय/विश्वविद्यालीय आलोचना कहकर इस विधा का मजाक उड़ाया है। अन्तोन चेखव ने भी आलोचना को घोड़े की टांग की मक्खी बताया है तथा यशपाल ने भी आलोचना को गाड़ी के नीचे चलने वाला एक कुत्ता बताया है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस विधा का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है किन्तु प्रो0 गोपेश्वर सिंह का मानना है कि आलोचना हिन्दी साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण विधा है जो किसी भी कृति के गुणदोषों का सम्यक् मूल्यांकन कर पाठकों को परिचित कराती है तथा यह लेखक और पाठक के बीच सेतु का कार्य भी करती है। आलोचना के बिना हिन्दी साहित्य की सही दिशा का निर्धारण करना संभव नहीं है। उन्होंने स्वतंत्रता पूर्व की आलोचना को परिपाटीबद्ध बताया जो अपने-अपने सीखचों में बन्द थी किन्तु आज की आलोचना खेमेबाजी से युक्त प्रगतिशील आलोचना है। जो साहित्य का बिना किसी पूर्वाग्रह, बिना किसी खलनायक, बिना किसी की हत्या किए अपना पक्ष रखती है। उन्होने स्वतंत्रता पूर्व की आलोचना को बंद मन की मानसिकता जो स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, जनजातीय विमर्श को स्पेस नहीं देती जबकि आज की आलोचना इन सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त है। उन्होंने दूधनाथ सिंह की पुस्तक ‘महादेवी एक अध्ययन’ का उदाहरण भी अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए रखा।



सत्र की अध्यक्ष एवं युद्धरत ‘आम आदमी’ पत्रिका की सम्पादक रमणिका गुप्ता ने सभी के विचारों का समन्व्यय करते हुए अन्त में साहित्य में स्त्री दलित, आदिवासी की संवेदनाओं को समझने एवं अभिव्यक्त करने पर बल दिया। उन्होंने कहा उत्तर आधुनिकता कहती है कि विचार का, साहित्य का, इतिहास का अन्त हो गया। जबकि यह पश्चिम का राग है। इतिहास मे दर्ज हाशिए के लोग तो अब केन्द्र में आए हैं जबकि यह इतिहास के अन्त की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी साहित्य अब तक व्यक्तिगत कुंठाओं की बानगी था किन्तु आज परिदृश्य बदला, मूल्य बदले तथा हाशिए के लोगों को भी अपनी बात करने का साहित्य में मौका मिला। उन्होंने आलोचना को खेमेबंदी से दूर रखकर पूर्वागृहों से मुक्त होकर सम्यक् दृष्टि से विश्लेषित करने पर बल दिया। साहित्य में अब तक चारण, चापलूसी आदि की प्रवृत्ति हावी रही किन्तु आज साहित्य इन संकिर्णताओं से मुक्त होकर लिखा जा रहा है। अंत में उन्होंने हिन्दी साहित्य में स्त्री आत्मकथा तथा दलित आत्मकथाओं को एक नई शुरूआत बताया और कहा कि साहित्य जितना सरल लिखा जाएगा उतना ही पाठकों के करीब पहुँचेगा।

संगोष्ठी के समापन सत्र में कार्यक्रम अधिशासी दूरदर्शन, नई दिल्ली डॉ0 अमर नाथ ‘अमर’ ने भूमण्डलीकरण के दौर में भाषाओं, बोलियों पर केन्द्रित अपना वक्तव्य रखा। उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम से पहले की पत्रकारिता पूर्णतः आजादी से संबद्ध रही किन्तु आजादी के बाद यह एक व्यवसाय बन गई। साथ ही साथ उन्होंने समय-समय पर भाषा और बोलियों के परिवर्तन के कारणों की भी पड़ताल की।

उत्तराखण्ड भाषा संस्थान की निदेशक डॉ॰ सविता मोहन ने कहा कि हम हिन्दी साहित्य की बात करते हुए प्रायः पाठक को विस्मृत कर देते हैं जबकि वही साहित्य जीवित रहता है जो जनमानस को केन्द्र में रखकर रचा जाता है। उन्होंने साहित्य को दलित, स्त्री आदि खेमों में न बांट कर सम्रगता में देखनें की आवश्यकता जताई।

भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के निदेशक हिन्दी तथा गगनांचल पत्रिका के संपादक डॉ0 अजय गुप्ता ने हिन्दी भाषा को राजनीतिक स्पोर्ट करने पर तथा संसद में इस आवाज को बुलन्द करने पर जोर दिया तथा उन्होंने मणिपुर के विधायकों का उदाहरण देते हुए कहा कि यह कार्य वे संसद में भलिभांति कर रहे हैं। अंत में उन्होंने कहा कि यह साहित्य का कंुभ सफल रहा तथा यदि इस सभागार में शेक्सपीयर भी आया होता तो वह भी हिन्दीमय होकर जाता।

सूचना विभाग के पूर्व महादिनदेशक डॉ॰ श्याम सिंह ‘शशि’ ने अध्यक्षीय भाषण देते हुए कहा कि यह विश्वकुंभ है तथा मुझे यहाँ बहुत ही सुखद आश्चर्य अनुभव हुआ। उन्होंने कहा की हिन्दी भाषा को लेकर जो कार्य हमने शुरू किए थे उसे प्रो॰ लोहनी और उनकी पीढ़ी आगे ले जाएगी। उन्होंने हिन्दी के क्षेत्रीय रूपान्तरण को लेकर भी अपने विचार रखें तथा क्षेत्रीय भाषाओं को हिन्दी के लिए खतरे की घंटी बताया तथा हिन्दी के बिगडते स्वरूप को लेकर, समाचार पत्रों, टीवी चैनलों आदि पर चिन्ता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भाषा का अपना निज स्वरूप होता है। उसे इस कद्र नहीं बिगाड़ा जाना चाहिए कि उसका संतुलन ही बिगड़ जाए। उन्होनंे हिन्दी के विकास में गैर हिन्दी भाषियों तिलक, दयानन्द सरस्वती, के.एम. मुंशी, राजगोपालाचारी आदि के योगदान की भी चर्चा की तथा हिन्दी अनुवाद में गुणवत्ता पर भी जोर दिया तथा कहा कि तभी यह भाषा विश्व भाषा बनेगी और विश्व हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा जा सकेगा। इन सत्रों का संचालन विभाग के शोधार्थी विपिन कुमार शर्मा ने किया।

अंत में विभागाध्यक्ष प्रो॰ नवीन चन्द्र लोहनी ने सभी अतिथियों को प्रतीक चिह्न देकर सभी का आभार व्यक्त किया तथा अन्त में माननीय कुलपति प्रो॰ एस॰ के॰ काक ने धन्यवाद ज्ञापन देते हुए इस संगोष्ठी से एक सफल मुहिम और हिन्दी के प्रचार-प्रसार की संभावना को व्यक्त किया। माननीय कुलपति, प्रो॰ एस॰ के॰ काक ने कहा कि हिन्दी तभी अपना समुचित विकास कर सकेगी जब यह क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों को भी अपनाए। संगोष्ठी में उपस्थित प्रतिभागियों/श्रोताओं से खचाखच भरे सभागार को देखकर माननीय कुलपति ने संगोष्ठी के सफल आयोजन पर विभागाध्यक्ष प्रो॰ नवीन चन्द्र लोहनी को बँधाई दी।
प्रो॰ नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि इस संगोष्ठी को सफल बनाने में विभाग के शिक्षकों, कर्मचारियों, छात्र-छात्राओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं।

Sunday, February 21, 2010

भोजपुरिया शिखर सम्मेलन में लोकार्पित हुआ मनोज भावुक का चर्चित ग़ज़ल संग्रह



20 फरवरी की शाम एयरपोर्ट ऑथोरिटी ऑफ इण्डिया, दिल्ली के आफिसर्स इंस्ट्यूशनल क्लब में अन्तरराष्ट्रीय स्तर के भोजपुरी के चिन्तको की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई।

बैठक की अध्यक्षता भोजपुरी समाज, दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दुबे, संचालन डॉ रमाशंकर श्रीवास्तव एवं संयोजन मनोज भावुक और कुलदीप श्रीवास्तव ने किया।

मुख्य अतिथि अखिल विश्व भोजपुरी समाज विकास मंच जमशेदपुर के बी एन तिवारी उर्फ भाई जी भोजपुरिया एवं ख़ास मेहमान सात समुन्दर पार से आईं मारीशस की डॉ सरिता बुद्वू एवं ट्रिनिडाड की रिसर्च स्कॉलर पेंगी मोहन थीं।

कार्यक्रम तीन चरणों में बँटा था, परिचर्चा, लोकार्पण व होली मिलन।

लोकार्पण



मॉरिशस भोजपुरी संस्थान की संस्थापक डॉ सरिता बुद्वू, भोजपुरी समाज के अध्यक्ष अजीत दूबे एवं अखिल विश्व भोजपुरी समाज विकास मंच जमशेदपुर के बी एन तिवारी उर्फ भाई जी भोजपुरिया ने संयुक्त रूप से युवा कवि मनोज भावुक के लोकप्रिय व बहुचर्चित गजल संग्रह “तस्वीर जिन्दगी के” के द्वितीय संस्करण का लोकार्पण किया। इस पुस्तक के लिए मनोज भावुक को गीतकार गुलजार एवं ठुमरी साम्राज्ञी गिरजा देवी के हाथो वर्ष 2006 के भारतीय भाषा परिषद् सम्मान से नवाजा गया था। एक भोजपुरी पुस्तक को पहली बार यह सम्मान दिया गया है। हिन्द युग्म से प्रकाशित इस पुस्तक की उपस्थित विद्वानों ने प्रशंसा की और भावुक को बधाई दी। गौरतलब है कि स्तरीय साहित्य को प्रोत्साहित करने के लिए हाल ही में सम्पन्न विश्व पुस्तक मेले से हिन्द-युग्म ने प्रकाशन की शुरूआत की है।



परिचर्चा

परिचर्चा का मकसद स्पष्ट करते हुए मनोज भावुक ने कहा कि होली के पावन अवसर पर विश्व भर में फैले भोजपुरी की तमाम महत्वपूर्ण संस्थाओं का यह महामिलन समारोह है। लगभग सभी संस्थाओ के अध्यक्ष उपस्थित हैं। आज की बैठक का मुख्य उदेश्य है कि हम सब मिलकर संयुक्त रूप से भोजपुरी को उसका वाजिब हक दिलाने के लिए एक ठोस व कारगर रणनीति तैयार करें और उसे यथाशीघ्र कार्यान्वित करें।
अध्यक्षीय भाषण देते हुए अजीत दूबे ने कहा कि देश में और देश के बाहर तमाम संस्थाएँ अच्छा प्रयास कर रही हैं, लेकिन हमें एक छत के नीचे आना होगा जिसका केंद्रीय कार्यालय दिल्ली होगा। हम सब में बहुत ताकत है लेकिन इस तरह के संयुक्त प्रयास से हमारी ताकत हजार गुनी बढ़ जाएगी। भोजपुरी को अष्ठम सूची में शामिल कराना, भोजपुरी के स्वाभिमान की रक्षा करना व दिल्ली के स्कूलों में भोजपुरी पाठ्यक्रम लागू कराना हमारा मुख्य एजेण्डा होगा। हालाँकि दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल पहले ही दिल्ली के स्कूलों में भोजपुरी पाठ्यक्रम को लागू करने की घोषणा कर चुके हैं। लेकिन हम लोग इसको कार्यान्वित करने का प्रयास करेंगे।



मॉरिशस से आई सरिता बुद्वू, ट्रिनिडाड की रिसर्च स्कॉलर पेंगी मोहन एवं मुख्य अतिथि अखिल विश्व भोजपुरी समाज विकास मंच, जमशेदपुर के अध्यक्ष बीएन तिवारी उर्फ भाईजी भोजपुरिया ने अपने-अपने प्रयासों की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आज भोजपुरी को एक कॉमन प्लेटफार्म और मजबूत नेटर्वकिंग की जरूरत है।

पूर्वांचल एकता मंच के अध्यक्ष श्री शिवजी सिंह ने कहा कि हमें अपना पीठ थपथपाने की आदत व छोटी-छोटी बातों के लिए मुँह फुलौवल छोड़कर बड़े व ठोस प्रयास के लिए साधना करनी होगी। कुलदीप श्रीवास्तव ने बड़े ही सहज ढंग से कहा कि हमे सिर्फ भाषणबाजी न कर किसी ठोस निष्कर्ष की ओर बढ़ना चाहिए। रंगकर्मी व फिल्म निर्माता उमेश सिंह ने कहा कि हमें जातिवाद, क्षेत्रवाद व राजनीति से ऊपर उठकर सिर्फ भाषा की लड़ाई लड़नी होगी।

इग्नू में भोजपुरी के प्रणेता प्रो॰ शत्रुघ्न कुमार, नाटककार महेन्द्र प्रसाद सिंह, लोकदृष्टि संपादक राजेश पाण्डेय, महिला सेवा अर्पण केन्द्र की संचालिका पूनम सिंह, वेववार्ता संपादक सईद अहमद, भोजपुरी समाज के उपाध्यक्ष प्रभुनाथ पाण्डेय, प्रदीप कुमार पाण्डेय, बिहारी खबर के मुन्ना पाठक, सन्तोष पटेल एवं भोजपुरी कॉग्रेस के अध्यक्ष सुधीर सिंहा ने ऐसे प्रयास का पुरजोर सर्मथन किया।

सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि सार्थक प्रयास हेतु शीघ्र ही अजीत दूबे के नेतृत्व में एक कोर कमेटी का गठन किया जाएगा।

होली मिलन

अन्त में फागुन का उत्पात चालू हो गया। डॉ॰ सरिता बुद्वू ने गाया- होली खेले रघुबीरा अवध में तो भाईजी भोजपुरिया ने गाया- पिया काहे अइल होली के बिहान! पूरा महफ़िल फगुआ गया! सबको अबीर गुलाल लगाया गया और इस तरह से यह ऐतिहासिक भोजपुरिया शिखर सम्मेलन सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया।

Friday, February 19, 2010

ठाकरे परिवार के खिलाफ खड़े हुए आम भोजपुरिया लोग, प्रधानमंत्री को लिखा विरोध पत्र

एक लाख पोस्ट कार्ड प्रधानमंत्री को भेजने की अपील



विगत चौदह फरवरी को दिल्ली के आई .टी .ओ स्थित राजेन्द्र भवन में जय भोजपुरी मिलन समारोह का आयोजन किया गया। समारोह में एक सोशल भोजपुरी वेबसाइट के सदस्यों ने भाग लिया। समारोह की शुरूआत सदस्यों के आपसी मेल-जोल एवं परिचय आदान-प्रदान से हुई। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए जय भोजपुरी के सक्रीय सदस्य श्री सुधीर कुमार ने राज ठाकरे एवं बाल ठाकरे द्वारा जारी राष्ट्र विरोधी कुकृत्यों के सार्वभौमिक विरोध से की। समारोह को संबोधित करते हुए सुधीर कुमार ने कहा की अब वो समय आ गया है जब आम जनता को इन राष्ट्र विरोधी तत्वों के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए। इसी क्रम में सुधीर कुमार ने यह भी कहा की हमारा प्रथम लक्ष्य तीन माह के अन्दर लगभग एक लाख विरोध पत्र प्रधानमंत्री महोदय तक प्रेषित करना है। इस अभियान में आम जनसमुदाय का सहयोग अनिवार्य एवं आपेक्षित है। समारोह की अध्यक्षता कर रहे सत्येन्द्र जी ने भी सहयोग की अपील की।

कार्यक्रम का प्रथम चरण समाप्त होते ही श्री मोंटू सिंह जी ने सबको लिट्टी चोखा खाने के लिए निमंत्रित किया। कार्यक्रम के दूसरे चरण की शुरूआत विरोध पत्र लेखन से हुई जिसमें कार्यक्रम में उपस्थित सभी सदस्यों ने ठाकरे परिवार के प्रति प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर अपना विरोध प्रदर्शित किया। इसी कड़ी में तमाम सदस्यों ने अपने सुझाव एवं विचार व्यक्त किये।
समारोह का अंतिम चरण भोजपुरी संगीत के उभरते कलाकारों के गीत संगीत के नाम रहा। इस क्रम में नवोदित भोजपुरी गायक पंकज प्रवीण के आगामी एल्बम "चाहत में सनम" के बारे में सूचित किया गया। साथ ही भोजपुरी गायिका भानुश्री ने अपनी एल्बम "ए डार्लिंग" की एक-एक सी.डी सबको भेंट की। कार्यक्रम के अंतिम संबोधन में सभी ने विरोध पत्र के लिए आम जन समुदाय को प्रेरित करने का संकल्प लिया। आप सभी पाठकों से अनुरोध है की इस राष्ट्रहित में जारी विरोध अभियान में हिस्सा लेते हुए इस अभियान को सफल बनाए।

अगर आप खुद ही पत्र लिख कर पोस्ट करना चाहते हैं तो अपना सन्देश लिख कर (किसी भी भाषा में) निम्नलिखित पते पर भेंजे-

प्रधानमंत्री कार्यालय
साउथ ब्लाक, रायसिना हिल्स
नई दिल्ली 110101

अगर आप स्वयं पत्र लिख पाने में असमर्थ हैं तो कृपया अपना नाम, पूरा पता kumar@bhojpuria.com पर अपने सन्देश के साथ मेल करें। ज्यादा जानकारी के लिए सीधा संपर्क करें --9716248802
शिवा नन्द द्विवेदी "सहर"

Wednesday, February 17, 2010

आनंदम् की फाल्गुनी शाम



मंगलवार दिनांक 16 फरवरी 2010 की शाम मैक्स इंश्योरेंस कंपनी के कनॉट प्लेस स्थित सभागार में आनंदम् की 19वीं काव्य गोष्ठी अपने विविध रंगों के साथ संपन्न हुई जिसकी अध्यक्षता परिचय साहित्य परिषद की अध्यक्ष श्रीमती उर्मिल स्त्यभूषण ने की। उर्मिल जी ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में आनंदम् को ऐसी उत्कृष्ट गोष्ठी आयोजित करने के लिए बधाई देते हुए कहा कि यदि मैं आज यहाँ न आती तो इतने अच्छे-अच्छे शायरों व कवियों को सुनने से वंचित रह जाती। उन्होंने कहा कि यह संयोग ही है कि यह गोष्ठी फागुन मास में हो रही है और मेरा जन्म भी फागुन मास में ही हुआ है, शायद इसीलिए मेरी रचनाओं में भी अनेंक रंग मिलते हैं। जो बात मैं कविता गीत या ग़ज़ल में नहीं कह पाती वह कहानी, लेख या नाटक के माध्यम से कह देती हूँ। इसके बाद उन्होंने अपनी कुछ चुनिंदा रचनाएँ पेश कीं।

गोष्ठी में निम्न लिखित कवियों व शायरों ने शिरकत की-
सर्वश्री लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, मुनव्वर सरहदी, अनीस अहमद ख़ान अनीस, मासूम ग़ाज़ियाबादी, पीके स्वामी, श्याम सुन्दर नन्दा नूर, डॉ. उपेन्द्र दत्त, भूपेन्द्र कुमार, शैलेश सक्सैना, ज़र्फ़ देहलवी, नश्तर अमरोहवी, जय प्रकाश शर्मा विवध, मजाज़ अमरोहवी, पंडित प्रेम बरेलवी, विवेक मिश्र, डॉ. ज़फर मुरादाबादी, प्रेमचंद सहजवाला, वीरेन्द्र क़मर, फ़ख़रुद्दीन अशरफ, मजाज़ अमरोहवी, डॉ. अहमद अली बर्क़ी आज़मी, श्रीमती शारदा कपूर, चित्रलेखा डोगरा एवं शोभना मित्तल

हमेशा की तरह गोष्ठी का सहज व सरस संचालन श्रीमती ममता किरण ने किया।

गोष्ठी में गीत, ग़ज़ल एवं छन्दमुक्त सभी तरह की भावपूर्ण रचनाएँ सुनने को मिलीं। पढ़ी गई कुछ रचनाओं की बानगी देखें-

डॉ. उपेन्द्र दत्त-
राहे इंसानियत भी क्या ख़ूब है, तड़पती बेबसी और ज़िन्दगी मजबूर है
बेमुरव्वत ज़माने का कैसा ये दस्तूर है, मासूम चेहरों पर मायूसी, कातिलों पर नूर है

ज़र्फ देहलवी-
मुहब्बत है तो ग़म के इमकान होंगे
बहुत सी मुश्किलों के सामान होंगे

डॉ. ज़फ़र मुरादाबादी-
न दे वो ज़ख़्म मगर थोड़ा इज़्तेराब तो दे
जमूद-ए- अस्र को तहरीक-ए-इंक़लाब तो दे

अनीस अहमद खान अनीस-
आदर्श राम का कहाँ अपने वतन में है
लगता है मुझको राम मिरा अब भी वन में है

विवेक मिश्र-
मेघ तुम बहरे हुए.........
रूठे हुए हो पाहुने से

मासूम ग़ाज़ियाबादी-
किसी बेबस की ख़ातिर तेरी आँखों में नमी होना
इसी होने को कहते हैं ख़याले आगही होना

श्यामसुन्दर नन्दा नूर-
यूँ तो सिलते हैं हज़ारों ही बशर मिलने को
कह किसी को कहाँ मिलती है तबीयत अपनी

शोभना मित्तल-
शायद गुलाब का मन मुझसे नहीं मिलता
इसीलिए वो मेरे आँगन में नहीं खिलता

पंडित प्रेम बरेलवी-
आप दिल का चैन हैं, दिल की चुभन भी आप हैं
आप ही हैं गुलबदन, शोलाबदन भी आप हैं

शैलेश सक्सैना-
उसके चेहरे पर जब चमक आती है
धूप भी किनारे पर सरक जाती है



फखरुद्दीन अशरफ-
दुआ के साथ फ़क़त आँसुओं के कुछ क़तरे
ग़रीब बाप था बेटी को और क्या देता

भूपेन्द्र कुमार-
हम सभ्य और सुसंस्कृत लोग,
कभी धधका देते हैं अग्नि किसी नवोढ़ा पर सौम्यता से
कभी कर देते हैं धर्म पथ रक्तमय निर्भीकता से
कभी कर देते हैं नगर भर अग्निमय नीति से.....

शिव कुमार मिश्र मोहन-
पर देखिए न सब कुछ बाँटते हैं
भाषा, जाति, धर्म, कर्म
लेकिन अफसोस, दुख-पीड़ा नहीं बाँट पाते हैं

जगदीश रावतानी-
न दुनिया न दौलत दुआ चाहता हूँ
मैं दोस्तों की उल्फत सदा चाहता हूँ
ज़रूरत नहीं मन्दिरों मस्जिदों की
मैं इन्सान में ही ख़ुदा चाहता हूँ

पी. के. स्वामी-
यहाँ के हुस्नवालों की गजब की दिलनवाज़ी है
वो ज़ालिम रूठ कर भी जाने जाँ मालूम होते हैं

नश्तर अमरोहवी-
गुन पड़ोसी के गाती रही रात भर
एहलया बड़बड़ाती रही रात भर
न कोई गुफ्तगू न कोई जुस्तजू
सिर्फ गुटका चबाती रही रात भर

मुनव्वर सरहदी-
अब किसी भी महफिल में बैठो, या बोतल है या साक़ी है
कुछ बूढ़े रह गए मन्दर में बस यही करैक्टर बाक़ी है

अंत में आनंदम् की ओर से श्री जगदीश रावतानी ने सब के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया और कहा कि आशा है हमेशा आप सब का प्यार इसी तरह मिलता रहेगा।

अभिषेक कश्यप को पहला युवा कथा सम्मान

संगीत-साहित्य उत्सव 2010

डाला । सोनभद्र


उदय प्रकाश के हाथों सम्मान ग्रहण करते अभिषेक कश्यप

‘अभिषेक अपनी कहानियों में एक लगभग अंधेरे भविष्य की ओर बढते देश के युवाओं के अंतर्मन की जटिलताओं को रचनात्मक अभिव्यक्ति देते हुए एक भयावह यथार्थ से हमारा परिचय कराते हैं।’ ये बातें विख्यात कवि-कथाकार उदय प्रकाश ने युवा कथाकार अभिषेक कश्यप को श्री अचलेश्वर महादेव मंदिर फाउंडेशन, डाला, सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) द्वारा आयोजित संगीत-साहित्य उत्सव में पहला युवा कथा सम्मान प्रदान करते हुए कही। यह पुरस्कार अभिषेक कश्यप को उनके पहले कथा संग्रह खेल पर दिया गया। पुरस्कारस्वरूप श्री कश्यप को स्मृति-चिन्ह और 21 हजार की राशि प्रदान की गई। उदय प्रकाश ने आगे कहा -‘साल 2000 में ‘स्वाधीनता’ के ‘साहित्य विशेषांक’ के संपादक के तौर पर मैं अभिषेक की कहानी ‘जाम-बेजाम’ का पहला पाठक था और इनकी ‘खेल’ कहानी मुझे बहुत प्रिय है। इस पुरस्कार के बाद एक कथाकार के रूप में इनका दायित्व बढ जाता है।’

भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार विजेता युवा कवि-चित्रकार अमित कल्ला ने अभिषेक कश्यप की कहानियों पर बात करते हुए कहा -‘खेल संग्रह में 11 कहानियाँ हैं जिनमें अभिषेक ने बहुत मौलिकता के साथ चीजों को सामने रखा है। इन कहानियों में जीवन के विविध रंग-रेखाएं हैं। इन कहानियों को पढते हुए लगता है मानो हम खुद इनका हिस्सा हों। यहां अभिषेक एक यात्री के रूप में हैं और यात्रा की स्मृतियों को यादगार कहानियों में बदल देते हैं।’

इस दोदिवसीय ‘संगीत-साहित्य उत्सव’ के पहले दिन (13 फरवरी) गुंदेचा बंधुओं के गुरुकुल की पहली प्रशिक्षित गायिका अमिता सिन्हा ने ध्रुपद गायन पेश किया और युवा पखावजवादक सुखद मानिक मुंडे ने पखावजवादन पेश किया।

दूसरे दिन (14 फरवरी) आयोजित साहित्य उत्सव में युवा कथा सम्मान समारोह के साथ सेमिनार, युवा कविता गोष्ठी और कथा-पाठ का भी कार्यक्रम रखा गया था। सेमिनार का विषय था -‘आज हमें कैसे साहित्य की जरूरत है।’ उदय प्रकाश ने इस विषय पर कुछ इस तरह अपनी बात रखी -‘साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। मगर साहित्य सिर्फ दर्पण नहीं, क्योंकि दर्पण स्वप्न नहीं देखता जबकि साहित्य समाज का स्वप्न है। महात्मा गांधी ने जिस अंतिम आदमी की बात की थी, साहित्य उस अंतिम आदमी की आँख का आँसू भी हो सकता है, चीख भी हो सकती है।’ सांस्कृतिक पत्रकार अजित राय ने कहा कि आज साहित्य महानगरों से ज्यादा दूरदराज के क्षेत्रों के लिए होना चाहिए क्योंकि महानगरों में साहित्य के पाठक अब नहीं बचे हैं।’ युवा रचनाकार आशुतोष मिश्र ने कहा -‘आज ऐसे साहित्य की जरूरत है जो उनकी आवाज बने जिनकी आवाज पहले कभी नहीं सुनी गई। ऐसा साहित्य, जो समाज के उस आखिरी आदमी को अपनी बात कहने का मौका दे जिसे आज तक बोलने नहीं दिया गया।’ साहित्यकार राजेंद्र प्रसाद पांडेय ने कहा कि वैश्वीकरण ने हमारी रुचियों को जबरन बदल डाला है जिसका प्रभाव हमारे समकालीन साहित्य पर पड़ा है। कला समीक्षक मंजरी सिन्हा ने कहा-‘अच्छे साहित्य, अच्छी कला से हमारी उदारता को, अच्छाई को सम्पोषण मिलता है।’

कवि-गोष्ठी में अमित कल्ला, वाजदा खान, ध्यानेंद्र मणि त्रिपाठी, दीपक दुबे और धनंजय सिंह राकिम ने अपनी कविताओं का पाठ किया जबकि कथा पाठ में पुरस्कृत कथाकार अभिषेक कश्यप ने अपनी कहानी ‘स्टेपिंग स्टोन’ का पाठ किया। इस अवसर पर एक अंतरविद्यालयीन कविता प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया था जिसमें अन्नु कुमारी, आकांक्षा यादव और दीक्षा को क्रमश पहला, दूसरा और तीसरा पुरस्कार दिया गया।
भवदीय

प्रेषक-चन्द्रप्रकाश तिवारी
सचिव
श्री अचलेश्वर महादेव मंदिर फाउंडेशन
डाला, सोनभद्र

Tuesday, February 16, 2010

आनंदम की दूसरी विचार गोष्ठी


आनंदम ने नए वर्ष से अपनी गतिविधियों में एक और अध्याय की जो शुरूआत की थी उसी कड़ी में 5 फरवरी 2010 को कस्तूरबा गाँधी मार्ग स्थित मैक्स इंश्योरेंस के सभागार में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया जिसमें मेडिकल एथिक्स पर चर्चा की गयी। इस गोष्ठी में शिरकत करने वालों के नाम इस प्रकार है: सर्व श्री मुनव्वर सरहदी, रमेश भम्भानी, गुलाबराय, रमेश धर्मदासानी, भूपेंद्र कुमार, जगदीश रावतानी, मनमोहन तालिब, शैलेश सक्सेना, रविंदर शर्मा रवि, श्रीमती दिनेश आहूजा, तरुण रावतानी, साक्षात भसीन, पीसीएस कन्नौजिया , रामनिवास "इंडिया" एवं सत्यवान।



सबसे पहले आनंदम के अध्यक्ष जगदीश रावतानी ने उपस्थित प्रतिभागियों का स्वागत किया एवं विषय प्रवेश करते हुए कार्यक्रम के स्वरुप से सभी को अवगत कराया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार डॉ विजय कुमार ने मेडिकल एथिक्स पर अपना आलेख प्रस्तुत किया एवं डॉक्टरों के कर्तव्यों व मरीजों के हकों से अवगत कराते हुए डॉक्टरों की प्राथमिकताओं, न्याय, निदान में चूक और लापरवाही, धर्म व जाति आधारित भेदभाव की मनाही एवं मर्सी किलिंग आदि विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला। इसके बाद कई बातों पर गर्मागर्म चर्चा भी हुई जैसे मेडिक्लेम होने पर बिल बढ़ाने के चक्कर में अस्पतालों द्वारा ज्यादा दिनों के लिए मरीज की भर्ती, अनावश्यक रूप से वेंटिलेटर पर रखे रखना, व्यस्तता के रहते मरीज को उचित समय न देना इत्यादि। प्रतिभागियों ने कई सवाल भी पूछे और ससामूहिक चर्चा में भाग ले कर गोष्ठी को जीवंत बना दिया। गोष्ठी के अंत में श्री जगदीश रावतानी ने सबका धन्यवाद किया।

Sunday, February 14, 2010

दानिश को उर्दू अकादमी को 'सुखन' अवार्ड

ग्वालियर।

जाने-माने शायर मदन मोहन मिश्र 'दानिश' को म॰प्र॰ उर्दू अकादमी का प्रतिष्ठित शंभूदयाल 'सुखन' अवार्ड से नवाजा गया है। इसकी घोषणा सोमवार को भोपाल में अकादमी की ओर से की गई।

अकादमी की ओर से वर्ष 2009-10 के लिए घोषित विभिन्न पुरस्कारों में शंभूदयाल 'सुखन' पुरस्कार श्री दानिश को दिया जाएगा। यह पुरस्कार उन्हें 10 फरवरी को भोपाल में आयोजित होने वाले एक समारोह में प्रदान किया जाएगा।

सम्मानों को चयन लखनऊ के डॉ॰ मलिक जादा मंजूर अहमद की अध्यक्षता में आज यहाँ आयोजित बैठक में किया गया। बैठक में समिति के अन्य सदस्यों में अध्यक्ष उर्दू अकादमी पद्मश्री डॉ॰ बशीर बद्र, उपाध्यक्ष श्री जफर बैग, डॉ॰ मुजफ्फर हनफी, दिल्ली, डॉ॰ नसीम अंसारी, श्री रशीद अंजुम, श्री गोविन्द आर्य निसाद, श्री आरिफ अजीज, भोपाल, श्री तारिक शाहीन, इंदौर, सदस्य सचिव श्रीमती नुसरत मेंहदी ने शिरकत की।

उल्लेखनीय है कि उर्दू अदब की दुनिया में प्रतिष्ठित मदन मोहन 'दानिश' का ग़ज़ल संग्रह 'अगर' काफी चर्चित रहा। 'दानिश' की शायरी को देश ही नहीं दुनिया के तमाम मुल्कों में मुशायरों के मंच एवं पत्र-पत्रिकाओं में सराहा गया है। वे दुबई, पाकिस्तान, शारजाह की साहित्यिक यात्रा कर चुके हैं। उनका अगला ग़ज़ल संग्रह भी शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। इस उपलब्धि पर श्री 'दानिश' को उनके मित्रों व शुभचिंतकों ने बधाई दी है।

Thursday, February 11, 2010

यूँ अनावरित हुए 'काव्यनाद' और 'सुनो कहानी'


आप इस पूरे कार्यक्रम को सुन भी सकते हैं, आपको ऐसा प्रतीत होगा कि आप भी कार्यक्रम में उपस्थित हैं। नीचे के प्लेयर से सुनें-

कुल प्रसारण समय- 1 घंटा 20 मिनट । अपनी सुविधानुसार सुनने के लिए यहाँ से डाउनलोड करें।


19वें विश्व पुस्तक मेले में हिन्द-युग्म ने कई तरीके से धूम मचाई। किसी इंटरनेटीय समूह का प्रकाशन में एक साथ पाँच पुस्तकों के साथ प्रवेश हो या फिर साहित्य और संगीत के मेल का अभिनव प्रयोग, ये हिन्द-युग्म के ऐसे अध्याय बने जिनको पढ़कर हिन्दी की इंटरनेटीय उपस्थिति की गंभीरता का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

विश्व पुस्तक मेला की शुरूआत 30 जनवरी 2010 को हुई। 31 जनवरी को हिन्द-युग्म ने तीन पुस्तकों के लोकार्पण का कार्यक्रम आयोजित किया (इन पुस्तकों में से 'शब्दों का रिश्ता' हिन्द-युग्म के अपने प्रकाशन की पुस्तक थी)।

1 फरवरी 2010 को नई दिल्ली के प्रगति मैदान के सभागार-2 में हिन्द-युग्म ने अपना 'आवाज़ महोत्सव' मनाया जिसमें जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त की प्रतिनिधि कविताओं के संगीतबद्ध एल्बम ‘काव्यनाद’और प्रेमचंद की कहानियों के एल्बम 'सुनो कहानी' का विमोचन हुआ। जहाँ 'सुनो कहानी' का विमोचन महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय ने किया, वहीं काव्यनाद का विमोचन वरिष्ठ कवि और ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक बाजपेयी ने किया। इस कार्यक्रम में संगीत विशेषज्ञ और 'संगीत-संकल्प' पत्रिका के संपादक डॉ॰ मुकेश गर्ग दोनों एल्बमों पर टिप्पणी करने के लिए उपस्थित थे। संचालन प्रमोद कुमार तिवारी ने किया।


'काव्यनाद' का लोकार्पण करते विभूति नारायण राय, अशोक बाजपेयी और डॉ॰ मुकेश गर्ग

कार्यक्रम की शुरूआत में हिन्द-युग्म के कार्यकर्ता दीप जगदीप ने आवाज़ की गतिविधियों का संक्षिप्त परिचय उपस्थित श्रोताओं को दिया। आवाज़ की गतिविधियों से रूबरू होकर बहुत से दर्शकों को सुखद आश्चर्य हुआ कि सजीव सारथी के निर्देशन में हिन्द-युग्म का आवाज़ मंच ढेरों विविधताओं को समेटे है।

इसके बाद वर्ष 2009 के संगीत-आयोजन के सरताज गीत और लोकप्रिय गीत पुरस्कारों का वितरण हुआ। इसके तहत पुणे के संगीतकार-गायक रफीक शेख को रु 6000 का नगद इनाम (सरताज गीत के लिए) और केरल के निखिल-चार्ल्स-मिथिला की टीम को रु 4000 का नगद इनाम (लोकप्रिय गीत के लिए) दिया गया। जहाँ लोकप्रिय गीत के पुरस्कार का चेक लेने के लिए निखिल अपने पिता और अपनी बहन निखिला के साथ इस कार्यक्रम में उपस्थित होने केरल से पधारे थे , वहीं रफ़ीक शेख़ का चेक रफीक की ओर से हिन्द-युग्म के कवि मनीष वंदेमातरम् ने लिया।

दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के एसोशिएट प्रोफेसर डॉ॰ मुकेश गर्ग ने बहुत सधी हुई भाषा में साहित्य और संगीत के अंतर्संबंध पर अपनी रखी। उन्होंने बताया कि 50 के दशक में रेडियो पर सुगम संगीत (लाइट म्यूजिक) की शुरूआत फिल्मी गीतों की प्रतिक्रिया के तौर पर हुई थी। उस जमाने के साहित्य, कला और संगीत के कर्णधार ये मानते थे कि फिल्मी संगीत घटिया म्यूजिक है और उन्होंने फिल्मी गीतों का रेडियो पर प्रसारण बंद करवा दिया। लेकिन लोकतंत्र में लोक की पसंद का भी ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए 5-7 साल के अंदर ही विविध भारती चैनल शुरू करना पड़ा। मज़े की बात ये है कि सौंदर्य और अभिरुचि समय के साथ इस तरह बदलती है कि कई बार उनपर विचार करने से ताज्जुब होता है। 50 और 60 के दशक के फिल्मी गाने आजके लोगों के लिए श्रेष्ठता के मानदंड बने हुए हैं, जबकि उस समय के विशेषज्ञ उसे घटिया मानते थे। सुगम-संगीत बहुत लोकप्रिय नहीं हुआ, जबकि इसमें गंभीर साहित्य को संगीत के साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा था।

डॉ॰ मुकेश गर्ग ने निराला की गीतिका और रवीन्द्र नाथ टैगोर के रवीन्द्र संगीत के माध्यम से अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि गेयता किसी शब्द के अंदर ही होती है। नवभारत टाइम्स, जनसत्ता को आप भले ही गा दें, लेकिन इससे नवभारत टाइम्स गेय नहीं हो जायेगा। हमारे भक्तिकालीन जितने भी कवि हुए, उन सबकी रचनाएँ तब से लेकर अब तक गायी जाती हैं। संगीत को साड़ी की तरह नहीं लपेटा जा सकता। बहुत कम ऐसा हो पाता है कि कोई बहुत बढ़िया रचना को कोई संगीतकार उसी साहित्यिक गंभीरता और संवेदनात्मक स्तर के साथ गा ले। कर्ण का कवच-कुंडल को बाहर से पहनाना अलग बात है और कर्ण के शरीर पर उसे देखना एक अलग बात है। भक्तिकालीन गीतों की खासियत यह थी कि उनकी रचना प्रक्रिया में ही संगीत घुसा हुआ था। गाते-गाते रचा गया। इसी वजह से भक्तिकालीन सारी रचनाएँ लोकभाषा में होती थीं। यहीं पर शब्दों के गोल होने की बात उठती है। लोक किसी शब्द को घिस-घिसकर गोल बना देता है। लोकभाषा अक्सर गोल होती है। कृष्ण संस्कृत का शब्द है, कान्हा उसे सॉफ्ट बनाने की कोशिश है, कन्हाई थोड़ा और गोल बनाने की कोशिश और कन्हैया पूरी तरह से गोल हो चुका शब्द है। कोई शब्द 4-5 पीढ़ियों के यात्रा के बाद गेय होता है। इसीलिए संस्कृत कभी गेय भाषा नहीं रही। वह स्वरों के साथ पाठ की भाषा रही। शास्त्रीय संगीत के लिए ब्रजभाषा सबसे उपयुक्त भाषा है।

'काव्यनाद' पर टिप्पणी करते हुए मुकेश गर्ग ने कहा सबसे पहले मैं इस बाद के लिए हिन्द-युग्म को साधुवाद देना चाहूँगा कि इसने उन कविताओं को संगीतबद्ध करने की कोशिश की है जिन्हें गाना बहुत मुश्किल है, उसकी वजह यह है कि ये सभी कविताएँ संस्कृष्ठनिष्ठ शब्दों वाले हैं, उन्हें संगीतबद्ध करना तो मुश्किल नहीं है, लेकिन ऐसा बनाना कि लोग इसे गायें, बहुत मुश्किल है। सभी कविताओं के मुझे वो संस्करण पसंद आये जो बिना ताल के गाये गये हैं, लेकिन मुझे कुहू गुप्ता का पाश्चात्य शैली में गाया गया एक गीत 'जो तुम आ जाते एक बार' बहुत पसंद आया। इस गीत के बीच में नाटकीय ढंग से बोला गया डायलाग भी बहुत पसंद आया। मुझे यदि 'काव्यनाद' से कोई एक गीत चुनना हो तो यही गीत चुनूँगा। मैं चाहता हूँ कि इस तरह के प्रयास ज़ारी रहे।


'सुनो कहानी' का लोकार्पण करते विभूति नारायण राय, अशोक बाजपेयी और डॉ॰ मुकेश गर्ग

प्रेमचंद की कहानियों के एल्बम 'सुनो कहानी' पर टिप्पणी करते हुए महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति और प्रसिद्ध कथाकार विभूति नारायण राय ने कहा कि हमारे समय में यथार्थ कितनी तेजी से बदल रहा है यह देखना हो तो आज से पहले जब कहा जाता था कि 'मसि-कागद छुयो नहीं॰॰॰॰' को अब ऐसे कहा जा सकता है कि यदि आपने माउस-कीबोर्ड नहीं छुआ तो आज के समय के साथ कदमताल नहीं कर सकते। उन्होंने प्रेमचंद के डिजीटल रूप की प्रसंशा की और कहा कि यदि हिन्द-युग्म चाहे तो हमारा विश्वविद्यालय हिन्द-युग्म के साथ मिलकर इस तरह के प्रयासों में भागीदार हो सकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय की वेबसाइट हिन्दीसमय डॉट कॉम पर जल्द ही 1 लाख साहित्यिक पृष्ठों के अपलोडिंग की बात की और कहा कि हिन्द-युग्म या अन्य कोई वेबसाइट जब चाहे तब उनकी वेबसाइट से आवश्यक जानकारियाँ ले सकता है और हिन्दी के बड़े समुदाय तक हिन्दी साहित्य की बातें पहुँचा सकता है।

अंत में कार्यक्रम के संचालक प्रमोद कुमार तिवारी ने कार्यक्रम के अध्यक्ष, ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और वरिष्ठ कवि अशोक बाजपेयी को माइक पर आमंत्रित किया। अशोक बाजपेयी ने कहा कि पहले यह बात समझने वाली है कि इससे क्या साहित्य और संगीत की लोक-पहुँच पर कोई फर्क पड़ता है। भारत में 19वीं सदी तक कविता, संगीत और रंगमंच साथ-साथ थे, लेकिन जब पश्चिम प्रेरित आधुनिकता का हस्तक्षेप हुआ तब ये तीनों चीजें अलग-अलग हो गईं। कई बार इनके बीच की खाई पाटने की कोशिश हुई है और मैं इस प्रयास का भी स्वागत करता हूँ।

उन्होंने आगे कहा कि कविता में संगीत खुद होता है, कवि या कोई काव्य-मर्मज्ञ उसे जब पढ़ता है या गाता है तो संगीत के साथ ही गाता है। इसे गहराई से समझने की ज़रूरत है कि कविता गाने से क्या उसके नये अर्थ खुलते हैं।

अंत में गायक संगीतकार निखिल, कृष्णा पंडित और निखिला ने आवाज़ का उद्‍‌घोष गीत 'आवाज़ के रसिया हैं हम'प्रस्तुत किया जिसे इन्होंने कार्यक्रम शुरू होने से कुछ समय पहले ही तैयार किया था। धन्यवाद ज्ञापन आवाज़ के संपादक सजीव सारथी ने किया।

कार्यक्रम में 'काव्यनाद' के संकल्पनाकर्ता आदित्य प्रकाश और इस प्रोजेक्ट के सहयोगी ज्ञान प्रकाश सिंह को भी उपस्थित होना था, लेकिन किन्हीं अपरिहार्य कारणों से सम्मिलित न हो सके। कार्यक्रम में आकाशवाणी के वरिष्ठ उद्‍घोषक प्रदीप शर्मा, वरिष्ठ कवि उपेन्द्र कुमार, पुस्तक वार्ता के संपादक भारत भारद्वाज, लंदन से पधारे मोहन अग्रवाल के अलावा सैकड़ों गणमान्य लोगों ने भाग लिया।

अन्य झलकियाँ-


संचालक प्रमोद कुमार तिवारी


दर्शक-दीर्घा


डॉ॰ मुकेश गर्ग


विभूति नारायण राय



अशोक बाजपेयी



आवाज़ का परिचय देते दीप जगदीप



दीप जगदीप, संचालक और अतिथि


मंच



'काव्यनाद' का अनावरण करते अशोक बाजपेयी



'लोकप्रिय गीत' पुरस्कार का चेक मुख्य अतिथि के हाथों ग्रहण करते निखिल



रफीक़ शेख़ की ओर से 'सरताज गीत' पुरस्कार का चेक मुख्य अतिथि के हाथों ग्रहण करते मनीष वंदेमातरम्



'आवाज़ के रसिया हैं हम' गीत पेश करते निखिला, निखिल और कृष्णा पंडित


धन्यवाद ज्ञापित करते आवाज़ के संपादक सजीव सारथी


बाएँ से दाएँ- सखी सिंह, मनीष वंदेमातरम्, शैलेश भारतवासी, प्रमोद कुमार तिवारी, मोहन अग्रवाल, दीप जगदीप और महुआ


फुरसत के पलों में- निखिला, निखिल, कृष्णा पंडित और सजीव सारथी



शैलेश भारतवासी, प्रमोद कुमार तिवारी और मोहन अग्रवाल